प्रेरणादीप

शब्द की महत्ता

स्वामी विवेकानंद एक सत्संग में भगवान के नाम की महत्ता बता रहे थे कि वहां उपस्थित एक तार्किक ने प्रश्न किया- 'शब्दों में क्या रखा है और उन्हें रटने से क्या लाभ?Ó विवेकानंद ने उत्तर में उसे कतिपय अपशब्द कहे- 'मूर्ख, जाहिल आदि।Ó इस पर वह तार्किक आगबबूला हो गया और भन्नाते हुए कहा- 'आप संन्यासी के मुंह से ऐसे शब्द शोभा नहीं देते। उन्हें सुनकर मुझे बहुत चोट लगी है।Ó इस पर स्वामी जी ने हंसते हुए कहा- 'भाई! वे तो शब्द मात्र थे। शब्दों में क्या रखा है। मैंने कोई पत्थर तो नहीं मारा।Ó ..

सफलता का सूत्र

ए क लड़का था। काम की तलाश में वह अपने बैंगलुरु में रहने लगा। कुछ समय बाद उसे एक कारखाने में काम मिल गया। एक दिन उसने एक धनवान व्यक्ति को देखा तो उसकी चमक-दमक से बहुत प्रभावित हुआ। अब लड़के ने भी मन में धनवान बनने की ठान ली। धीरे-धीरे उसने कुछ धन एकत्र कर लिया। इसी बीच एक विद्वान से उसका परिचय हुआ। उसे लगा कि धनवान से अधिक सम्मान तो विद्वान का होता है। अत: विद्वान बनना चाहिए। अब वह कमाना छोड़कर विद्वान बनने के लिए पढ़ाई करने लगा। वह मन लगाकर पढ़ते हुए अक्षर ज्ञान प्राप्त कर चुका था कि अचानक उसने एक ..

सर्वोपरि ज्ञान-दान

उ त्तराखंड के एक प्राचीन नगर में सुबोध नामक राजा राज्य करते थे। महाराज का नियम था कि राजकीय कार्य प्रारंभ होने से पूर्व वे आए हुए याचकों को दान दिया करते थे। इस नियम में उन्होंने कभी भूल नहीं की। एक दिन जब सब लोग दान पा चुके तो एक विचित्र स्थिति आ खड़ी हुई। एक व्यक्ति ऐसा आया जो दान के लिए हाथ तो फैलाए था, पर मुँह से कुछ न कहता था। सब हैरान हुए कि इसे क्या दिया जाए? एतदर्थ बुद्धिमान व्यक्तियों की समिति बैठाई गई। किसी ने कहा वस्त्र देना चाहिए, किसी ने अन्न की सिफारिश की। कोई स्वर्ण देने को कहता, तो ..

वीर बालक रामसिंह

अ पनी वीरता के लिए प्रसिद्ध राठौर वीर अमरसिंह शाहजहां के दरबार में ऊंचे पद पर थे। बादशाह के साले सलावतखां ने उनका भरी सभा में अपमान कर दिया। अमरसिंह ने वहीं भरे दरबार में उसका सिर काट कर फेंक दिया। किसी की हिम्मत नहीं हुई कि अमरसिंह को रोके या कुछ कहे। मुसलमान दरबारी अपनी जान बचाकर इधर-उधर छिप गए। अमरसिंह का साला, नीच स्वभाव के अर्जुन गौड़ को बादशाह ने लालच में फंसा लिया। वह धोखा देकर अमरसिंह को बादशाह के दरबार में ले गया। जब अमरसिंह छोटे दरवाजे से भीतर घुस रहे थे, तभी अर्जुन ने पीछे से वार कर उन्हें ..

राष्ट्राभिमान

बात सन् 1942 की है। उन दिनों पूरा देश महात्मा गांधी के आह्वान पर 'करो या मरोÓ की भावना को लेकर आंदोलन कर रहा था। ऐसे समय में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कुलपति थे डॉ. अमरनाथ झा। विश्वविद्यालय में दीक्षान्त समारोह होने वाला था। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गवर्नर विलियम को बुलाया गया था। नियत समय पर दीक्षान्त समारोह शुरू हुआ। गवर्नर विलियम ने आसन ग्रहण किया ही था कि उसकी नजर सामने फहराये तिरंगे पर गई। यह देखकर वह क्रोध से तमतमा उठा। वह गरजते हुए बोले- 'ये मेरा ..

क्रांतिवारी गोपी मोहन

क्रांतिवारी गोपी मोहन..