आस्था पर भौतिकवादी सुविधाओं का ग्रहण..!
   Date14-Jan-2023

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ब्रेक के बाद - शक्तिसिंह परमार
धार्मिक पर्यटन और पर्यटन स्थल दोनों में उतना ही अंतर है, जितना जमीन और आसमान में... क्योंकि धार्मिक यात्राएं आस्था-विश्वास और अपनी आध्यात्मिक विरासत को आगे बढ़ाने का शाश्वत माध्यम हैं... जबकि पर्यटन स्थल व्यक्ति की मानसिक, शारीरिक स्थिति को तनाव मुक्त करने का जरिया है.., जिसमें वह कुछ नयापन चाहता है... अत: धर्म स्थलों को बिना विचारे पर्यटन स्थल में बेतरतीब परिवर्तित करना कोई समझदारी नहीं है..!
सनातन धर्म से जुड़े धार्मिक स्थलों, आस्था केन्द्रों एवं आध्यात्मिक क्षेत्रों को लेकर हमेशा से विशेष श्रद्धा-आकर्षण रहा है... सामान्य व्यक्ति भी इन स्थानों पर पहुंचकर स्वयं को धन्य समझता है... जब इन शाश्वत स्थलों के विकास-निर्माण की बात निकलती है तो सबसे पहला विषय यही रहता है कि उनके नैसर्गिक स्वरूप के साथ कोई छेड़छाड़ न हो... क्योंकि आस्था-श्रद्धा के साथ कोई समझौता नहीं हो सकता और होना भी नहीं चाहिए... लंबे समय से सम्मेद शिखर जो कि झारखंड राज्य के गिरिडीह जिले में छोटा नागपुर पठार पर स्थित पहाड़ी है, जो विश्व का सबसे महत्वपूर्ण जैन तीर्थ स्थल है... इसे केन्द्र व राज्य सरकार पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना बना रही थी... जिसका जबरदस्त तरीके से देशभर में विरोध हुआ और अंतत: दोनों ही सरकार ने अपनी उस कार्ययोजना को फिलहाल तो ठंडे बस्ते में डाल दिया है... सम्मेद शिखर का मामला कुछ हद तक शांत पड़ता कि उत्तराखंड राज्य के चमोली स्थित ज्योतिर्मठ/जोशीमठ में प्राकृतिक आपदा के चलते जो दरारें आर्इं, उसने इन सवालों को पुन: गंभीरता के साथ रेखांकित किया है कि आखिर धार्मिक, आध्यात्मिक स्थलों को पर्यटन केन्द्र की आपाधापा वाली सुविधाओं, संसाधनों एवं जबरिया बोझ से कैसे मुक्त रखा जाए..? क्योंकि एक तरफ अनेक तरह के आधुनिक विकास के चलते ही जोशीमठ में वर्तमान संकट मुँहबाए खड़ा है.. तो दूसरी तरफ सम्मेद शिखर में हम उसी तरह के खतरे को 'आ बेल मुझे मारÓ की तरह आमंत्रित कर रहे हैं... सम्मेद शिखर की ऐतिहासिक/धार्मिक महत्ता हो या जोशीमठ का सनातनकाल से स्थापित सत्य जहां 20 तीर्थंकरों को मोक्ष प्राप्ति हुई हो अथवा आठवीं सदी में धर्म/समाज/राष्ट्र सुधारक आद्य शंकराचार्य को ज्ञान प्राप्त हुआ हो... दोनों का महत्व/स्थान अतुलनीय है...
भारतवर्ष में धार्मिक पर्यटन कोई आज की बात या आधुनिक शिगूफा नहीं है.., बल्कि हमारे यहां तो चारधाम, अमरनाथ और मानसरोवर यात्रा, 12 ज्योतिर्लिंग, 51 शक्तिपीठ और शंकराचार्य पीठ के साथ ही 12 वष में लगने वाले सिंहस्थ महाकुंभ जैसे सनातन धर्म की ध्वजा लहराने वाले अप्रतिम अनुष्ठान सतत चलते रहते हैं... जिसमें उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक के भारतीय श्रद्धालु हर तरह की विपदाओं का सामना करके भी यहां पर धर्मलाभ के लिए पहुंचते हैं... इसी से वर्षभर इन क्षेत्रों में आर्थिक के साथ ही अन्य कारोबारी गतिविधियां व रोजगार के अवसर भी सृजित होते चले जाते हैं... इसलिए धार्मिक पर्यटन का अपना महत्व है... वह निर्बाध रहना चाहिए... ग्रामीण क्षेत्रों में चारधाम यात्रा जाने के लिए पहले लोग अलग-अलग साधनों से जाते थे, सामूहिक रूप से बस से ढाई माह में चारधाम पहुंचते थे... लेकिन अब आधुनिक व तकनीकी साधनों ने यात्रा ही नहीं, यात्रा के गंतव्य को भी बहुत ही आसान बना दिया है... लेकिन इस आसान होती धार्मिक यात्रा के कारण किस तरह पर्यावरण विध्वंस, पर्वत, नदियों और प्राकृतिक संपदा का विरूपण हुआ है, यह भी किसी से नहीं छिपा है..? लेकिन जब पर्यटन केन्द्र की बात निकलती है तो वहां पर देश से ही नहीं, विदेश से भी सैलानी आते हैं... पहाड़ों, नदियों एवं प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उठाते हैं... इन केन्द्रों पर ठहरने की उत्तम से उत्तम व्यवस्थाएं की जाती हैं... परिवहन-वायुगमन के भी साधन सुलभ हैं... इन आधुनिक विकास कार्यों के कारण पूरा तंत्र गड़बड़ाता है, यह हमने 2013 में केदारनाथ में आई प्राकृतिक आपदा और अब जोशीमठ में लगातार बढ़ती दरारों के रूप में देखा है... भौतिकवादी सुख-सुविधाओं ने हमारे आस्था स्थलों,धार्मिक केन्द्रों पर मानो ग्रहण लगा दिया है..!
धार्मिक स्थल, पर्यटन क्षेत्र से जुड़े समाज-सरकार के निश्चित सरोकार हैं... जिन्हें निर्वाहित करने के लिए तैयार रहना होगा... सम्मेद शिखर में आखिर पर्यटन का ऐसा जाल बुनने की क्या जरूरत है कि उसकी पवित्रता एवं ऐतिहासिकता ही धूल-धूसरित हो जाए..? क्योंकि धार्मिक स्थल पर जिसे आस्था-विश्वास है, वही आता है... लेकिन पर्यटन केन्द्र पर ऐसी कोई शर्त लागू नहीं होती... सम्मेद शिखर अगर पर्यटन केन्द्र का रूप धारण करता है तो उससे जुड़ी बुराई से वह कैसे बचेगा..? अगर ऐसी चिंता के साथ जैन समुदाय सम्मेद शिखर को मूल रूप में ही बनाए रखने का आह्वान कर रहा है तो इसमें बुराई क्या है..? हमने काशी कॉरिडोर, महाकाल कॉरिडोर बनाकर वास्तव में धार्मिक आस्था के साथ ही पर्यटक सुविधा को बेहतर किया... लेकिन देवभूमि उत्तराखंड में पहाड़ी क्षेत्रों को चीरकर लगातार पर्यटकों को लुभाने का दुस्साहस महंगा पड़ेगा... ओंकारेश्वर में पहाड़ काटकर, जंगलों को उजाड़कर हम कौन से आध्यात्मिक विचार को पुनस्र्थापित करना चाहते हैं..? जब सरकार या निर्माण से जुड़े अंग समाज व आस्थावान लोगों के हितों, उनके श्रद्धा केन्द्रों के मूल भाव को समझे बिना विकास का पहिया घुमाते हैं तो पहाड़ों में दरारें ही नहीं आतीं, बल्कि नदियां-पहाड़, पर्वत, झील असहनीय पीड़ा से चीत्कारने भी लगते हैं... 1960 में जोशीमठ के समीप 30 दुकानें थी, आज 400 से अधिक व्यावसायिक भवन हैं... आखिर पहाड़, नदी और आस्था स्थलों के बोझ सहने की भी तो कोई सीमा है..? इसे समाज-सरकार समय रहते समझ ले... जिन आस्था स्थलों को हम आज महज पर्यटन केन्द्र के रूप में देख रहे हैं, वे अपने नैसर्गिक सौंदर्य, आध्यात्किम वैभवता को अनियंत्रित विकास के चलते खो देंगे..!