जम्मू-कश्मीर महाराजा हरिसिंह का राष्ट्रप्रेम
   Date23-Sep-2022

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अजय मित्तल
26 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर के शासक महाराजा हरिसिंह ने तत्कालीन भारतीय संविधान (दि गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट- 1935) के अन्तर्गत भारत में अपनी रियासत का विलय कर इस ऐतिहासिक, पारम्परिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक वस्तुस्थिति की पुष्टि ही की थी, जो प्राचीन काल से भारतीयों के मन-मस्तिष्क में विद्यमान रही है कि जम्मू-कश्मीर भारत से अभिन्न है। 22 अक्टूबर को पाकिस्तान ने राज्य पर आक्रमण कर दिया था और 4 दिन में उसकी सेना राजधानी श्रीनगर के समीप पहुंच चुकी थी। प्रसंगवश बता दें, महाराजा को पाकिस्तानी हमले की सर्वप्रथम सूचना हरीश भनोत तथा डॉ. मंगलसेन नामक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दो प्रचारकों ने दी थी। महाराजा ने 24 को विलय का प्रस्ताव भिजवाया। इसके पूर्व 17 अक्टूबर को सरसंघचालक श्री माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी), सरदार पटेल के आग्रह पर महाराजा को भारत में विलय के लिए तैयार करने श्रीनगर आए थे। सरदार पटेल जानते थे कि महाराज के मन में राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके प्रमुख के प्रति गहरे सम्मान की भावना है। 15 अगस्त से पहले महाराजा पर अपनी रियासत पाकिस्तान में विलय करने के लिए तत्कालीन गवर्नर-जनरल माउंटबैटन और मोहनदास करमचन्द गांधी का दबाव पड़ चुका था। (गांधीजी द्वारा महाराजा को पाकिस्तान में विलय का सुझाव 1 अगस्त को श्रीनगर में भेंट करके दिया गया था। 'दि ट्रिब्यूनÓ (3 अगस्त, 1947) में मुखपृष्ठ पर यह समाचार छपा था। जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन ने अपनी पुस्तक 'माई फ्रोजन टयूलैंस इन कश्मीर के पृष्ठ 83 पर इस ओर यह लिखकर संकेत किया है- गांधी जी ने महाराजा को अपनी प्रजा की इच्छा के विरुद्ध न जाने की सलाह दी।) नेहरू केवल इस शर्त पर विलय मानना चाहते थे कि महाराजा सत्ता उनके मित्र शेख अब्दुल्ला को सौंप दें, वह शेख अब्दुल्ला, जिसने एक साल पहले ही महाराजा को राज्य से सत्ताच्युत करने के लिए 'कश्मीर छोड़ोÓ आन्दोलन चलाया था।
भ्रामक प्रचार किया गया कि महाराजा हरिसिंह राष्ट्र भक्त नहीं थे, इसीलिए विलय टालते रहे थे। वास्तविकता यह है कि राष्ट्र भक्ति की कमी नेहरू में थी, जो महाराजा के विलय के आग्रह को अपनी निजी दोस्ती की वेदी पर बलि चढ़ाते रहे। जम्मू-कश्मीर के उपप्रधानमंत्री रामदास बत्रा को महाराजा ने तो जून, 1947 में ही विलय की बातचीत के लिए नई दिल्ली भेजा था। महाराजा ने बाद में माउंटबैटन और गांधी द्वारा पाकिस्तान में विलय के पक्ष में किए गए आग्रहों को भी दरकिनार कर दिखाया था। ये तथा ऐसे ही कई अन्य तथ्य नेहरू-भक्त इतिहासकारों माउंटबैटन ने छिपाने का अपराध किया है। नेहरू की दिलचस्पी सिर्फ इस बात में थी कि शेख और उसकी नेशनल कॉन्फ्रेंस कैसे श्रीनगर की सत्ता संभाले।
26 अक्टूबर को सम्पन्न हुए विलय के एकदम पहले का घटनाक्रम भी उल्लेखनीय है। महाराजा ने अपने प्रधानमंत्री मेहरचन्द महाजन, जो यह दायित्व संभालने से पहले पंजाब हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके थे, को दिल्ली भेजा था। महाजन की पुस्तक 'लुकिंग बैकÓ के अनुसार 'कश्मीर के प्रधानमंत्री के नाते जब मैं 26 अक्टूबर को महाराजा का यह सन्देश लेकर दिल्ली पहुंचा कि 'सेना भेजिये, विलय स्वीकार करिये और जो कुछ अधिकार आप लोकप्रिय राजनीतिक दल = नेशनल कॉन्फ्रेंस) को देना चाहते हैं, दीजिए, परन्तु हर कीमत पर आज शाम तक सेना वायुयानों द्वारा श्रीनगर पहुंचनी चाहिए... अन्यथा मुझे नगर को बचाने के लिए विवश होकर श्री जिन्ना के पास जाना पड़ेगा। तब प्रधानमंत्री नेहरू तैश में आकर अपना सन्तुलन खो बैठे थे और मुझे कमरे से निकल जाने को कहा था। सौभाग्यवश उस समय शेख अब्दुल्ला ने मेरी बात का समर्थन किया और तब कहीं जाकर भारत सरकार ने कश्मीर का विलय स्वीकार किया था।Ó महाजन ने इस प्रसंग का उल्लेख 'पाञ्चजन्यÓ साप्ताहिक के 28 अक्टूबर, 1662 के कश्मीर अंक में भी अपने एक लेख में किया है।
याद रहे, शेख ने विलय के लिए आग्रह तब किया, जब महाराजा के प्रधानमंत्री ने नेहरू से सत्ता में शेख को हिस्सेदारी की बात कह दी। शेख अब्दुल्ला ने इससे पहले अपने प्रतिनिधि गुलाम मोहम्मद सादिक को लाहौर भेजकर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री लियाकत अली खां से पाक में विलय की वार्ता कराई थी, पर वहां सौदा पटा नहीं। जिन्ना को शेख भरोसे लायक नेता महसूस नहीं हुआ। जिन्ना की नेशनल कॉन्फ्रेंस के बारे में धारणा 'गुण्डों-गैंगस्टर्स की पार्टीÓ की थी। इसलिए शेख भारत में विलय की बात करने लगा।
श्री महाजन आगे लिखते हैं कि यदि नेहरू ने 24 अक्टूबर को ही महाराजा के विलय के अनुरोध और सैनिक सहायता की मांग मान ली होती, तो गुलमर्ग भीषण नरसंहार और हजारों बलात्कारों से बच गया होता। यहां प्रसंगवश एक अन्य बात। मेहरचन्द महाजन को मार्च, 1948 के प्रारम्भ में जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री पद से हटाकर शेख अब्दुल्ला, जो अक्टूबर 1947 के अन्त से ही राज्य की आपातकालीन परिषद् के अध्यक्ष बने हुए थे, को प्रधानमंत्री बनाया गया। महाजन आगे भारतीय सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश बने। 1953 में जब वे मुख्य न्यायाधीश बनने वाले थे, तो नेहरू ने अपनी व्यक्तिगत नापसन्द के कारण उनकी नियुक्ति रोकने की कोशिश की। बेंच में इसका विरोध हुआ। नेहरू ने बिल्कुल नई नियुक्तियों द्वारा बेंच में अपने चहेते जज बाहर से लाने का प्रयास किया। इस पर सुप्रीम कोर्ट के तमाम जज इस्तीफे को तैयार हो गए। इतना बड़ा झटका झेल सकने में खुद को असमर्थ पाकर नेहरू ने 'प्रतिबद्ध न्यायपालिकाÓ बनाने की कोशिश छोड़ दी। फिर भी श्री महाजन एक साल भारत के मुख्य न्यायाधीश पद पर विराजमान रहे।
महाराज हरिसिंह की राष्ट्र भक्ति के दो कारण यहां देना समीचीन है। 1931 में लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में वे एक पक्के राष्ट्रवादी तथा भारत के हितचिन्तक होकर उभरे थे और अंग्रेजों की नजरों में चुभने लगे थे। 1946 में कश्मीर से अपने निष्कासन के बाद वे मुम्बई रह रहे थे। उनकी पूर्व रियासत में शेख अब्दुल्ला द्वारा तिरंगे की जगह नेशनल कॉन्फ्रेंस का दुरंगा झंडा मात्र ही फहराया जाने लगा। तब जम्मू में प्रजा परिषद् ने तिरंगा आन्दोलन चलाया। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता भी बड़ी संख्या में शामिल हुए। 16 कार्यकर्ता शेख की पुलिस की गोलियों से बलिदान हो गए। उन दिनों इस आन्दोलन को महाराजा ने मुम्बई में रहते हुए पूरा समर्थन दिया था और तदर्थ आर्थिक सहायता भी भेजी थी।