स्व से दूरी अशुद्धियां व भ्रमों की कारक
   Date23-Sep-2022

dharmdhara
धर्मधारा
स्व यानी स्वयं। स्व से दूरी ही हमें दीन-दुर्बल बना देती हैं, हमारी ओजस्विता-तेजस्विता को छीन लेती है। जितना हम स्व से दूर होते हैं, उतना ही हम असंतुष्ट, बेचैन व परेशान होते हैं और जितना हम स्व के नजदीक होते हैं, उतना ही हम परम संतुष्ट, आनंदमय व निश्चित होते हैं। स्व से दूरी ही हमें अशुद्धियों व भ्रमों से भर देती है और जीवन में किए जाने वाले अशुभ कर्म ही हमें स्व से दूर करते चले जाते हैं और इसके कारण हम भ्रम व सांसारिक उलझनों में उलझ जाते हैं। जबकि स्व की ओर कदम बढ़ाने व अंतर्शद्धि के लिए प्रयासरत होने के साथ ही हमारी दुर्बलताएं, दुष्प्रवृत्तियां व अशुद्धियां हमसे दूर होती हुई चली जाती हैं।
स्व की ओर जाने की साधना एक तरह से परमात्मा की साधना है, स्व की ओर जाने की साधना ही सही अर्थों में जीवन-साधना है। हम अपने स्व से इतने दूर चले गए हैं कि हमें उसका एहसास भी नहीं होता, जबकि स्व हमारे भीतर ही मौजूद है, उससे हम अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं, लेकिन फिर भी हम उससे परिचित नहीं हैं। इस तरह से देखा जाए तो जीवन में हमें जिसे पाना है, जिसे खोजना है, वह हमारे भीतर ही है, लेकिन फिर भी हम उसकी खोज संसार में करते हैं, उसे बाहर खोजते हैं, बाहर तलाशते हैं और न मिलने पर परेशान होते हैं। जिसने बहुत सारी सांसारिक उपलब्धियां प्राप्त की, बहुत यश प्राप्त किया, बहुत सफलताएं प्राप्त की, लेकिन यदि उसे स्व की प्राप्ति न हुई, तो उसका जीवन सही माने में सफल व सार्थक न हुआ, लेकिन जिसने स्व को प्राप्त कर लिया, फिर भले ही उसने सांसारिक उपलब्धियां व बाहरी सफलताएं न पाई हों, वह अपने जीवन से परम संतुष्ट होगा और आनंदित होगा। मनुष्य जीवन परम अनमोल है, क्योंकि इस जीवन में कर्म करने की स्वतंत्रता है, यदि व्यक्ति कर्म के रहस्य को समझ ले, उसे अपने जीवन में सार्थक करे, तो इसके सहारे ही वह अपने स्व तक पहुंच सकता है। हाल मनुष्य के लिए जितना कर्तव्य अपने परिवार, समाज के प्रति है, उतना ही स्वयं के प्रति भी है और इनके समन्वय के साथ ही उसे जीवन में आगे बढऩा चाहिए, लेकिन अपने स्व को विस्मृत नहीं करना चाहिए, बल्कि इसकी ओर बढऩा चाहिए, क्योंकि स्व की प्राप्ति ही जीवन-साधना है।