प्रशासनिक चुस्ती की पहल...
   Date22-Sep-2022

vishesh lekh
मध्यप्रदेश के वनवासी अंचल झाबुआ में जिस तरह से पुलिस अधीक्षक (एसपी) एवं कलेक्टर को हटाया गया है, यह आने वाले समय में उस प्रशासनिक चुस्ती और जवाबदेही सुनिश्चित करने की सरकारी पहल के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें सरकार नौकरशाहों को अपने जनदायित्व, संवैधानिक मर्यादा एवं प्रशासनिक नियमों के अनुकूल अनुशासन के उस सांचे में ढलने और ढालने की पहल करती नजर आ रही है, जिसमें जनता को हर हाल में यह अहसास हो कि यह जनता का जनता द्वारा जनता के लिए चुना गया वह शासन व्यवस्था है, जिसमें जनप्रतिनिधि से लेकर लोकसेवक तक जनता के उस नुमाइंदे अर्थात् सेवक के रूप में आते हैं, जिनका प्रथम और अंतिम दायित्व है कि कैसे भी उन्हें उन सभी समस्याओं से मुक्ति दिलाई जाए, जिनके कारण राज्य-शहर या सुदूर ग्रामीण अंचल में कानून का राज भंग होता नजर आता है... इसमें कोई दो राय नहीं कि झाबुआ के एसपी, कलेक्टर को हटाने का निर्णय शिवराज सरकार के इस चौथी पारी के प्रमुख निर्णयों में देखा जा रहा है... क्योंकि वैसे सरकार को नौकरशाही के साथ समन्वय करते हुए काम करने की एक शैली विकसित करने में कोई परहेज नहीं रहा है... लेकिन जब नौकरशाही अपने दायित्व को भूलकर जनता के चुने गए जनप्रतिनिधि को ही सवालों के घेरे में खड़े करने के कृत्य करती नजर आए, तब यह पानी सिर से ऊपर निकल जाने वाली कहावत को चरितार्थ करता है... क्योंकि झाबुआ में एसपी अरविंद तिवारी और कलेक्टर सोमेश मिश्रा की जो कार्यशैली सामने आई है वह उन्हें नौकरशाही के अनुकूल अनुशासनहीनता की श्रेणी में खड़ी करती है... क्योंकि जब कोई भी व्यक्ति अपनी जीवन रक्षा या अन्य किसी कारणों से सुरक्षा की गुहार लगाकर एसपी के पास जाता है या उन्हें फोन व अन्य माध्यमों से संदेश पहुंचाने की कोशिश करता है, तब उसके साथ व्यवहार कैसा हो? यह झाबुआ के घटनाक्रम के बाद कानून के रक्षकों को आसानी से समझ आ गया होगा... ठीक इसी तरह से झाबुआ कलेक्टर पर भी अमृत सरोवर निर्माण, खनिज उत्खनन, रेत परिवहन, बॉयो डीजल की बिक्री, वनवासी क्षेत्र में अजा,अजजा वर्ग की भूमि को लेकर नियम 165 ख का खुला उल्लंघन जैसे आरोप लगे हैं, इससे भी बढ़कर स्थानीय स्तर पर स्कूल व महाविद्यालय से मिलने वाली छात्रवृत्ति को लेकर भी अनुसूचित जाति वर्ग में लगातार आक्रोश निर्मित होता रहा, लेकिन उनकी समस्या का समाधान करने की कभी भी कलेक्टर ने उत्सुकता नहीं दिखाई... इससे भी बढ़कर जब जिले में एसपी, कलेक्टर कानून व सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण दायित्व पर है तो नागरिकों के अधिकार एवं उनके सुख-दुख के साथी के रूप में जनप्रतिनिधि अर्थात् विधायक, सांसद की महती भूमिका है, लेकिन जब नौकरशाही ही इन्हीं जनप्रतिनिधियों से पटरी नहीं बैठेगी और लगातार आए दिन विवाद होते रहेंगे तो इसका कहीं न कहीं अव्यवस्था के मान से दुष्प्रभाव नजर आने लगेगा, यही तो झाबुआ में होने लगा था... इस प्रशासनिक अक्षमता को दूर करने के लिए इस तरह की सख्ती जरूरी थी...
दृष्टिकोण
हिजाब का मांगा जा रहा हिसाब...
देश के सर्वोच्च न्याय मंदिर में विगत नौ दिनों से हिजाब की अनिवार्यता, आवश्यकता, विकल्प एवं व्यवस्था समेत अन्य बिन्दुओं को लेकर बहस चल रही है... बहस के पहले दिन से लगाकर अगर बुधवार तक की चर्चा, सवाल-जवाब और तर्क-वितर्क पर नजर डाले तो इस बात को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि जिस हिजाब को कर्नाटक में अपनी मजहबी आस्था का पुछल्ला बनाकर कुछ मुस्लिम संगठन स्कूल, कॉलेज में भी हिजाब को लागू रखने की बे-ढंगी पैरवी कर रहे हैं, उन्हें अब भारत से ही नहीं दुनिया के अन्य देशों से भी कड़ा जवाब मिल रहा है... अभी गत दिनों भारत-पाकिस्तान के बीच जब मैच हुआ तो पाकिस्तान में बहुत सारी युवतियां बिना किसी हिजाब के क्रिकेट मैदान में अपने खिलाडिय़ों का उत्साहवर्धन कर रहीं थी... जब इस्लाम हिजाब की अनिवार्यता को रेखांकित करता है, तब युवतियां सार्वजनिक स्थल पर पाकिस्तान में किस तरह से बिना हिजाब के नजर आई..? अब जवाब पाकिस्तान में मजहबी धर्मांधता का चौगा ओढऩे और ओढ़ाने की हठ दिखा रहे कट्टरपंथियों, मुल्ला-मौलवियों से नहीं, बल्कि भारत में हिजाब की वकालत करने वाले धड़े से पूछा जाना चाहिए कि जब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा हिजाब नहीं है, तब उसे प्रशासनिक, संवैधानिक और शैक्षणिक संस्थाओं में लागू करने की सालभर से जिद क्यों दिखाई जा रही है..? क्योंकि अब तो ईरान में भी हिजाब विरोधी अभियान उग्र होने लगा है... हिजाब के विरोध में नारे लगाने वाली मुस्लिम महिलाओं और पुरुषों को सरेराह सड़कों पर गोलियों से भूना जा रहा है... ऐसे में भारत में हिजाब की पैरवी करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों को भारत से बाहर मुस्लिम देशों में हिजाब की दुर्दशा और उस पर उनके तर्क को समझना चाहिए...