ज्ञानवापी मस्जिद के मंदिर होने के पुख्ता प्रमाण
   Date22-Sep-2022

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प्रमोद भार्गव
ज्ञा नवापी मस्जिद पर फिर एक महत्वपूर्ण एवं जिज्ञासा पैदा करने वाला फैसला जिला न्यायालय का आ गया है। न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष की वह याचिका खारिज कर दी है, जिसमें दावा किया था कि 'विशेष उपासना स्थल कानून 1991' के तहत आजादी के बाद जो भी धर्म स्थल जिस अवस्था में हैं, उसी रूप में रहेंगे। अलबत्ता मस्जिद में श्रंृगार गौरी की रोजाना पूजा के अधिकार को लेकर 22 सितंबर से सुनवाई नियमित शुरू होगी। साफ है, न्यायालय ने हिंदू पक्ष की मांग को जिला न्यायाधीश कृष्ण विश्वेश्वर ने सुनवाई के योग्य माना है। श्रृंगार गौरी की पूजा को लेकर बीते वर्ष पांच महिलाओं राखी सिंह, लक्ष्मी देवी, सीता साहू, मंजू व्यास और रेखा पाठक ने याचिका दायर की थी। इस परिप्रेक्ष्य में अदालत ने मस्जिद परिसर में वीडियोग्राफी सर्वेक्षण कराया। इस सर्वे में ऐसे कई चिन्ह प्रकाश में आए, जो इस मस्जिद के मंदिर होने के पुख्ता साक्ष्य हैं। इन साक्ष्यों में दीवारों पर श्लोक अंकित हैं, हाथी और शिलिंग बने हैं, इसी विशाल शिवलिंग की ओर बाहर नंदी दृष्टि गढ़ाए बैठे हैं। साफ है, साक्ष्य हैं तो फिर विवाद का निपटारा होना जरूरी है।
इस सिलसिले में प्राचीन मूर्ति स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वरनाथ की ओर से वादमित्र विजयशंकर रस्तोगी ने न्यायालय में तर्क दिया कि वर्तमान में विवादित स्थल की धार्मिक स्थिति 15 अगस्त 1947 को मंदिर की थी अथवा मस्जिद की, इसके निर्धारण के लिए साक्ष्यों की आवश्यकता है। दरअसल विवादित स्थल विश्वनाथ मंदिर का ही एक भाग है, इसलिए एक अंश की धार्मिक स्थिति का निर्धारण नहीं किया जा सकता, बल्कि ज्ञानवापी परिसर का भौतिक साक्ष्य लिया जाना जरूरी है। जिसे पुरातातात्विक सर्वेक्षण द्वारा जांच कराकर स्पष्ट किया जाए कि इस मस्जिद के नीचे और इसकी दीवारों के अंदरूनी हिस्सों में कोई मंदिर था अथवा नहीं ? तथ्यों के आधार पर प्राचीन विश्वनाथ मंदिर के ध्वस्त अवशेष मस्जिद की दीवारों के अंदरूनी और बाहरी तौर पर विद्यमान बताए गए हैं। मंदिर की दीवारों और दरवाजों को चिनकर मस्जिद का वर्तमान ढांचा खड़ा किया गया है। पुराने विश्वनाथ मंदिर के अलावा समूचे परिसर में अनेक देवी-देवताओं के छोटे-छोटे मंदिर थे, जिनमें से कुछ आज भी मौजूद हैं। वर्तमान में जो ज्योतिर्लिंग स्थापित है, उसकी प्राण-प्रतिष्ठा 1780 में महारानी अहिल्याबाई ने कराई थी। अदालत पूरा सर्वेक्षण में मिलने वाले साक्ष्यों के अलावा इतिहास की उन पुस्तकों को भी साक्ष्य मानेगी, जिनमें मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने के विवरण हैं। भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 के अंतर्गत अधिनियम की धारा 57 (13) के तहत सामान्य इतिहास की पुस्तकों में भी वर्णित ऐतिहासिक तथ्य को साक्ष्य के तौर पर मान्यता प्राप्त है। इस संदर्भ में 1937 में प्रकाशित इतिहासकार डॉ. अनंत सदाशिव अल्तेकर की पुस्तक 'हिस्ट्री ऑफ बनारस' अदालत में प्रस्तुत भी की गई थी। बीती सदी के अंत तक जो भी लोग विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करने गए हैं, उन्हें स्पष्ट रूप से दिखाई देता था कि एक टूटे प्राचीन मंदिर के ढांचे पर कथित मस्जिद बनाई जा रही है। मंदिर का चबूतरा और आलीशान सफेद पत्थर के स्तंभ स्पष्ट दिखाई देते थे। इसी परिसर में एक कुआं है, जिसमें बताते हैं, वह शिवलिंग हैं, जो तोड़े गए मंदिर में स्थापित था। इस आशय के यहां बोर्ड भी लगे हैं। कूप के ऊपर लोहे का जाल डाल दिया है। दरअसल स्वतंत्रता के बाद मुस्लिमों को यह उदारता दिखाने की जरूरत थी कि तोड़े गए मंदिरों के जिन अवशेषों पर मजिस्द बना रहे हैं, उन्हें हिंदुओं को सुपुर्द कर सद्भाव की स्थायी रेखा खींच देते। तब न राम मंदिर का विवाद चलता और न अब नए विवादों के रूप में काशी और मथुरा आए होते ? दरअसल इस मामले में भाजपा प्रवक्ता अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर पूजा स्थल विशेष प्रावधान अधिनियम-1991 की वैद्यता को चुनौती भी दी गई थी। 1991 में केंद्र सरकार द्वारा सभी धर्मस्थलों से जुड़े विवादों में यथास्थिति बनाए रखने की दृष्टि से यह कानून बनाया था। हालांकि अयोध्या के राम जन्मस्थल-बाबरी मस्जिद विवाद को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया था। इस कानून के मुताबिक 1947 से पहले जो धर्मस्थल जिस स्थिति में थे, उसी स्थिति में रहेंगे, यह बाध्यकारी शर्त जुड़ी है। इसी बूते वाराणसी की अंजुमन इंतेजामिया का दावा था कि ज्ञानवापी मस्जिद को इसी कानून के तहत सुरक्षा मिलनी चाहिए। मसलन अंजुमन भलीभांति जानता था कि मंदिर की बुनियाद पर मस्जिद टिकी है। अब न्यायालय ने इस मुस्लिम पक्ष की याचिका को खारिज कर दिया। हालांकि मंदिरों को तोड़े जाने और धर्मांतरण का सिलसिला इस्लामिक शासकों के भारत में आने के साथ ही शुरू हो गया था। इनमें वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर तो है ही, इसके अलावा मथुरा का कृष्ण जन्मभूमि मंदिर भी है। इस मंदिर को तोड़कर शाही ईदगाह मस्जिद बना दी गई है। दिल्ली की कुतुबमीनार भी इसी संकट से गुजरी है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस परिसर में 27 हिंदू व जैन मंदिर तोड़कर इसे वर्तमान रूप दिया था। हालांकि कुतुबमीनार का निर्माण दिल्ली के तोमर राजाओं ने कराया था, ऐसे साक्ष्य डॉ. हरिहर निवास द्विवेदी ने अपनी पुस्तक 'दिल्ली के तोमर' में दिए हैं। 'वाराणसी पर मुस्लिमों के आक्रमण और मंदिरों को तोड़े जाने की ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में बात करें तो जिन इतिहासकारों ने इतिहास घटना और साक्ष्यों के आधार पर लिखा उन सब ग्रंथों में मुस्लिम शासकों द्वारा वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर को तोड़े जाने के साथ अन्य एक हजार मंदिरों को तोडऩे का उल्लेख मिलता है। 1193 में थानेश्वर के युद्ध में पृथ्वीराज के मारे जाने तथा 1194 में काशी तथा कन्नौज के गाहड़वाल के राजा जयचंद को हराने के बाद मोहम्मद गौरी ने अपने सेनापति कुतुबुद्ीन ऐबक को बनारस पर हमला करने के लिए भेज दिया। इस युद्ध में हिंदुओं की हार हुई और किले पर ऐबक ने कब्जा कर लिया। इसके बाद लूट और यहां के एक हजार मंदिर तोडऩे की शुरुआत हुई। लूट की संपत्ति को 1400 ऊंटों पर लादकर ऐबक ने गौरी के पास भेज दी। इससे खुश होकर गौरी ने कुतुबुद्दीन को दिल्ली का सुल्तान बना दिया और खुद अपने देश लौट गया। 1376 में फिरोजशाह तुगलक के शासनकाल में बनारस में अनेक मस्जिदों का निर्माण हुआ, जो तोड़े गए मंदिरों के अवशेषों से बनाई गईं थीं। यही वह कालखंड था, जिसमें तलवार के बल से हिंदुओं का बड़ी संख्या में धर्म परिवर्तन कराया गया। हालांकि कुछ साधु-संत इस विषम स्थिति में भी मंदिरों के पुनर्निर्माण में अपने प्राणों की आहुतियां दे-देकर लगे रहे। विश्वनाथ मंदिर भी तोडऩे के बाद अवशेषों से फिर खड़ा कर दिया। लेकिन 1436 से 1480 के दौरान उत्तर भारत का शासन लोदी-वंश के हाथ आ गया। इस वंश के दूसरे बादशाह सिकंदर लोदी ने 1494 में उन सभी मंदिरों को फिर से तोड़ दिया, जिनका पुनर्निर्माण हो गया था। विश्वनाथ मंदिर को तो पूरी तरह खण्डर में तब्दील कर दिया गया था। इस तोड़-फोड़ का चित्रण संस्कृत के ग्रंथ 'त्रिस्थली सेतु' (1580) और 'वीरमित्रोदय' (1620) में मिलता है। अकबर के शासनकाल 1585 में टोडरमल ने अपने गुरु पंडित राज भट्टनारायण के आग्रह पर विश्वनाथ मंदिर फिर से बनवाया। किंतु 1669 में क्रूरतम शासक औरंगजेब की आज्ञा से एक बार फिर पुनर्निमित सभी मंदिरों को तोड़ दिया गया।
इसी समय विश्वनाथ मंदिर के स्थान पर ज्ञानवापी मस्जिद बनाई गई। सन् 2000 से पहले तक मंदिर पर बनी इस मस्जिद की पश्चिमी दीवार ज्यों की त्यों दिखती थी, जो मंदिर होने के साक्ष्य खुले रूप में प्रगट करती थी, किंतु इस दीवार को मार्बल के पाटों से चिन दिया गया। औरंगजेब द्वारा तोड़े गए विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार बाद में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने कराया था। बहरहाल, पुरातत्वीय परीक्षण की आंख से मंदिरों के अवशेषों पर बनाई गई मस्जिदों की सच्चाई जितनी गहराई से खंगाली जाएगी तो मंदिर होने के एक नहीं हजार प्रमाण मिलेंगे। दरअसल मुसलमानों ने भारत जैसे बहुलतावादी देश में रहते हुए, ऐसी उदारता कभी नहीं दिखाई कि वे मुस्लिम शासकों द्वारा किए अन्याय की सच्चाई को जानते हुए भी उसमें बदलाव के लिए एक बार भी आगे आए हों ? उन्होंने अपनी जड़ों को इस्लामिक कट्टरता व क्रूरता में ही तलाशा। इसलिए वे तब भी नहीं पसीजे जब तीन दशक पहले कश्मीर से रातोंरात चार लाख से भी ज्यादा कश्मीरी पंडितों को अपने मूल निवास स्थलों से खदेड़ दिया गया था। इन स्थितियों को नजरअंदाज कर देने का परिणाम है कि हिंदू प्रतिक्रिया स्वरूप अपने धार्मिक कट्टर रूप में दिखाई दे रहे हैं। तथाकथित जो बौद्धिक हिंदुओं का अपना सनातन आधार हिंदू दर्शन और अध्यात्म में खोजने का उपदेश दे रहे हैं, वे नहीं जानते कि इस आध्यात्मिक दर्शन की आधारशिला भागवान राम और कृष्ण ने उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम की यात्राओं के दौरान विजय पताकाएं फहराते हुए ही रखी थी। इस विजय यात्रा में जो भी दुराचारी बाधा के रूप में पेश आए, उन्हें वहीं कुचल दिया गया था। (लेखक वरिष्ठ
साहित्यकार और पत्रकार हैं।)