युवाओं के हित में बड़ा निर्णय...
   Date21-Sep-2022

vishesh lekh
कोरोनाकाल की विकट स्थितियों में हर किसी के जनजीवन को अस्त-व्यस्त करके पूरा जीवनचक्र ही बदल डाला... फिर कारोबारी से लेकर व्यापारी यहां तक कि शैक्षणिक संस्थान और विभिन्न तरह की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों में जुटे विद्यार्थियों के समक्ष ही अनेक तरह के विकट सवाल इन तीन वर्षों में लगातार खड़े होते चले गए हैं... क्योंकि कोरोनाकाल के दौरान अनेक शैक्षणिक संस्थाएं यहां तक कि प्रतिस्पर्धात्मक रूप से तैयारी करवाने वाली कोचिंग क्लासेस भी या तो बंद हो गई अथवा उन्होंने अपने स्वरूप को बदलकर ऑनलाइन कर लिया... जिसके चलते तैयारियों में जुटे परीक्षार्थियों को अनेक दुविधाओं का सामना करना पड़ा... अब इसी तरह की स्थिति उन परीक्षार्थियों के समक्ष भी खड़ी होती चली गई, जो इन तीन वर्षों के अंतराल के कारण उम्र बढऩे के चलते अनेक तरह की प्रतियोगी परीक्षाओं से वंचित हो गए... ऐसे में जरूरी है कि जब कोरोनाकाल में हर तरह की व्यवस्था चरमरा गई या जीवनचक्र रुक गया और जिन्होंने परीक्षाओं में अपनी योग्यता-दक्षता का आकलन करने के लिए परीक्षाएं ही नहीं दी या फिर विविध विभागों द्वारा आयोजित होने वाली परीक्षाएं ही नहीं हो सकी, तब उन्हें उन तीन वर्षों की अवधि का कहीं न कहीं तो अवसर मिलना ही चाहिए... इस दिशा में लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि मध्यप्रदेश लोकसेवा आयोग समेत अन्य परीक्षाओं से जुड़ी आयु सीमा का बंधन या तो शिथिल किया जाए या फिर करीब तीन-चार वर्षों का अतिरिक्त अवसर उन विद्यार्थियों को मिले, जो कोरोनाकाल के पहले से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों में अपना दिन-रात एक करके जुटे रहे और अपने माता-पिता के खून-पसीने की कमाई को अपनी तैयारी में लगाते रहे... इन सब बातों को मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने गंभीरता से समझा है... तभी तो उन्होंने एक ऐसा निर्णय लिया कि जिन विद्यार्थियों ने मध्यप्रदेश लोकसेवा आयोग द्वारा करवाई जाने वाली प्रतियोगी परीक्षा में तय आयु सीमा को पार कर लिया है, उन्हें तीन साल की छूट दी जाए यानी कोई विद्यार्थी 33 साल का हो चुका है और उसे तीस वर्ष तक ही परीक्षा में बैठने की अनुमति है, तो उसे तीन वर्ष की राहत दी गई है... यह प्रतियोगी परीक्षा में जुटे लाखों विद्यार्थियों के जीवन में नए उजाले जैसा है... इसके लिए मप्र की शिवराज सरकार साधुवाद की पात्र भी है... लेकिन राज्य सेवा 2019 का परिणाम बदलकर मुख्य परीक्षा दोबारा करने का निर्णय भी कुछ अटपटा सा प्रतीत होता है... भले ही सरकार की तरफ से मध्यप्रदेश लोकसेवा आयोग ने यह घोषणा कर दी है कि एक महीने के भीतर राज्य सेवा प्रारंभिक परीक्षा के परिणाम पुन: घोषित किए जाएंगे... इससे चयनित हुए उन 1918 अभ्यर्थियों का भी परिणाम प्रभावित होगा... जो चुने जा चुके हैं, आखिर किसी तरह की परीक्षा के परिणाम घोषित होने के बाद उसे दोबारा करवाना किसी औचित्य को निर्धारित नहीं करता, लेकिन आयु सीमा बढ़ाने का निर्णय एक अतिआवश्यक कदम था, जिसे राज्य सरकार ने सही समय पर उठाया है...
दृष्टिकोण
पाकिस्तानी शरणार्थियों को अधिकार...
जम्मू-कश्मीर में शनै: शनै: ही सही बहुत कुछ और अतिआवश्यक बदलाव लगातार और क्रमवार तरीके से सामने आ रहा है... यह सबकुछ संभव हुआ है राज्य को उन बेजा प्रावधानों से मुक्ति दिलाकर.., जिसके चलते पूरे आवाम को एक ऐसे कटीले बंधन में जकड़कर रख दिया था, जिसमें वे स्वयं को पूरे देश से कटा हुआ या अछूता मान बैठे थे... यही नहीं जम्मू-कश्मीर से बाहर का व्यक्ति भी घाटी के वाशिंदों को लेकर एक ऐसा विचार प्रकट करने में देर नहीं लगाता था कि वे कुछ अलग अधिकार रखते हैं... लेकिन 5 अगस्त 2019 को जब दशकों से पीड़ा का कारण बनी वह व्यवस्था ध्वस्त हुई, तो अनुच्छेद 370 एवं 35ए का खात्मा स्वमेव होता चला गया... अब घाटी में लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव कराने के लिए परिसीमन की प्रक्रिया को पूर्ण कर लिया गया है... यही नहीं सरकारी नौकरी एवं पुनर्वास कार्य को लेकर भी तेज गति से निर्णय लिए जा रहे हैं... घाटी में पहली बार पाकिस्तान से आए 5400 परिवारों को मताधिकार का हक भी मिलने वाला है... क्योंकि 68 साल बाद जमीन का हक मिलना अपने आप में महत्वपूर्ण था... यह परिवार सांबा और जम्मू जिले में बसे हैं और पश्चिमी पाकिस्तान से शरणार्थी के रूप में आकर बसे थे... 1954 में जम्मू, सांबा और कठुआ में इन्हें 46,666 कनाल (5833 एकड़) अब जमीन दी गई थी, लेकिन मालिकाना हक के लिए वे 68 वर्षों से इंतजार कर रहे थे... अब इन्हें नई व्यवस्था के तहत जम्मू-कश्मीर का नागरिक मानकर मताधिकार भी प्रदान किया है और पहली बार ये पाकिस्तानी शरणार्थी भारतीय नागरिक के रूप में चुनाव में मतदान करेंगे... ये सारी बदलती प्रक्रियाएं और सकारात्मक पहल उन लोगों को कड़ा जवाब है, जम्मू-कश्मीर को आतंकवाद की आग में झोंकते रहे हैं...