समाजोपयोगी कर्म ही जीवन की सार्थकता
   Date20-Sep-2022

dharmdhara
धर्मधारा
म नुष्य का जीवन मिलता अनेकों को है, पर उसका सदुपयोग विरले ही कर पाते हैं। सामान्य दृष्टि से लौकिक विकास को ही लोग मानवीय जीवन का चरम उद्देश्य मान बैठते हैं और उसी से जुड़ी स्वार्थ-इच्छाओं-कामनाओं वासनाओं को पूर्ण करने में मनुष्य के रूप में मिले इस दैवीय अनुग्रह की इतिश्री मान बैठते हैं। यदि स्वार्थपूर्ति ही मानवीय जीवन का एकमात्र उद्देश्य हो तो ऐसे जीवन को देवदुर्लभ क्यों कहा जाए? उसकी संभावनाओं की तुलना दिव्यता व महानता से क्यों की जाए? मात्र लौकिक-सांसारिक कामनाओं की पूर्ति करना मानवीय जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता।
सत्य तो यह है कि मनुष्य अपने आंतरिक जीवन में सद्भावनाओं व सदविचारों से ओत-प्रोत हो एवं बाह्य जीवन में सत्कर्मों से पहचाना जाए तो मनुष्य जीवन का मिलना सार्थक कहा जा सकता है। आंतरिक दृष्टि से परिष्कार हो व बाह्य जीवन लोकोत्थान व समाजोपयोगी कृत्यों में निमग्न हो तो इसे ही आत्मकल्याण कहा जा सकता है। इस पथ पर चलने वाले ही लौकिक सुख एवं पारलौकिक आनंद के अधिकारी बनते हैं। आध्यात्मिक सिद्धियाँ व यौगिक विभूतियां भी उन्हें ही हस्तगत होती हैं, जो तप-तितिक्षा से परिपूर्ण जीवन, उत्कृष्ट उद्देश्यों को ध्यान में रखकर व्यतीत करते हैं। न्यूनतम में निर्वाह, ऊंचे उद्देश्यों के लिए जीवनयापन, प्रत्येक क्षण का सत्कर्मों में नियोजन-ये ही आध्यात्मिक जीवन का राजमार्ग हैं और इन्हें त्यागकर व्यर्थ के झंझटों में पडऩे वाले क्लेश सहते व कष्ट पाते हैं। वे मात्र लौकिक आकांक्षाओं की पूर्ति में जीवन लगाते व गंवाते हैं और इतने जन्मों में भटकने के बाद मिले इस बहुमूल्य अवसर को यों ही गंवाकर खाली हाथ चले जाते हैं।