वैश्विक सम्मेलन के निहितार्थ...
   Date19-Sep-2022

vishesh lekh
उज्बेकिस्तान की राजधानी समरकंद में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन सम्मेलन के अनेक क्षेत्रीय और वैश्विक निहितार्थ हैं... आने वाले दिनों में इस सम्मेलन की गूंज वैश्विक कूटनीति में महसूस हो सकती है... एक ही सम्मेलन में हमलावर रूस, साम्राज्यवादी चीन, अडिग ईरान, विशाल उभरते भारत और दर-दर मदद मांगते पाकिस्तान की मौजूदगी पर बहुत से देशों की नजर होगी... विशेष रूप से अमेरिका और नाटो के देशों की इस पर पैनी निगाह होगी... दूसरी ओर, एक हद तक अलग-थलग पड़े पुतिन इन दिनों विश्व स्तर पर मंच खोज रहे हैं, जो उन्हें शंघाई सहयोग संगठन से बेहतर कहीं और नहीं मिल सकता... वह अवश्य दर्शाना चाहेंगे कि चीन और भारत जैसे विशालकाय देश उनके साथ खड़े हैं... लगभग 18 देशों के इस सहयोग संगठन को अपने खेलों का आयोजन करने की सलाह देकर पुतिन ने यह बताने की कोशिश की है कि इस संगठन का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है... क्या आर्थिक सहयोग से आगे बढ़कर ये देश सोचने लगे हैं..? क्या इन देशों में आर्थिक सहयोग को लेकर कोई शिकायत नहीं रही..? सच यह कि किसी भी अन्य प्रकार के सहयोग को विस्तार देने से पहले इस संगठन के देशों को ईमानदारी से आर्थिक सहयोग को मजबूत बनाना चाहिए... बहरहाल, शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बताया है कि एससीओ के सदस्य देश वैश्विक अर्थव्यवस्था में लगभग 30 प्रतिशत का योगदान देते हैं और विश्व की 40 प्रतिशत आबादी इन देशों में निवास करती है... भारत एससीओ सदस्यों के बीच अधिक सहयोग और आपसी विश्वास का समर्थन करता है... प्रधानमंत्री ने इन देशों के बीच बेहतर आपूर्ति शृंखला बनाने की यथोचित पैरवी की है... हालांकि, यह काम बहुत कठिन है... पाकिस्तान जहां हमें सामरिक रूप से तनाव दे रहा है, वहीं चीन के निशाने पर हमारी समग्र अर्थव्यवस्था भी है... यही कारण है कि चीन नीति के तहत भारत को आत्मनिर्भर बनने से रोकना चाहता है... चीन पहले से दुनिया का मैन्युफेक्चरिंग हब है और भारत अब उभरने की घोषणा कर रहा है... भारत का बाजार एससीओ के देशों में फैले, तो भारत को लाभ है... पर सच्चाई यह है कि दर-दर मदद मांग रहा पाकिस्तान भी भारत के प्रति अनुकूल रवैया रखने के लिए तैयार नहीं है... फिर सवाल यहीं आकर अटक जाता है कि भारत ऐसे संगठन से दिलोजान से कितना जुड़े, जिसके कुछ सदस्य देश आतंकवाद के प्रत्यक्ष या परोक्ष पक्षधर हैं..? गौर कीजिए, चीन या पाकिस्तान के शासनाध्यक्षों के साथ प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात नहीं हुई है... प्रधानमंत्री ने इन दोनों देशों के नेताओं से दूरी बरतते हुए अपना साफ संदेश दे दिया है। बंदूकें और बातचीत एक साथ कैसे चले..? भारत यदि चीन को आतंकवाद का दर्द दे रहा होता, तो चीन के नेता क्या करते..?
दृष्टिकोण
खैराती रेवडिय़ों का खेल....
दिल्ली में आआपा सरकार अब खैराती रेवडिय़ों अर्थात मुफ्त की राहतों को वैकल्पिक बनाने जा रही है... इससे कोर्ट और संवैधानिक व्यवस्था को नजरंदाज करने का हथकंडा ही माना जाएगा...नए नियम लागू होने के बाद हजारों ऐसे लोगों के सामने समस्या खड़ी होगी कि वे मुफ्त बिजली पाने के लिए कैसे आवेदन करें, जो झुग्गी और अवैध कालोनियों में रहते या ऐसी जगहों में किराए पर रहते हैं... कहीं फिर से बिजली चोरी की प्रवृत्ति न बढ़े... योजनाओं को लागू करने से पहले उनके व्यावहारिक पक्षों का आकलन जरूर होना चाहिएं... क्योंकि अब दिल्ली सरकार ने फैसला किया है कि उन्हीं लोगों को बिजली मुफ्त या सस्ती मिलेगी, जो इसकी मांग करेंगे... यानी अब उपभोक्ता चाहें तो मुफ्त बिजली की सुविधा लेना छोड़ सकते हैं... दिल्ली सरकार का कहना है कि कुछ लोगों की मांग थी कि जब हम बिजली का बिल चुका सकते हैं, तो हमें क्यों मुफ्त या रियायती बिजली दी जा रही है... इसे वैकल्पिक बनाना और इससे मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल स्कूलों और अस्पतालों पर किया जाना चाहिए... अब लोगों को मुफ्त या रियायती बिजली पाने के लिए एक फार्म भर कर जमा करना होगा... अगले महीने से नई योजना लागू हो जाएगी... अभी तक सरकार दो सौ यूनिट बिजली सभी को मुफ्त देती है, जिसका लाभ तीस लाख परिवार उठाते हैं... दो सौ से चार सौ यूनिट तक की बिजली पर रियायत यानी सबसिडी दी जाती है... उन्हें आधा भुगतान करना होता है, जिसका लाभ करीब सत्रह लाख लोग उठाते हैं... अब जो लोग इस सुविधा को छोडऩा चाहते हैं, वे छोड़ सकते हैं...