चरित्र का अभिप्राय है जीवन पद्धति
   Date19-Sep-2022

dharmdhara
धर्मधारा
आ ज के युग का एक बड़ा विरोधाभास है कि एक ओर तो मनुष्य ज्ञान-विज्ञान की प्रगति के चरण बिंदु को छू रहा है, वहीं दूसरी ओर मानवीय जीवन-मूल्यों, नैतिक आचरण तथा चरित्र के मामले में रसातल को पहुंच रहा है। एक प्रसिद्ध कहावत है धन खोया समझो कुछ नहीं खोया, स्वास्थ्य खोया तो कुछ अवश्य खोया, लेकिन अगर चरित्र खोया तो निश्चित ही सब कुछ खो दिया। इससे चरित्र की महत्ता उजागर होती है। चरित्र मनुष्य का अद्वितीय गुण है। वास्तव में नागरिकों के चरित्र में ही राष्ट्र का चरित्र झलकता है। जिस राष्ट्र के वाशिंदों ने अपना चरित्र खो दिया, समझो उसका भविष्य अंधकारमय है। सामान्यत: चरित्र का अर्थ बड़े सीमित दायरे में लिया जाता है। प्राय: किसी महिला के प्रति अभद्र व्यवहार करने वाले व्यक्ति को तुरंत दुष्चरित्र करार दे दिया जाता है, किन्तु अन्य असामाजिक तत्वों को जैसे भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, तस्करी, मिलावट, जमाखोरी आदि में लिप्त रहने वालों अथाव समाज में हिंसा व जाति, धर्म, संप्रदाय रंग, नरल व भाषा के आधार पर घृणा व अलगाव की कुत्सित भावना फैलाने वालों को दुष्चरित्र नहीं ठहराया जाता और तद्नुसार उनकी भत्र्सना नहीं की जाती है, यह उचित नहीं है। वास्तव में चरित्र शब्द बड़ा व्यापक है। चरित्र मानवीय गुण ही नहीं, इसमें एक समग्र जीवन पद्धति का समावेश है। हमारे आचार-विचार, रहन-सहन, बोलचाल, आजीविका अर्जित करने के तरीके, हमारी कार्यप्रणाली, अपने संगी-साथियों, परिवार, समाज व राष्ट्र के प्रति अपनी कर्तव्यनिष्ठा तथा अपनी आशा-आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए किए जाने वाले प्रयास आदि सभी चरित्र के दायरे में आते हैं।