आरक्षण पर तार्किक बहस...
   Date17-Sep-2022

vishesh lekh
आरक्षण की जब बात निकलती है तो इससे जुड़े राजनीतिक लाभ और सामान्य नुकसान के साथ ही राष्ट्रीय एकता के मान से जो आशंकाएं गहराती है उनका ध्यान रखा जाना जरूरी है...इसलिए आरक्षण पर एक तार्किक बहस न्यायालय से चल निकली है जो दूर तक जाना चाहिए...आर्थिक आधार पर आरक्षण रहेगा या नहीं..,यह सर्वोच्च न्यायालय को तय करना है..,लेकिन दुनिया में अनेक देशों में गरीब वर्गों को आगे लाने के उपाय होते रहे हैं.., भारत में भी लगातार आजमाए जा रहे हैं...गरीबी के आधार पर दिए जा रहे आरक्षण को यदि निशाने पर लिया गया है..,तो जाहिर है, मामला अतिमहत्वपूर्ण हो गया है और सुनवाई प्रधान न्यायाधीश यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ कर रही है... संविधान पीठ को अहम फैसला करना है... उसके आधार पर शायद आरक्षण के नियम-कायदों में विधायी बदलाव की भी जरूरत पड़ेगी... संविधान में संशोधन की जरूरत पड़ेगी, ताकि आर्थिक आधार पर आरक्षण को ज्यादा व्यवस्थित किया जा सके...अभी हर राज्य अपने-अपने हिसाब से ऐसे आरक्षण की व्यवस्था कर रहा है, यहां पूरे देश में एकरूपता जरूरी है...इधर, बीच-बीच में संविधान पीठ की ओर से जो टिप्पणियां आ रही हैं, उन्हें आतुर भाव से सुना जा रहा है...सुनवाई के दौरान संविधान पीठ ने कहा है..,'सरकार आर्थिक मानदंडों के आधार पर नीतियां बनाती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ऐसी नीतियों का लाभ लोगों तक पहुंचे...आर्थिक मानदंड एक सही आधार है और वर्गीकरण के लिए एक सही तरीका है...यह प्रतिबंधित नहीं है...Ó आरक्षण पर देश की सर्वोच्च अदालत में उपयोगी बहस स्वागत योग्य है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को मिलने वाले आरक्षण को गंभीर चुनौती दी गई है और इस पर सर्वोच्च न्यायालय का रुख मानीखेज है...सुनवाई के दौरान संविधान पीठ ने यह इशारा किया है कि किसी वर्ग तक सरकारी नीतियों का लाभ पहुंचाने के लिए आर्थिक आधार पर नियम तय करने को प्रतिबंधित नहीं किया गया है...आर्थिक आधार पर आरक्षण को चुनौती देने वालों की दलील है कि संविधान में ऐसे आरक्षण का प्रावधान नहीं है..,यह केवल जाति के आधार पर ही दिया जा सकता है...आरक्षण की शुरुआत सामाजिक भेदभाव मिटाने के लिए हुई थी..,यह कोई गरीबी हटाओ कार्यक्रम नहीं था...हालांकि, आरक्षण से भी जहां एक ओर, सामाजिक भेदभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है..,पर इससे एक बड़ी आबादी की गरीबी जरूर दूर हुई दिखती है...क्रीमी लेयर की भी चर्चा होती रही है..,लेकिन सामाजिक भेदभाव या जातिभेद अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है...वैसे एक अन्य आधार पर भी इस आरक्षण का विरोध हो रहा है...यह सही सवाल उठाया गया है कि यदि ओबीसी, एससी और एसटी की आबादी 85 फीसदी है और उन्हें करीब 50 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है.., जबकि पांच फीसदी ईडब्ल्यूएस को 10 फीसदी आरक्षण मिलेगा..? यह आपत्ति बहस की एक जायज वजह है...यदि समानता लाना है।
दृष्टिकोण
मरणासन्न स्थिति में कांग्रेस ...
एक तरफ कांग्रेस भारत जोडऩे की बात कर रही है दूसरी तरफ उसका ही शेष बचा कुनबा खत्म होने के कगार पर है...गोवा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है...गोवा में कांग्रेस विधायक दल में टूट पार्टी के लिए कतई अच्छी खबर नहीं है...सवाल है कि जब देश की सबसे पुरानी पार्टी के शीर्ष नेता 'भारत जोड़ो यात्राÓ पर निकले हैं..,तब गोवा में पार्टी के आठ विधायकों ने पाला क्यों बदला..? वहां अब पार्टी के सिर्फ तीन विधायक बचे हैं...ये विधायक दलबदल कर सत्तारूढ़ भाजपा में चले गए हैं...राजनीति और राजनीतिक दबाव अपनी जगह है, लेकिन गोवा में कांग्रेस का निरंतर कमजोर होना अपने आप में अध्ययन का विषय है...ऐसे दलबदल के लिए कभी प्रलोभन, तो कभी भयादोहन को जिम्मेदार माना जाता है..,लेकिन ऐसा कांग्रेस के साथ बार-बार हो रहा है..,तो उसकी चिंता बढ़ जानी चाहिए...क्या पार्टी का वैचारिक आधार कमजोर हुआ है..? क्या पार्टी अपने नेताओं तक अपनी वैचारिक मजबूती का संचार करते रहने में नाकाम हो रही है..? किसी पार्टी के पास सत्ता न हो.., तो उसके नेताओं का राजनीति में टिकना चुनौतीपूर्ण होता है..,तब पार्टी के इतिहास, भूगोल और भविष्य की संभावनाओं का आकलन करके ही नेता उसमें टिक पाते हैं...आज की राजनीति में किसी दल को तोडऩे की रणनीति आश्चर्य में नहीं डालती..,लेकिन पार्टी को बचाने और नेताओं को राजी रखने के यथोचित प्रयासों का न होना ज्यादा चिंताजनक है...गोवा के राजनीतिक इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है..,जब धर्म के नाम पर शपथ लेकर पार्टी विधायक बने लोगों ने पाला बदला है...