श्रद्धा आध्यात्मिक उन्नति का सूत्र
   Date17-Sep-2022

dharmdhara
धर्मधारा
मनुष्य के जीवन को विकास की अंतिम सीढ़ी तक पहुंचाने के लिए जिस संबल की आवश्यकता होती है-उसका नाम 'श्रद्धाÓ है। बिना श्रद्धा के सांसारिक सफलताएं तो मिल सकती है, परंतु आत्मिक संतोष का मिल पाना संभव नहीं हो पाता है। आत्मिक संतोष, आध्यात्मिक पुरुषार्थ से ही संभव है और अध्यात्म का मूल प्राण, श्रद्धा में सन्निहित है। मात्र लौकिक ही नहीं, वरन पारलौकिक जीवन में भी सुख व संतोष का आधार श्रद्धा से ही बनता है। श्रद्धा होने पर मृत्यु एक उत्सव बन जाती है और पारलौकिक जीवन की यात्रा, अपने ईष्ट से मिलने का आयोजन बन जाता है। श्रद्धा का होना, अंत:करण को एक ऐसे आनंद से भर देता है, जिसकी कोई तुलना किसी भी सांसारिक सुख से संभव नहीं है। उस आनंद के आगे, इस संसार का बड़े से बड़ा सुख भी तुच्छ प्रतीत होता है। श्रद्धा का अर्थ आत्मविश्वास व ईश्वर विश्वास से लगाया जाना चाहिए। श्रद्धा, अंध श्रद्धा या अंधविश्वास नहीं है। श्रद्धा कभी अपने विवेक को त्यागने की प्रेरणा नहीं देती, जबकि अंधश्रद्धा प्रतीकों में उलझकर बैठ जाती है एवं मूल उद्देश्य को भुला बैठती है। इसीलिए मानसकार ने लिखा है-'भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।Ó गोस्वामी तुलसीदास जी अपनी इस प्रार्थना में कहते हैं कि श्रद्धा और विश्वास, शंकर भगवान एवं मां पार्वती के समान हैं। दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन का कार्य भगवान शिव करते हैं तो वही सत्प्रवृत्तियों के अभिवद्र्धन का कार्य, मां पार्वती करती हैं। एक कार्य श्रद्धा से संभव है तो दूसर विश्वास से। साधनापथ के पथिक के लिए तो, अमृत तुल्य है। कर्म-प्रारब्धवश, जीवन में अच्छी-बुरी परिस्थितियां सदैव निर्मित होती रहती हैं। इनसे पार निकलते समय यदि साथ में श्रद्धा का सहारा हो तो सभी कठिनाइयां देखते-देखते पार हो जाती है।
आध्यात्मिक उन्नति की आकांक्षा रखने वालों को श्रद्धाी के इस एक गुण को ही भीतर जगाने की जरूरत है, शेष श्रद्धा स्वयं करा लेती है।