अफ्रीकी चीतों के लिए कूना का चयन और संभावनाएं
   Date16-Sep-2022

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प्रमोद भार्गव
लं बे प्रयास के बाद भारत में चीतों की वापसी श्योपुर जिले के कूनो-पालपुर अभ्यारण्य में हो रही है। देश की आजादी के 75वें वर्ष के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में पेट्रोलियम, पर्यावरण एवं प्राकृतिक ऊर्जा मंत्रालय ने अखबारों में विज्ञापन देकर इनके स्वागत की शुरुआत कर दी है। चीता लाए जाने के लिए भारत और नामीबिया सरकार के बीच समझौता हो चुका है। चीतों को अभ्यारण्य में लाए जाने के बाद करीब एक माह एकांत वास में रखा जाएगा। जिससे चीते यहां के वातावरण में ढल जाए। चीतों की सुरक्षा के लिए इन्हें जिस बाड़े में रखा जाना है, उस क्षेत्र में मौजूद 70 तेंदुओं को बाहर किया गया है और चीतों को भरपूर भोजन मिले, इसके लिए कुछ चीतल पेंच राष्ट्रीय उद्यान से लाए जा रहे हैं। 27 चीतलों की यह खोप आ भी चुकी है। हालांकि इस पूरे क्षेत्र में हजारों की संख्या में चीतल, सांभर, नीलगाय, जंगली सूअर और खरगोश जैसे प्राणी मौजूद हैं। चीतों की पहली खेप में चार नर और चार मादा लाए जा रहे हैं। फिलहाल इन्हें पांच किलोमीटर व्यास के बाड़े में रखा जाएगा।
यह संयोग ही है कि करीब 75 साल पहले भारत की धरती से चीते विलुप्त हो गए थे, लेकिन अब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से चीतों के पुनर्वास की अनुमति मध्यप्रदेश सरकार के वन-विभाग को मिली थी। जिस पर अमृत महोत्सव के दौरान क्रियान्वयन होने जा रहा है। यह अनुमति राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की याचिका पर दी गई है। टाईगर स्टेट का दर्जा प्राप्त मध्यप्रदेश में इन चीतों को दक्षिण अफ्रीका से लाकर कूनो-पालपुर अभ्यारण्य में नया ठिकाना बनाया गया है। यहां पिछले दो दशक से चीतों को बसाने की तैयारी के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाई जा रही हैं। दरअसल, चीते को घास के मैदान वाले जंगल पसंद हैं और कूनो में घास के जंगल खूब हैं। हालांकि इन्हें बसाने के विकल्प के रूप में सागर जिले के नौरादेही अभ्यारण्य, राजस्थान के शाहगढ़ व जैसलमेर के थार क्षेत्र भी तलाशे गए थे, लेकिन इन वनखंडों में चीतों के अनुकूल प्राकृतिक आहार, प्रजनन व आवास की सुविधा न होने के कारण कूनो को ही ज्यादा श्रेष्ठ माना गया।
एक समय था जब चीते की रफ्तार भारतीय वनों की शान हुआ करती थी। लेकिन 1947 के आते-आते चीतों की आबादी पूरी तरह लुप्त हो गई। 1948 में अंतिम चीता छत्तीसगढ़ के सरगुजा में देखा गया था। जिसे मार गिराया गया। चीता तेज रफ्तार का आश्चर्यजनक चमत्कार माना जाता है। अपनी विशिष्ट एवं लोचपूर्ण देहयष्टि के लिए भी इस हिंसक वन्य जीव की अलग पहचान थी। शरीर में इसी चपलता के कारण यह जंगली प्राणियों में सबसे तेज दौडऩे वाला धावक है। इसलिए इसे जंगल की बिजली भी कहा गया। हालांकि भारत में चीतों के पुनर्वास की कोशिशें असफल रही हैं। दरअसल, दक्षिण अफ्रीका के जंगलों से 1993 में दिल्ली के चिडिय़ाघर में चार चीते लाए गए थे, लेकिन छह माह के भीतर ही ये चारों चीते मर गए। चिडिय़ाघर में इनके आवास, परवरिश व प्रजनन के पर्याप्त उपाय किए गए थे, लिहाजा उम्मीद थी कि यदि इनकी वंश वृद्धि होती है तो देश के अन्य चिडिय़ाघरों व अभ्यारण्यों में ये चीते स्थानांतरित किए जाएंगे। हालांकि चीतों द्वारा चिडिय़ाघरों में प्रजनन अपवाद घटना होती है। नतीजतन प्रजनन संभव होने से पहले ही चीते मर गए।
बीती सदी में चीतों की संख्या एक लाख तक थी, लेकिन अफ्रीका के खुले घास वाले जंगलों से लेकर भारत सहित लगभग सभी एशियाई देशों में पाया जाने वाला चीता अब पूरे एशियाई जंगलों में गिनती के रह गए हैं। राजा चीता (एसिनोनिक्स रेक्स) जिम्बाब्बे में मिलता है। अफ्रीका के जंगलों में भी गिने-चुने चीते रह गए हैं। तंजानिया के सेरेंगती राष्ट्रीय उद्यान और नामीबिया के जंगलों में गिने-चुने चीते हैं। प्रजनन के तमाम आधुनिक व वैज्ञानिक उपायों के बावजूद जंगल की इस फुर्तीली नस्ल की संख्या बढ़ाई नहीं जा पा रही है। यह प्रकृति के समक्ष वैज्ञानिक दंभ की नाकामी है। जूलॉजिकल सोसायटी ऑफ लंदन की रिपोर्ट को माने तो दुनिया में 91 प्रतिशत चीते 1991 में ही समाप्त हो गए थे। अब केवल 7100 चीते पूरी दुनिया में बचे हैं। एशिया के ईरान में केवल 50 चीते शेष हैं। अफ्रीकी देश केन्या के मासीमारा क्षेत्र को चीतों का गढ़ माना जाता था, लेकिन अब इनकी संख्या गिनती की रह गई है।
बीती सदी के पांचवें दशक तक चीते अमरीका के चिडिय़ाघरों में भी थे। प्राणी विशेषज्ञों की अनेक कोशिशों के बाद इन चीतों ने 1956 में शिशुओं को जन्म भी दिया, परंतु किसी भी शिशु को बचाया नहीं जा सका। चीते द्वारा किसी चिडिय़ाघर में जोड़ा बनाने की यह पहली घटना थी, जो नाकाम रही। जंगल के हिंसक जीवों का प्रजनन चिडिय़ाघरों में आश्चर्यजनक ढंग से प्रभावित होता है, इसलिए शेर, बाघ, तेंदुए व चीते चिडिय़ाघरों में जोड़ा बनाने की इच्छा नहीं रखते हैं। भारत में चीतों की अंतिम पीढ़ी के कुछ सदस्य बस्तर-सरगुजा के घने जंगलों में थे, जिन्हें 1947 में देखा गया था। प्रदेश अथवा भारत सरकार इनके संरक्षण के जरूरी उपाय करने हेतु हरकत में आती, इससे पहले ही चीतों के इन अंतिम वंशजों को भी शिकार के शौकीन राजा-महाराजाओं ने मार गिराया और वन की इस तेज गति के ताबूत में अंतिम कील भी ठोंक दी। इस तरह भारतीय चीतों की नस्ल पर पूर्ण विराम लग गया था।
हमारे देश के राजा-महाराजाओं को घोड़ों और श्वानों (कुत्तों) की तरह चीते पालने का भी शौक था। चीता शावकों को पालकर इनसे जंगल में शिकार कराया जाता था। राजा लोग जब जंगल में आखेट के लिए जाते थे, तो प्रशिक्षित चीतों को बैलगाड़ी में बैठाकर साथ ले जाते थे। इनकी आंखों पर पट्टी बांध दी जाती थी, जिससे यह किसी मामूली वन्य जीव पर न झपटे। जब शिकार राजाओं की दृष्टि के दायरे में आ जाता था, तो चीते की आंखों की पट्टी खोलकर शिकार की दिशा में हाथ से इशारा कर दिया जाता था। पलक झपकते ही शिकार चीते के कब्जे में होता। शिकार का यह अद्भुत करिश्मा देखना भी एक आश्चर्यजनक रोमांच की बात रही होगी? भारत के कई राजमहलों में पालतू चीतों से शिकार कराने के अनेक चित्र अंकित हैं। मुगल काल में अकबर ने सैकड़ों चीतों को बंधक बनाकर पाला। मध्यप्रदेश में मांडू विजय से लौटने के बाद अकबर ने चंदेरी और नरवर (शिवपुरी) के जंगलों में चीतों से वन्य प्राणियों का शिकार कराया। नरवर के जंगलों में अकबर ने जंगली हाथियों का भी खूब शिकार किया। ग्वालियर रियासत में सिंधिया राजाओं ने भी चीते पाले हुए थे, लेकिन चीतों को पाले जाने का शगल ग्वालियर रियासत में बीसवीं सदी के अंत तक ही संभव रहा। मार्को पोलो ने तेरहवीं शताब्दी के एक दस्तावेज का उदाहरण देते हुए बताया है कि कुबलई खान ने अपने ठिकानों पर एक हजार से भी अधिक चीते पाल रखे थे। इन चीतों के लिए अलग-अलग अस्तबल थे। चीते इस पड़ाव की चौकीदारी भी करते थे। बड़ी संख्या में चीतों को पालतू बनाने से इनके प्रकृतिजन्य स्वभाव पर प्रतिकूल असर तो पड़ा ही, इनकी प्रजनन क्रियाओं पर भी बेहद प्रतिकूल असर पड़ा। गुलामी की जिंदगी गुजारने व सईस के हंटर की फटकार की दहशत ने इन्हें मानसिक रूप से दुर्बल बना दिया, जिससे चीतों ने विभिन्न शारीरिक क्रियाओं में रूचि लेना बन्द कर दिया। जब चाहे तब भेड़-बकरियों की तरह हांक लगा देने से भी इनकी सहजता प्रभावित हुई। चीतों की ताकत में कमी न आए इसके लिए इन्हें मादाओं से अलग रखा जाता था। बैलों की तरह नर चीतों को बधिया करने की क्रूरताएं भी राजा-महाराजाओं ने खूब अपनाईं। इन सब कारणों से जंगल की इस बिजली की रोशनी मंद पड़ती गई और इक्कीसवीं शताब्दी के मध्य के आसपास एशियाभर में बुझ भी गई।
चिडिय़ाघरों में चीतों की आयु 15-16 वर्ष तक देखी गई है। इनकी औसत उम्र 20 साल होती है। दरअसल एक ओर तो हम विलुप्त होते प्राणियों के संरक्षण में लगे हैं, दूसरी तरफ आधुनिक विकास इनके प्राकृतिक आवास उजाड़ रहा है। पर्यटन से हम आमदनी की बात चाहे जितनी करें, लेकिन पर्यटकों को बाघ, तेंदुआ व अन्य दुर्लभ प्राणियों को निकट से दिखाने की सुविधाएं, इनके स्वाभाविक जीवन को अंतत: बुरी तरह प्रभावित करती हैं। यहां विचारणीय प्रश्न यह भी है कि जब चीता विलुप्ति के निकट पहुंच रहा था, तभी इसको बचाने के उपाय सफेद शेर की तरह क्यों नहीं किए गए? चीते जैसे प्राणियों के आचार-व्यवहार के साथ संकट यह भी है कि ये नए जलवायु में आसानी से ढल नहीं पाते हैं। (लेखक वरिष्ठ
साहित्यकार और पत्रकार हैं।)