आंकड़े और आर्थिक परिदृश्य...
   Date15-Sep-2022

vishesh lekh
आर्थिक परिदृश्य का हमारे भारतीय पर्वों, उत्सवों और तीज-त्योहार से बहुत गहार नाता है... क्योंकि ये बाजार में चहल-पहल बढ़ाने का सबसे बड़ा जरिया है... इसलिए त्योहारों के मान से आने वाले समय में आर्थिक स्थितियां किस तरह आकार लेगी, यह इस पर निर्भर करेगा कि महंगाई के आंकड़े कैसे संकेत कर रहे हैं..? त्योहारों का मौसम शुरू हो चुका है और अगली दो तिमाहियां खरीदारी की दृष्टि से उत्साहजनक मानी जाती हैं... मगर सरकार का ध्यान अगर महंगाई को काबू में करने पर नहीं है, तो इन स्थितियों का शायद ही पर्याप्त लाभ मिल पाए... कच्चे तेल की कीमतें उतार पर होने के बावजूद पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में कमी नहीं की जा रही... इससे महंगाई पर काबू पाना मुश्किल बना हुआ है... दरअसल, सरकार अभी आंकड़ों के खेल में उलझी हुई है, जबकि जमीनी हकीकत आंकड़ों से अलग है... महंगाई की मार आम लोगों पर पड़ रही है... उसे जब तक जमीन पर उतर कर जांचने का प्रयास नहीं होगा, तब तक आंकड़ों से कोई समाधान नहीं निकलेगा... ताजा आंकड़ों में सब्जी, मसाले, जूते-चप्पल जैसी रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली चीजों के दाम बढ़ गए हैं... ईंधन की कीमतों में कटौती करके कुछ हद तक इन पर लगाम लगाया जा सकता है, मगर सरकार न जाने क्यों यह कदम उठाने से बच रही है... फिर औद्योगिक उत्पादन और निर्यात जैसे मोर्चे पर निराशाजनक प्रदर्शन नए रोजगार के सृजन में बाधा उत्पन्न कर रहा है... नए रोजगार नहीं पैदा होंगे, तो बाजार की चमक फीकी रहेगी और महंगाई पर काबू पाना भी मुश्किल बना रहेगा... खुदरा महंगाई का नया आंकड़ा निश्चय ही सरकार के लिए चिंता का सबब है... पिछले तीन महीनों से लगातार महांगाई का रुख नीचे की तरफ बना हुआ था, मगर अगस्त में फिर उसमें बढ़ोतरी दर्ज हुई है... जुलाई में खुदरा महंगाई 6.71 फीसद तक उतर आई थी, मगर अगस्त में बढ़ कर वह सात फीसद पर पहुंच गई... रिजर्व बैंक ने माना है कि अगर महंगाई चार से छह फीसद के बीच बनी रहती है, तो आर्थिक विकास दर में संतोषजनक वृद्धि की उम्मीद की जा सकती है... इसके अलावा औद्योगिक उत्पादन की विकास दर भी निराशाजनक ही दर्ज हुई है... विनिर्माण, खनन, बिजली आदि क्षेत्रों में काफी खराब प्रदर्शन देखा गया है... इस तरह औद्योगिक विकास दर पिछले चार महीनों के सबसे निचले स्तर 2.4 फीसद पर पहुंच गई है... यानी उत्पादन और खपत दोनों मोर्चों पर शिथिलता चिंता पैदा करने वाली है...
दृष्टिकोण
चिंता बढ़ाती वैमनस्यता...
समाज में बनते हिंसक मानस की कुछ वजहें तो समझी जा सकती हैं... पिछले कुछ सालों से जिस तरह उन्मादी तत्त्व समाज को सुधारने के नाम पर हिंसा को हथियार के रूप में इस्तेमाल करते देखे जाने लगे हैं... सामुदायिक वैमनस्यता को बढ़ावा देते हैं... इस तरह अपने ही बीच रहने वाले बहुत सारे लोगों को कई लोग शक की नजर से देखने लगे हैं... तमाम संचार माध्यमों पर अपराध और हिंसा को आम घटना की तरह परोसा जाने लगा है... अपराधियों को समाज के कई लोग सम्मानित करते हैं, उन सबसे हमारे सामाजिक मूल्यों को गहरा आघात लगा है... उन मूल्यों की स्थापना कैसे हो, यह बड़ी चिंता का विषय है... स्कूलों में नैतिक शिक्षा का पाठ तो पढ़ाया जाता है, मगर समाज के अगुआ अपने आचरण से जब तक उन मूल्यों को स्थापित नहीं करेंगे, हिंसक वृत्ति का उन्मूलन कठिन बना रहेगा... यह समझना मुश्किल होता जा रहा है कि लोगों में असहनशीलता और हिंसा की प्रवृत्ति इतनी कैसे बढ़ रही है कि जिन मामलों में उन्हें कानून की मदद लेनी चाहिए, उनका निपटारा भी वे खुद करने लगते हैं और इसका नतीजा अक्सर किसी की मौत के रूप में सामने आता है... दिल्ली में जिस तरह एक व्यक्ति को मोबाइल फोन चोरी करने के आरोप में कुछ लोगों ने पीट-पीट कर मार डाला, वह इसका ताजा उदाहरण है... जिस युवक को पीट-पीट कर मार डाला गया, वह रात को एक कारखाने में घुसा और मोबाइल फोन चोरी कर लिया... उसे चोरी करते वहां उपस्थित एक व्यक्ति ने देख लिया और उसे पकड़ कर कुछ लोगों के साथ मिल कर पीटना शुरू कर दिया... पहले उसके बाल काटे और फिर इतना पीटा कि उसने वहीं दम तोड़ दिया... उसके शव को सड़क कर फेंक दिया गया... पुलिस ने सीसीटीवी की मदद से आरोपियों का पता लगाया... हालांकि हमारे समाज में यह आम प्रवृत्ति है कि किसी चोर के पकड़े जाने पर लोग खुद उसे पीट-पीट कर सजा देने का प्रयास करते हैं... मगर दिल्ली में हुई घटना लोगों में जड़ें जमा चुकी हिंसा का परिचायक है...
अनेक ऐसे उदाहरण हैं, जब लोग मामूली बात पर कहा-सुनी होने या छोटी-मोटी आपराधिक घटनाओं पर भी खुद इंसाफ करने की नीयत से हिंसा का सहारा लेते हैं। ऐसी भी अनेक घटनाएं देखी गई हैं, जब किसी की हत्या करके अफसोस के बजाय कई लोग गर्व का अनुभव करते हैं। मानो किसी की जान ले लेना अब खेल होता गया है। इसका क्या अर्थ लगाया जाना चाहिए? क्या लोगों में पुलिस और न्याय व्यवस्था पर भरोसा कमजोर हुआ है? क्या अब लोगों में इतना भी विवेक नहीं रहा कि चोरी, जेबकरती जैसी आपराधिक घटनाओं की शिकायत पुलिस को करनी चाहिए और दंड तय करने का काम न्यायपालिका पर छोड़ देना चाहिए।
किसी की जान ले लेने से भला कहां अपराध पर लगाम लगता है। किसी को सबक सिखाने का यह तरीका तो नहीं हो सकता कि उसे जान से ही मार डाला जाए। कैसे हमारे समाज से यह समझ और मानवीय तकाजा खत्म होता जा रहा है। हालांकि संबंधित मामले में पुलिस ने हत्या के आरोपियों की पहचान कर ली है और उन्हें इस तरह कानून को हाथ में लेने की सजा भी मिलने की उम्मीद है। मगर क्या इस तरह समाज की संवेदनशीलता लौटाई जा सकती है।