परमतत्व की प्राप्ति में दृढ़ निश्चय अनिवार्य तत्व
   Date15-Sep-2022

dharmdhara
धर्मधारा
सं सारमें तीन प्रकारके मनुष्य हो सकते हैं-(1) द्वेष रखने वाले, (2) स्नेह करने वाले और (3) उदासीन रहने वाले। ये तीनों ही प्रकारके मनुष्य दृढ़ निश्चयी साधक की सहायता करते हैं। ध्रुव वास्तव में ध्रुव था। अत: द्वेष रखने वाली विमाता ने उसे भजन के लिए प्रेरित किया, स्नेहमयी जननीने भी भगवद् भजन का ही समर्थन किया और उदासीन संत देवर्षि श्रीनारद ने भी द्वादशाक्षर मन्त्र एवं आशीर्वाद प्रदान कर उसी मार्गपर बढऩे में सहायता की। परमार्थ-पथ पर चलने में दृढ़ निश्चय अत्यन्त महत्वपूर्ण ही नहीं, नितान्त आवश्यक भी है। संसार-पथ पर चलने में प्राप्तव्य भी मिथ्या और उद्देश्य भी वस्तुत: मिथ्या ही है, परंतु परमार्थ पथ पर चलने वालों का उद्देश्य सत् एवं प्रापणीय वस्तु भी सत् है। इस प्रकार के दृढ़ निश्चय की प्राप्ति में बाधक हैं 'द्वन्द्वÓ। समझने की दृष्टि से पांच द्वन्द्व प्रमुख हैं-(1) स्तुति-निन्दा, (2) मान-अपमान, (3) आढ्यता-दरिद्रता, (4) आरोग्यावस्था-रुग्णावस्था और (5) जीवन-मृत्यु।।
यदि इन पांच प्रकार के द्वन्द्वों में समता हो जाए तो अन्य द्वन्द्वों से सुगमतापूर्वक छुटकारा हो सकता है। अत: साधक को पहले से ही यह दृढ़ विचार कर लेना चाहिए कि चाहे स्तुति हो या निन्दा, मान हो या अपमान, धन आए या चला जाए, स्वस्थ रहें या रुग्ण, जीवन रहे या मृत्यु आ जाए-हमें तो परमार्थ-पथ पर चलकर भगवत्प्राप्ति ही करनी है।
दु:ख, निन्दा, बीमारी, दरिद्रता एवं अपमान-ये सभी एक साथ मिलकर आएं तो भी हमें विचलित नहीं कर सकते, क्योंकि हमने दृढ़ निश्चय कर लिया है कि चाहे कुछ भी हो जाए, हमें तो भगवत्प्राप्ति ही करनी है।