पूर्वजों के प्रति श्रद्धा निवेदन का पर्व श्राद्ध
   Date14-Sep-2022

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धर्मधारा
आ श्विन कृष्णपक्ष शुरू होते ही पितृपक्ष का आरम्भ हो गया है। पितृपक्ष को श्राद्ध पर्व या महालय भी कहते हैं। इसमें लोग अपने पितरों के लिए श्राद्ध कर्म करते हैं। पूर्वजों के प्रति श्रद्धा निवेदित करने का यह पर्व है। हिन्दू धर्म की मान्यता में मनुष्य के ऊपर तीन प्रकार के ऋण होते हैं, पितृ ऋण, देव ऋण और ऋषि ऋण। इन तीनों में प्रमुख पितृ ऋण का निवारण पितरों के निमित्त श्राद्ध कर्म करने से होता है। वैदिक काल से ही श्राद्ध करने की परम्परा चली आ रही है। श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है। पितृपक्ष में सनातनी परम्परा को मानने वाले अपने पूर्वजों के प्रति पूरी तरह से श्रद्धावनत दिखते हैं इसलिए इसे श्राद्ध पर्व भी कहते हैं। हिन्दू संस्कृति में ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष में पितर अपने वंशजों के द्वारा किए गए पिण्डदान और तर्पण से तृप्त होते हैं। वर्षभर की प्रतीक्षा के बाद पितरों को पितृपक्ष में अपने वंशजों से श्राद्ध पाकर तृप्ति मिलती है। लोगों को पितृपक्ष ऐसा अवसर उपलब्ध कराता है जब वे अपने पुरखों की आत्मा को प्रसन्नता से भर सकें। उनकी आत्मा की तृप्ति और खुशी के लिए श्राद्ध कर्म से उनकी अगली पीढ़ी को विमुख नहीं होना चाहिए। वाल्मीकि रामायण में वनवास के दौरान प्रभु राम ने भी अपने पिता दशरथ की आत्मा की संतुष्टि हेतु पिण्डदान किया था, वे मां सीता और भाई लक्ष्मण के साथ गया भी गए जहां सभी ने मिलकर श्राद्ध कर्म किया। श्राद्ध कर्म को तीन पीढिय़ों तक की मान्यता शास्त्रों का वर्णित है। माता-पिता,जो जीवनभर अपने बच्चों की जिन्दगी को संवारने की जद्दोजहद में लगा रहता है मर जाने के बाद उनकी आत्मा की मुक्ति और प्रसन्नता के लिए उन बच्चों का भी तो कुछ फर्ज बनता है। पितृपक्ष में शास्त्र सम्मत आचार विचार का व्यवहार करके वे बच्चे अपने मां-बाप की आत्मा को गदगद कर सकते हैं। पितृपक्ष में पिण्डदान और जल तर्पण का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सालभर पितर टकटकी लगाए इन्हीं दिनों के इन्तजार में रहते हैं जब वे अपने बच्चों के द्वारा प्रेम की आहुति को पाते हैं। उन्हें कितनी खुशी होती होगी जब उनके बच्चे उनकी पूजा अर्चना करके श्रद्धा पूरित होकर उनका श्राद्ध कर्म करते हैं,इसका बखान शब्दों में कर पाना मुश्किल है। दर्भ या कुश और तिल का पितृपक्ष में खासा महत्व है। कुशा को समस्त वनस्पतियों का सार माना जाता है इसलिए तर्पण कर्म में इसके प्रयोग को प्रकृति की उपस्थिति के रूप में माना जाता है।