जनजातियों को बरगलाने के षड्यंत्र से सावधान
   Date09-Aug-2022

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डॉ. राज किशोर हांसदा
दे श में हर वर्ष 9 अगस्त को विश्व मूल निवासी दिवस के नाम पर विभिन्न स्थानों पर छोटे-बड़े कार्यक्रम होते हैं जिनमें जनजाति समाज के साथ-साथ अन्य लोग भी उत्साह से भाग लेते हैं। ऐसे अधिकार कार्यक्रमों का आयोजन चर्च या उससे प्रेरित संस्थाएं-व्यक्ति करते हैं जिनका अपना निहित उद्देश्य होता है। इस विषय की पूरी जानकारी नहीं होने के कारण जनजातियों के और हमारे भी कुछ सरल एवं उत्साही लोग उसी वातावरण में बह जाते हैं। इसलिए इस विषय को समझना आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र संघ के मूल निवासी की अवधारणा भारत के सन्दर्भ में लागू होती है या नहीं, इसे समझने की आवश्यकता है। यूएनओ के अनुसार दुनिया के लगभग 40 देशों में 43 करोड़ मूल निवासी हैं। जिनमें से लगभग 25 प्रतिशत अकेले भारत में है। पहले यह विषय अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन आईएलओ में था।आईएलओ के प्रस्ताव संख्या 169 (1989) से यह विषय प्रारम्भ हुआ।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व मूल निवासियों की स्थिति को सुधारने उनके सर्वागीण विकास- उनके हितों की रक्षा के लिए मूल निवासियों के स्थायी मंच की स्थापना 28 जुलाई 2000 को की। भूत काल से यूरोपीय देशों ने अमेरिका, आस्ट्रेलिया एवं अफ्रीकी देशों में अपनी बस्तियां बसाकर अपने साम्राज्य स्थापित किए, इस प्रक्रिया में उन्होंने वहां बसे हुए लोगों-वहां के मूल निवासियों को गुलाम बनाते हुए उन्हें वहां से खदेड़ा, उनकी संस्कृति, जीवन-दर्शन, रीति-रिवाज, मान्यताएं, धर्म नष्ट किया। भूमि सहित उनके प्राकृतिक संसाधनों पर जबरन कब्जा किया। पश्चिमी देश मानते हैं कि भारत-एशिया में भी ऐसा ही हुआ होगा जो कि सर्वथा बेबुनियाद-गलत है। परंतु अभी तक इसकी परिभाषा निश्चित नहीं हो पाई है। ऑस्ट्रेलिया में तो वहां के तत्कालीन प्रधानमंत्री केविनरूड को 13 फरवरी 2008 को अपनी संसद में वहां के मूल निवासियों से क्षमा मांगनी पड़ी थी। ऐसा उन्हें मूल निवासियों की चुराई गई पीढिय़ों के लिए करना पड़ा- वहां के मूल निवासियों के छोटे बच्चों को छीन कर चर्च या दूसरे को पालन-पोषण के लिए दे दिया गया था । यह सब उनको मुख्य समाज में घुल जाने और उनकी स्वतंत्र पहचान को नष्ट करने हेतु किया गया था।
भारत में जनजातियों सहित कोई बाहर से नहीं आया, पौराणिक काल से ही यहां सभी जातीय-जनजातीय समुदाय सौहार्द पूर्वक रहते आए हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत सरकार के प्रतिनिधि ने भी 2007 के घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर करते समय यही कहा था कि भारत में रहने वाले सभी लोग यहां के मूल निवासी हैं, हमारे यहां कोई भी बाहर से नहीं आया। भारत ने कहा कि भारत ने मूल निवासी लोगों के अधिकारों का लगातार समर्थन किया है और मूल निवासी लोगों के अधिकारों की घोषणा के लिए काम किया है। परिषद के समक्ष पाठ 11 वर्ष के कड़े परिश्रम का परिणाम था। पाठ में 'मूल निवासीÓ की परिभाषा नहीं थी। आत्मनिर्णय के अधिकार के संबंध में भारत की पूरी आबादी को मूलनिवासी माना गया था , यह केवल उन लोगों पर लागू होने के लिए समझा गया था, जो विदेशी पराधीनता के अधीन थे, न कि मूल निवासी व्यक्तियों के राष्ट्र के लिए,जिन्हें इसकी समझ हो। भारत प्रस्ताव का समर्थन करने और प्रारुप घोषणा को अपनाने के लिएके लिए तैयार था और हम इसके पक्ष में मतदान करेंगे।
13 सितंबर 2007 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा मूल निवासियों के अधिकारों की घोषणा हुई, जिसका भारत ने भी यह कहते हुए समर्थन किया कि इस देश सभी मूल निवासी है, कोई बाहर से नहीं आया। 143 ने उस प्रस्ताव उनका समर्थन किया। कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड व अमेरिका इन 4 देशों ने विरोध में मतदान किया और 13 देशों में मतदान में भाग नहीं लिया। इस घोषणा पत्र मूल निवासियों के कई अधिकारों को मान्य किया गया। उस की सबसे एवं आपत्तिजनक बात के आत्मनिर्णय के अधिकार को लेकर है। यह अधिकार किसी भी देश को कई टुकड़ों में विभाजित करने तक आगे जाएगा जो कोई भी सार्वभौम राष्ट्र या राष्ट्रीय समाज स्वीकार नहीं कर सकता।
46 बिन्दुओं के इस अधिकर पत्र की व्याख्या विश्लेषण करें तो इनमें से अधिकतर अधिकार भारत की जनजातियों को भारतीय संविधान से 1952 में ही दे दिए थे, यह प्रक्रिया अब भी जारी है। संविधान की 5वीं और 6 ठी अनुसूची, केन्द्र एवं राज्य सरकारों में जनजातीय आदिवासी कल्याण मंत्रालय, राष्ट्रीय-राज्यों के जनजाति आयोग, केन्द्र एवं राज्य की शासकीय सेवाओं में जनजातियों की जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण, उनके शैक्षिक-स्वास्थ्य आवास-पेय जल आदि हेतु विशेष प्रयास, संसद एवं विधानसभाओं प्रतिनिधित्व में आरक्षण, कृषि भूमि की सुरक्षा हेतु संरक्षणात्मक कानून इनकी परम्पराओं और रीति रिवाजों - प्रथागत कानूनों को मान्यता, अत्याचार निवारण कानून, विशेष पंचायत कानून, वन अधिकार कानून 2006 ये कुछ उदाहरण हैं। जनजातियों का इतना संरक्षण इतना प्रयास किसी देश से नहीं किया गया। पश्चिमी देशों की तरह इस देश में किसी भी राज्य सत्ता या समाज ने यहां की जनजातियों को किसी तरह से प्रताडि़त नहीं किया। दुनिया के कई देशों में तो वहां के मूल निवासियों की पूरी की पूरी नस्ल जनसंख्या, उसकी संस्कृति को नष्ट कर दिया गया। अमेरिका में रेड इडियन्स या आस्ट्रेलिया में वहां के प्राचीन मूल निवासियों के साथ साम्राज्यवादी ताकतों के अत्याचार-तथाकथित सभ्य लोगों के ऐसे दुष्कृत्यों के साफ उदाहरण हैं। अपने संविधान में भी कहीं भी नेटिव, मूल निवासी अथवा आदिवासी शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया जबकि ऑस्ट्रेलिया, कनाडा या अमेरिका में वहां के इस प्रकार के नागरिकों के लिए इन शब्दों का प्रयोग किया गया है। अपने देश में जनजाति / अनुसूचित जनजाति शब्दों का प्रयोग हुआ है। इससे भी इस समझ सकते हैं कि मूल निवासी की अवधारणा हमारे यहां लागू नहीं होती। ठीक उसी प्रकार एक और तथ्य भी हमें ध्यान रखना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र के मूल निवासियों के स्थायी मंच में वर्तमान में 14 सदस्य हैं जिनमें एक भी भारतीय नहीं है। इस मंच के इतिहास में कभी किसी भारतीय को स्थान नहीं दिया गया। यह तथ्य भी स्पष्ट करता है कि यह वैश्विक संस्थान भारतीय जनजातियों को उस अर्थ में मूल निवासी नहीं मानता जिस अर्थ में उसे मूल निवासियों के हितों की रक्षा के लिए कार्य करने की आवश्यकता है।
अब यह प्रयास हो रहा है कि भारत की जनजातियों को मूल निवासी बताकर उनके साथ अन्य दलितों- अनुसूचित जातियों (स्ष्द्धद्गस्रह्वद्यद्गस्र ष्टड्डह्यह्लद्गह्य) को भी जोड़ा जाए, हमें अलग नस्ल क्रड्डष्द्ग बताने का प्रयास किया जा रहा है। भारत एवं भारतीय, जनजाति समुदाय , विश्व के मूल निवासियों वंचितों के अधिकारों का समर्थन करते हैं, परन्तु समर्थन की इस दौड़ में हमें अन्धा होकर अपना विवेक नहीं खोना चाहिए। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जनजातियों को बरगलाने वाले ही आज हमारी धर्म-संस्कृति को हमारी पहचान को नष्ट करने में भी सबसे आगे हैं। बहुरूपिये के वेश में, परदे के पीछे कौन क्या कर रहा है, इसे समझने-समझाने की आवश्यकता है। स्वदेशी लोगों को अपनी आध्यात्मिक और धार्मिक परंपराओं, रीति-रिवाजों और समारोहों को प्रकट करने, अभ्यास करने, विकसित करने और सिखाने का अधिकार है, अपने धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों को बनाए रखने, संरक्षित करने और गोपनीयता में पहुंच का अधिकार है, उन्हें उनके समारोह की वस्तुओं के उपयोग और नियंत्रण और अंतिम संस्कार हेतु अपने संबंधियों के मानव अवशेषों के प्रत्यावर्तन का अधिकार है ।
(लेखक जनजातीय सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय सहसंयोजक हैं)