भक्ति और मनोकामना पूर्ति का काल सावन
   Date09-Aug-2022

dharmdhara
धर्मधारा
सा वन माह में प्रकृति भी वातावरण की उष्णता शांत करने के लिए जलाभिषेक करती है। अलग-अलग तीर्थों में विभिन्न जल-धाराओं का महत्व होने के कारण शिवजी की प्रसन्नता के लिए कालांतर में कावड़ यात्राओं का प्रचलन चला। इस पौराणिक व सामाजिक विधान के आरंभ को लेकर मतांतर भी हैं। मान्यता है कि इसकी शुरुआत शिवभक्त रावण ने की। कुछ लोग इसका आरंभ श्रवण कुमार से तो कई ऋषि परशराम से भी मानते हैं। कहा जाता है कि ऋषि परशुराम ने कावड़ में गढ़ मुक्तेश्वर (ब्रज घाट) से जल लाकर बागपत (उत्तरप्रदेश) के पास स्थित पुरा महादेव में प्राचीन शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। आज भी लोग मनोकामनापूर्ति के लिए उस परंपरा का पालन करते हैं। उत्तर भारत के गंगातटीय शहरों में कावड़ का विशेष महत्व माना गया है। इनका मुकाम बैजनाथ धाम हुआ करता है। पूर्व में कावड़ यात्री गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ से जल लाते थे और प्रसाद के साथ जल देते थे। अब श्रद्धालु गंगा जी या मुख्य तीर्थों के पास प्रवाहमान जलधारा से जल लेकर सावन में जलाभिषेक विधान पूरे करते हैं और चारों दिशाएं 'हर-हर बम-बमÓ व 'हर-हर महादेवÓ के उद्घोष से गूंज उठती हैं। बाबा भोलेनाथ को औघड़दानी भी कहा जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि वे सिर्फ एक लोटा पानी और बेलपत्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं और भावों में बहते हुए भक्तों को हर कामना पूरी होने का वरदान दे जाते हैं। उन्हें भांग-धतूरा भी प्रिय हैं। दरअसल उनका यह प्रकृति प्रेम प्रदर्शित करने के साथ ही समभाव का संदेश भी है, जो वह संपूर्ण जीव-जगत के प्रति दिखाते हैं और उपेक्षितों के प्रति भी सम्मान रखने का भाव जगाते हैं। ऐसे में भक्तगण उनके पूजन-अनुष्ठान विधान में इसका उपयोग करते हैं। कालांतर में अभिषेक के लिए भावना के अनुसार दूध, तेल, पंचगव्य, शहद आदि को शामिल किया गया। इस माह में शिवालयों व घरों में षोडशोपचार, लघुरुद्र, महारुद्र या अतिरुद्र पाठ, सावन माहात्म्य व शिवमहापुराण श्रवण का भी विधान है। सावन माह भगवान शिव को अतिशय प्रिय है। अत: हमें सावन में देवाधिदेव महादेव का अभिषेक कर पुण्य अर्जन करना चाहिए।