महंगाई पर नियंत्रण चुनौती...
   Date08-Aug-2022

prernadeep
रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने रेपो दर आधा फीसदी और बढ़ा कर यही संदेश दे दिया है कि अभी उसकी प्राथमिकता महंगाई पर काबू पाना है... चालू वित्त वर्ष (2022-23) में यह तीसरा मौका है जब रेपो दर बढ़ाई गई है... पिछले तीन महीनों में रेपो दर में 1.4 फीसदी का इजाफा हो चुका है और अब यह 5.4 फीसदी पर आ गई है... केंद्रीय बैंक के इस कदम पर हैरानी इसलिए भी नहीं होनी चाहिए कि वह लगातार संकेत देता रहा है कि नीतिगत दरों को लेकर उदार रुख लंबे समय तक नहीं संभव नहीं होगा... गौरतलब है कि कोरोना महामारी के कारण जो आर्थिक हालात बन गए थे, उनसे निपटने के लिए मई 2020 में केंद्रीय बैंक ने रेपो दर 0.75 फीसदी घटा दी थी... जाहिर है, नीतिगत दरों में वृद्धि को और टाल पाना मौद्रिक नीति समिति के संभव नहीं रह गया था, इसलिए मई में एमपीसी ने नीतिगत दरें बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ा दिया था... मुद्रास्फीति थामने के लिए मौद्रिक उपाय के तौर पर बड़ा हथियार नीतिगत दरों में बदलाव ही है... इसमें तो कोई संशय नहीं कि अभी सबसे बड़ा संकट महंगाई का है... लंबे समय से खुदरा महंगाई का जो रुख बना हुआ है, उससे रिजर्व बैंक की भी नींद उड़ी हुई है... मौजूदा वित्त वर्ष के लिए एमपीसी ने मुद्रास्फीति 6.7 फीसदी रहने का जो अनुमान अपनी जून की बैठक में रखा था, वही अभी भी रखा है... मतलब साफ है कि आने वाले दिनों में भी महंगाई दर कम होने को लेकर ज्यादा उम्मीदें दिख नहीं रहीं... तीसरी तिमाही में भी खुदरा महंगाई दर छह फीसदी के ऊपर ही रहने के आसार हैं... अगर थोड़ा बहुत सुधार हुआ भी, जैसी कि उम्मीदें लगाई जा रही हैं, तो इसका असर चौथी तिमाही में ही देखने को मिलेगा... रिजर्व बैंक को महंगाई दर दो से छह फीसदी के बीच सुनिश्चित करनी होती है... लेकिन लंबे समय से यह इस निर्धारित दायरे से ऊपर ही चल रही है... यों यह स्थिति सिर्फ भारत में ही नहीं है... दुनिया के तमाम देशों में महंगाई के रेकार्ड टूट रहे हैं और इससे निपटने के लिए सभी देशों के केंद्रीय बैंक नीतिगत दरों में वृद्धि का उपाय ही आजमा रहे हैं... हालांकि भारत में महंगाई बढऩे के लिए बाहरी कारक भी उतने ही जिम्मेदार हैं जितने कि आंतरिक... कच्चा तेल फिर महंगा हुआ है... जून में जहां यह पनचानवे डालर प्रति बैरल था, वहीं जुलाई में एक सौ पंद्रह डालर प्रति बैरल हो गया। जून में खुदरा महंगाई सात फीसदी थी, जो जुलाई में 7.79 फीसदी दर्ज की गई... इन आकंड़ों से साफ ही महंगाई की चुनौती मामूली नहीं है... नीतिगत दरों में वृद्धि से साफ है कि कर्ज और महंगा होगा... बैंक भी ब्याज दरों में इजाफा किए बिना नहीं रह पाएंगे... उपभोक्ता बाजार और संपत्ति बाजार पर इसका असर पडऩा तय है... अगर कर्ज महंगा होगा तो मकानों की खरीद-फरोख्त पर असर पड़ेगा... इससे जुड़े सीमेंट, इस्पात जैसे क्षेत्र भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे... वाहनों की बिक्री भी घटेगी...
दृष्टिकोण
साझा प्रवेश परीक्षा की दुविधा...
विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए इस साल से साझा प्रवेश परीक्षा आयोजित की गई है... मगर इसकी पहली पाली में ही बाधा उपस्थित हो गई, जिसके चलते परीक्षा टालनी पड़ी... स्वाभाविक ही इसे लेकर विद्यार्थियों और अभिभावकों में नाराजगी देखी गई... साझा प्रवेश परीक्षा का आयोजन राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यानी एनटीए करती है... इसके लिए कंप्यूटरीकृत पर्चे बनाए जाते हैं, जो विद्यार्थियों को विभिन्न केंद्रों पर इंटरनेट प्रणाली के तहत एक साथ उपलब्ध होते हैं... इसके लिए उन्हीं केंद्रों का चुनाव किया गया है, जहां बड़ी संख्या में इंटरनेट से जुड़े कंप्यूटरों की व्यवस्था है... इस तरह जो पहले लिखित रूप में परीक्षा होने के कारण विद्यार्थियों को अपने घरों के आसपास केंद्र मिल जाया करते थे, अब उसके लिए उन्हें दूर-दूर जाना पड़ता है... जो विद्यार्थी दूसरे शहरों में रहते हैं, वे एक दिन पहले परीक्षा केंद्रों पर पहुंच जाते हैं... चूंकि विश्वविद्यालय दाखिले वाले बच्चों की उम्र अधिक नहीं होती, इसलिए उनके साथ प्राय: उनके अभिभावक भी होते हैं... ऐसे में अगर परीक्षा में किसी प्रकार की गड़बड़ी होती है, उसे टाल दिया जाता है, तो बच्चों और अभिभावकों की परेशानी समझी जा सकती है... उन्हें नए सिरे से फिर वही कवायद करनी पड़ती है... दिल्ली और उसके आसपास के केंद्रों में सर्वर की रफ्तार धीमी होने की वजह परीक्षा टालनी पड़ी... प्रवेश और प्रतियोगी परीक्षाओं के संचालन के लिए विशेष रूप से राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी यानी एनटीए का गठन किया गया, ताकि विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और विभिन्न सरकारी विभागों को परीक्षाएं आयोजित करने की झंझट से मुक्ति मिल सके और प्रतियोगी परीक्षाएं बिना किसी धांधली के कराई जा सकें...