लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोकलुभावन वादों की सेंधमारी
   Date08-Aug-2022

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प्रमोद भार्गव
नि र्वाचन लोक-पर्व के अवसर पर मुफ्त में तोहफे बांटे जाने की घोषणाएं सभी राजनीतिक दल बढ़ चढ़कर करते रहे हैं। हालांकि निर्वाचन के बाद ज्यादातर वादे फरेब साबित होते हैं। बावजूद मतदाता को इस प्रलोभन में लुभाकर राजनीतिक दल और प्रत्याशी अपना स्वार्थ साधने में सफल हो जाते हैं। परंतु अब सर्वोच्च न्यायालय ने इन चुनावी रेवडिय़ां बांटे जाने पर गंभीर चिंता जताई है। न्यायालय ने केंद्र सरकार, नीति आयोग, वित्त आयोग, भारतीय रिर्जव बैंक और अन्य सभी हितधारकों को इस गंभीर मसले पर विचारमंथन करने और रचनात्मक सुझाव देने का आग्रह किया है। साथ ही एक विशेषज्ञ निकाय बनाने का निर्देश भी दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुफ्त के इन उपहारों पर लगातार चिंता जता रहे हैं। इसी का परिणाम है कि भारतीय जनता पार्टी ने यह फैसला लिया है कि आने वाले चुनावों में वह अपने घोषणा-पत्र में मुफ्त में दिए जाने वाले उपहारों का वादा नहीं करेगी। उसके नेता भाषणों में भी चुनावी रेवडिय़ां बांटने की बात नहीं करेंगे। अब तक ये लोक-लुभावन वादे भाजपा समेत सभी दल जनकल्याणकारी योजनाओं के बहाने करके, जीतने पर अमल में लाते रहे हैं। हालांकि 70 प्रतिशत वादे पूरे नहीं हो पाते हैं।
प्रधान न्यायाधीश एनबी रमणा, कृष्णमुरारी और हिमा कोहली की पीठ ने इस मुद्दे के समाधान के लिए केंद्र सरकार को उपाय सुझाने हेतु एक विशेषज्ञ पैनल गठित करने का भी निर्देश दिया है। यह न्यायालय भाजपा नेता एवं अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। उपाध्याय ने राजनीतिक दलों द्वारा मतदाताओं को लुभाने के लिए दिए जाने वाले उपहारों की घोषणाओं पर प्रतिबंध लगाने और ऐसे दलों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने की मांग की है। पीठ ने कहा है कि यह गंभीर मुद्दा है और चुनाव आयोग या सरकार यह नहीं कह सकते हैं कि वे इसमें कुछ नहीं कर सकते। केंद्र सरकार की ओर से पेश महाअधिवक्ता तुशार मेहता ने कहा कि 'सैद्धांतिक रूप से याचिकाकर्ता की दलीलों का समर्थन करते हैं। इन लोक-लुभाव वादों के दो तरह के प्रभाव देखने में आते हैं। एक तो ये मतदाताओं के निष्पक्ष निर्णय को प्रभावित करते हैं और दूसरे, इन्हें पूरा करने के लिए अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। अतएव इस पर चुनाव आयोग से भी सुझाव लिए जाने चाहिए। फिलहाल न्यायालय ने आयोग को शामिल नहीं किया है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब चुनाव नीतियों और कार्यक्रम की बजाय प्रलोभनों का फंडा उछालकर लड़े जाने लगे हैं। राजनेताओं की दानवीर कर्ण की यह भूमिका स्वतंत्र और निश्पक्ष चुनाव की जड़ों में म_ा घोलने का काम कर रही है। अपना उल्लू सीधा करने के लिए मतदाता को बरगलाना आदर्श चुनाव संहिता को ठेंगा दिखाने जैसा है। सही मायनों में वादों की घूस से निर्वाचन प्रक्रिया दूषित होती है, इसलिए इस घूसखोरी को आदर्श आचार संहिता के दायरे में लाना जरूरी है। वैसे भी इन वादों की हकीकत जमीन पर उतरी होती तो पंजाब में 7000 किसानों ने आत्महत्या न की होती? क्योंकि पंजाब में किसान कल्याण के सबसे ज्यादा वादे अकाली दल ने सरकार में रहते हुए किए थे। अफलातूनी वादों के उलट हकीकत में अब ज्यादा जरूरत शासन प्रशासन को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की है। यह वादा ज्यादातर राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्र से हमेशा गायब रहा है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी जरूर भ्रष्टाचार मुक्त सरकार, बिजली दरें 50 फीसदी कम करने और हर परिवार को रोजाना 700 लीटर पानी मुहैया कराने के बुनियादी वादों के साथ चुनाव लड़ी और किसी हद तक सफल भी रही, लेकिन अब दिल्ली सरकार की अर्थव्यवस्था भी मुफ्त बिजली-पानी देने की वजह से डगमगा रही है।
देश में मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने निर्धन परिवारों को मुफ्त में एक बत्ती कनेक्शन देने के वादे के साथ यह शुरुआत आठवें दशक में की थी। तमिलनाडू की मुख्यमंत्री रहीं जयललिता ने तो चुनावी वादों का इतना बड़ा पिटारा खोल दिया था कि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया था। इस याचिका में अन्नाद्रमुक की चुनावी घोषणा को भ्रष्ट आचरण मानते हुए असंवैधानिक ठहराने की मांग की गई थी, लेकिन न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी थी। उस समय न्यायालय ने दलील दी थी कि घोषणा-पत्रों में दर्ज प्रलोभनों को भ्रष्ट आचरण नहीं माना जा सकता है। चुनाव का नियमन जनप्रतिनिधित्व कानून के जरिये होता है और उसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत इसे गैरकानूनी या भ्रष्ट कदाचरण ठहराया जा सके। न्यायालय ने लाचारगी प्रकट करते हुए कहा था कि इस तरह के मामलों में हस्तक्षेप करना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। लिहाजा इस मसले पर विचार कर कारगर निर्णय लेने का कोई कदम विधायिका ही उठा सकती है। अलबत्ता अदालत ने निर्वाचन आयोग को जरूर निर्देश दिया था कि वह चुनावी घोषणा-पत्रों को मर्यादित करने की दृष्टि से अतिवादी व लोक-लुभावन घोषणाओं को रेखांकित करे, जिससे आदर्श चुनाव संहिता का पालन हो सके। लेकिन इस परिप्रेक्ष्य में दुविधा यह है कि राजनीतिक दलों पर आयोग का अनुशासनात्मक नियंत्रण निर्वाचन की अधिसूचना जारी होने के बाद होता है, जबकि ज्यादातर घोषणा-पत्र इस अधिसूचना के पहले जारी हो जाते हैं और कई वादे तो नेता चुनावी आमसभाओं में आचार संहिता का मखौल उड़ाते हुए भी वादे कर डालते हैं। यहां तक कि अल्पसंख्यक मुस्लिम और सवर्ण ब्राह्मणों तक को आरक्षण देने का वादे किए गए हैं। उत्तर प्रदेश में 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने अपनी पत्नी एवं कांग्रेस उम्मीदवार श्रीमती लुईस खुर्शीद की चुनावी आमसभा में बेहिचक ऐलान किया था कि यदि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है तो मुस्लिमों को सरकारी नौकरियों में 9 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा। जाहिर है, कानून मंत्री जैसे संवैधानिक पद पर रहते हुए भी खुर्शीद ने आदर्श आचार संहिता का सार्वजनिक मंच से मजाक उड़ाया और आयोग कुछ भी नहीं कर सका था? दरअसल संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण देने का कोई प्रावधान ही नहीं है। इसी तरह मायावती ने 2012 के बहुजन समाज पार्टी के घोषणा-पत्र में सवर्ण ब्राह्मणों को आरक्षण देने का वादा किया था। तिस पर भी विडंवना है कि आदर्श निर्वाचन संहिता के तहत न तो कोई दंडात्मक कानून है और न ही इसकी संहिताओं में वैध-अवैध की अवधारणाएं परिभाषित हैं। आयोग यदि संहिता को लागू कर पाता है तो इसलिए कि राजनीतिक दल उसका सहयोग करते हैं और जनमत की भावना आयोग के पक्ष में होती है। तय है दल यदि आयोग के साथ असहयोग करने लग जाएं तो आयोग हाथ पर हाथ धरे बैठा रह जाएगा। वैसे भी आयोग की जवाबदेही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की है, न कि दलों के चुनावी मुद्दे तय करने की ? बावजूद आयोग मामले संज्ञान मंत लेता है और उम्मीदवार को चेताता भी देता रहता है। लेकिन उम्मीदवार जानते हैं कि उनकी उम्मीदवारी को तत्काल खारिज करने का कोई अधिकार आयोग के पास नहीं है, इसलिए वे बेपरवाह रहते हैं।
इन विरोधाभासी हालातों से शीर्ष न्यायालय परिचित है, इसलिए न्यायालय ने कहा भी कि, ऐसे मुद्दों पर विचार-विमर्श कर कानून बनाने का अधिकार विधायिका को ही है। यहां विडंबना यह है कि विधायिका और दल अंतत: एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रलोभन के जिन वादों के मार्फत मतदाता को बरगलाकर दल सत्ता के अधिकारी हुए हैं, उन वादों को घोषणा-पत्र में नहीं रखने का कानून बनाकर अपने ही हाथों से, अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की गलती क्यों करेंगे ? हालांकि भाजपा आगामी चुनावों में अपने घोषणा-पत्र में वादों पर विराम लगाने की दम जरूर भर रही है, लेकिन चुनाव प्रक्रिया शुरू होने पर ही हकीकत सामने आएगी?
फिर यहां सवाल यह भी उठता है कि दल जो घोषणाएं करते हैं उनका लाभ वर्ग-भेद के बिना जरूरतमंदों को मिलता है। फिर चाहे वह छात्रवृत्ति हो, लैपटॉप हो, सायकल हो अथवा टीवी? मुफ्त बिजली हो या सस्ता राशन, इसमें कोई जातीय या वर्गीय भेद नहीं किया जाता। बीपीएल की सूची में आने वाले सभी जरूरतमंद इनके हकदार होते हैं। ऐसी स्थिति में मुफ्त उपहारों को विभाजित करना एक जटिल प्रक्रिया है। हां, जातीय अथवा अल्पसंख्यक के आधार पर आरक्षण की घोषणा की जाती है तो इस स्थिति को जातीय अथवा सांप्रदायिक भेद की स्थिति माना जा सकता है ? (लेखक वरिष्ठ साहित्यकार
और पत्रकार हैं।)
अस्सी करोड़ लोगों को सस्ता अनाज देने की सुविधा को भी भरे पेट वाले गुलछर्रे उड़ा रहे लोग सरकारी धन का दुरुपयोग मानते हैं। जबकि एक कल्याणकारी राज्य के वंचित तबके के लिए ये सुविधाएं अनिवार्य जरुरत भी हैं। ऐसे में इन्हें एकाएक घूस या लालच नहीं कहा जा सकता है। अलबत्ता यह तथ्य जरूर सही है कि प्रलोभन मतदाता की नीयत को प्रभावित करता है और वह व्यापक सामाजिक हित की बजाय व्यक्तिगत हित को ध्यान में रखकर निर्णय लेने को विवष हो जाता है। जाहिर है, यह एक गंभीर मसला है और न्यायालय इस मुद्दे पर आगे बढ़ रही है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि कोई ऐसा हल जरूर निकलेगा, जो सर्वमान्य होने के साथ लोककल्याणकारी भी साबित होगा।