छिद्रान्वेषण भी मनुष्य का बड़ा दुर्गुण
   Date08-Aug-2022

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धर्मधारा
इ से साहस कह लें या दुस्साहस। मगर सच यही है कि लोग कहीं भी, कुछ भी कर गुजरने में पीछे नहीं रहते। खासकर तब जबकि बुरे और निन्दित कर्म करने हों और अपने किसी न किसी छोटे-मोटे स्वार्थ की पूर्ति होने की उम्मीद हो। लोगों की दो किस्में हुआ करती है। एक वे हैं जो वे ही काम करते हैं जो उनके लिए निर्धारित होता है या जो अच्छे इंसान के रूप में उन्हें करना चाहिए। दूसरी किस्म में वे लोग आते हैं जो अपने लिए निर्धारित कोई सा काम नहीं करते, बल्कि वे सारे ही काम करने के आदी हो जाते हैं जो काम उन्हें कभी नहीं करने चाहिए। यो कहें कि इस किस्म के लोग वे सारे उल्टे-सीधे काम करते हैं जो न उनके लिए अच्छे हैं, न ओरों के लिए, बल्कि इन सभी लोगों को ताजिन्दगी वे ही काम रास आते हैं जो ओरों को दु:खी करने के लिए ही होते हैं। आजकल कोई क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है जहां ऐसे मनहूस, छिद्रान्वेषी और नकारात्मक लोगों का जमावड़ा न हो। एकाध तो हर जगह मिल ही जाएगा जो पूरे संस्थान और परिसर-परिवेश में गंदगी फैलाने में दिन-रात जुटा ही रहता है।
अपनी ड्यूटी, फर्ज और घर-परिवार तथा समाज एवं क्षेत्र के लिए निभाये जाने वाले कार्यों को एक तरफ रखकर ये लोग ओरों की जिन्दगी में झांकने, अपने हक में दूसरों का पूरी बेशर्मी के साथ शोषण की हद तक इस्तेमाल करने, अपने नाजायज काम में मदद नहीं करने वाले तथा परोपकारी गतिविधियों में समर्पित भाव से जुटे हुए लोगों के लिए कई तरह की बाधाएं पहुंचाने में अपने आपको महान एवं समर्थ महसूस करते हुए अपने विध्नसंतोषी और छिद्रान्वेषी कार्यों पर जिन्दगीभर आत्म गौरव एवं गर्व का अहसास करते रहते हैं। अपने आस-पास की बात हो या पूरे इलाके की, या फिर देश के किसी भी क्षेत्र की, हर जगह ऐसे महान और स्वनाम धन्य लोगों का बाहुल्य है जो ओरों के लिए गड्ढे खोदने में इतने माहिर हैं कि इनके हुनर को देख कर वह हर आदमी सलाम करने को मजबूर हो ही जाता है जो उनके क्षेत्र का अनुभवी और पुराना हो। ओरों के लिए जब चाहे जहां चाहे, वहां ये लोग गड्ढे खोदने में इतनी महारत रखते हैं कि खदान श्रमिक तक इनके आगे पानी ही भरने लगे। ये लोग यदि गड्ढा खोदने वाली कंपनी में होते तो इन्हें अपने इस अकेले हुनर के बूते नोबेल पुरस्कार का ही हकदार मान लिया जाता। गड्ढा खोदने वाले इन गड्ढुओं के लिए उन्हीं की तरह के दूसरे गड्ढजी हर कहीं मिल ही जाते हैं जो उन्ही की तर्ज पर काम करते हुए ओरों के लिए गड्ढे खोदने में ही लगे रहते है और अपने इसी नायाब हुनर से ताजिन्दगी आनंद का पान करते रहते हैं। लगातार नकारात्मक और विध्वंसकारी गतिविधियों में रमे हुए इन लोगों का काम सड़कों के सदाबहार पेचवर्क की तरह सालों और दशकों तक चलता रहता है। गड्ढे ही गड्ढे खोदते रहने की इस लम्बी जीवन यात्रा में इनके लिए न कोई अपना है न पराया। इनके अपने और परायों की परिभाषाएं देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप बदलती ही रहती हैं।