मुफ्तखोरी पर अंकुश जरूरी...
   Date05-Aug-2022

prernadeep 
लोकतंत्र में मतदाताओं से सबसे बड़ा छलावा है, उनके साथ ऐसे वादे करना जो उन्हें अकर्मण्य बनाकर लगातार मुफ्त में रियायतें और सुविधाएं पाने का आदी बनाते हैं... ऐसी लोकलुभावन व्यवस्था पर अंकुश जरूरी है... यह छिपा नहीं है कि चुनावों में अपने उम्मीदवारों की जीत तय करने के लिए किए जाने वाले प्रचार अब विकास और विचार के स्तर पर देश या समाज को समृद्ध करने की बातों के बजाय लोगों को कोई वाहन या लैपटाप या अन्य सामान देने या बिजली-पानी जैसी सुविधाएं मुफ्त मुहैया कराने के वादों में तब्दील होते जा रहे हैं... जबकि किसी भी देश या क्षेत्र का समग्र और समावेशी विकास जनता को इस रूप में सशक्त करता है, जहां लोगों को कोई सेवा या सामान मुफ्त में लेने की जरूरत नहीं महसूस होती... अगर सबके लिए रोजगार या फिर पर्याप्त आर्थिक आमदनी का जरिया सुनिश्चित कर दिया जाए तो किसी भी व्यक्ति को अपनी जरूरत के किसी सामान या बिजली-पानी जैसी सेवाओं के लिए कीमत चुकाने में क्या असुविधा होगी..! लेकिन बुनियादी समस्याओं का कोई ठोस हल निकालने के बजाय तात्कालिक और अस्थायी राहतों के जरिये जनता को उलझाए रखने का प्रयास किया जाता है... किसी भी देश का लोकतंत्र तभी मजबूत बना रह सकता है जब वहां होने वाले चुनाव निष्पक्ष व स्वतंत्र हो और राजनीतिक दलों की ओर से लोगों का मत हासिल करने के लिए लोभ-लाभ का सहारा न लिया जाता हो... लेकिन हमारे देश में राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले लोकसभा चुनाव हों या विधानसभा चुनाव, अमूमन सभी दलों की ओर से अपने उम्मीदवारों की जीत को सुनिश्चित करने के लिए मतदाताओं के सामने कई तरह के ऐसे दावे और वादे किए जाते हैं, जो कभी पूरे नहीं होते... इस क्रम में पिछले कुछ समय से इस बात पर सवाल उठने लगे हैं कि चुनावों के दौरान अपने पक्ष में प्रचार करते हुए कई नेता जिस तरह आम लोगों को कोई सामान या सेवा मुफ्त मुहैया कराने का बढ़-चढ़कर वादा करते हैं, क्या वह एक तरह से लोभ और लाभ के बदले वोट पाने की कोशिश नहीं होती है..! जबकि मतदाताओं का वोट पूरी तरह से सरकारों के कामकाज और जनता के पक्ष में उसके रवैये के आकलन और विवेक पर आधारित होना चाहिए, ताकि सभी स्तरों पर सत्ता से लेकर जमीनी स्तर तक लोकतांत्रिक अवधारणा को मजबूती मिले... इस मसले पर लोकतांत्रिक व्यवस्था और राजनीति को लेकर फिक्रमंद लोगों और समूहों की ओर से लगातार चिंता जताई जाती रही है और कई सवाल उठाए गए हैं... अच्छा यह है कि वोट के लिए मुफ्त चीजों या सेवाओं का सवाल अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दायरे में है... इससे संबंधित याचिका पर पिछली सुनवाई के दौरान मुफ्त के वादे पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अपना रुख स्पष्ट करने को कहा था... अब बुधवार को अदालत ने इस मामले में विशेषज्ञ समिति के गठन का संकेत दिया, जो चुनावों के मद्देनजर मुफ्त उपहार के संदर्भ में सुझाव पेश करे...
कदम वापसी के मायने...
बात किसी की व्यक्तिगत जानकारी जुटाने की हो या फिर किसी की तकनीकी रूप से गोपनीयता भंग करने वाला विषय हो... इस पर गंभीरता के साथ विचार-विमर्श के बाद आम राय के साथ कार्य करना जरूरी है... जब तक पूर्ण सहमति न हो, तब तक कदम आगे न बढ़ाना या फिर उठाए गए कदम को वापस लेना लोकतंत्र में अच्छा संकेत है... आखिरकार सरकार को डेटा संरक्षण विधेयक वापस लेना पड़ा... अब इसकी जगह एक नया कानून लाया जाएगा, जो अधिक पारदर्शी, व्यापक और व्यावहारिक होगा... कहा जा रहा है कि नया कानून तैयार करने से पहले आम लोगों से भी इस संबंध में सलाह ली जाएगी... दरअसल, डेटा संरक्षण विधेयक ढाई साल पहले सदन में पेश किया गया था, जिस पर विपक्ष ने आपत्ति दर्ज कराई थी... तब उसे संयुक्त संसदीय समिति को समीक्षा के लिए भेज दिया गया था... समिति ने साल भर बाद उससे संबंधित अपनी रिपोर्ट पेश कर दी थी... उसमें इक्यासी संशोधन और बारह सिफारिशें प्रस्तावित की गई थीं... जाहिर है, इतने संशोधनों के सुझाव का अर्थ है कि कानून में भारी खामी थी... उसे नए ढंग से तैयार करना और व्यापक विचार-विमर्श के साथ ही उस पर आगे बढऩा उचित था... इसलिए सरकार ने उसे वापस लेना सही समझा... मगर इस तरह सरकार के अपना कदम वापस खींचने से विपक्ष को एक बार फिर सरकार पर तंज कसने का मौका मिल गया है... विपक्ष कह रहा है कि अगर इस विधेयक को सदन में रखा गया तभी ठीक से बहस हो जाती, तो आज यह स्थिति नहीं आती...