संस्कृति के रक्षक
   Date17-Aug-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
छ त्रपति शिवाजी के दरबार में उत्सव का वातावरण था। धीरे-धीरे महाराष्ट्र के विभिन्न गढ़ों को जीतने के क्रम में आज शिवाजी को एक महत्वपूर्ण विजय प्राप्त हुई थी। कल्याण का किला आज उनके विजय रथ के समक्ष आ गिरा था। यह किला अजेय माना जाता था, सो स्वाभाविक था कि उस पर विजय प्राप्त करने के उपरांत शिवाजी के सैनिकों में उत्सव का माहौल बनता। इसी क्रम में जीती गई वस्तुओं को शिवाजी महाराज के सम्मुख प्रस्तुत किया जा रहा था। सर्वप्रथम जीते गए हीरे-जवाहरातों को दिखाया गया। शिवाजी ने इन सबको कोषागार में रखने का आदेश दिया, ताकि इनसे प्राप्त मुद्राओं से प्रजा का पोषण किया जा सके। यह सब अभी चल ही रहा था कि कुछ सकुचाते हुए सेनापति मोरोपंत शिवाजी से बोले-'महाराज! सैनिक कल्याण के किले से आपके लिए कुछ उपहार लाए थे, आप शायद उन्हें देखना चाहें।Ó शिवाजी से सहमति मिलने पर मोरोपंत ने एक पालकी दरबार में बुलवाई और बोले 'महाराज! इसमें कल्याण के सूबेदार मुल्ला अहमद की सुंदर पुत्र-वधू गौहरबानो है। मुगलों में जीते गए राज्य की स्त्रियों से विवाह का प्रचलन है और यही सोचकर हम गौहरबानो को आपकी सेवा में लेकर आए हैं।Ó शिवाजी के मुख पर विषाद की रेखा आई और थोड़ा क्रूद्ध होकर वे बोले-'मेरे साथ इतने वर्ष रहकर भी तुम मुझे समझ नहीं पाए मोरोपंत! नारी कोई वस्तु नहीं, जिस पर जीतने के बाद कोई भी अधिकार स्थापित कर ले। गौहरबानो को ससम्मान इनके पिता के पास छोड़कर आओ।Ó छत्रपति शिवाजी के इस व्यवहार ने सिद्ध कर दिया कि हमारी संस्कृति नारी के सम्मान की संस्कृति है।