नियमित अध्ययन ही रचनात्मकता की देन
   Date17-Aug-2022

dharmdhara
धर्मधारा
आ ज भले ही समय टीवी, इंटरनेट, गैजेस्ट्स की दुनिया का है, लेकिन पुस्तकों का स्थान कोई नहीं ले सकता। आज भी इनमें संस्कृति, सभ्यता, धर्म एवं आध्यात्मिकता जैसे न जाने कितने गूढ़ विषयों से संबंधित ज्ञान सहज ही उपलब्ध है। यों तो सृष्टि में कुछ भी शाश्वत नहीं है, पर प्राचीनकाल की महान परंपराओं को अपने में सहेजकर रखने वाली ये पुस्तकें आने वाले समय के लिए एक शाश्वत ज्ञान का साधन जरूर बन सकती हैं। पुस्तकें हमारे समाज का आईना होती हैं, जिनकी कोई भौगोलिक सीमाएं नहीं होतीं। इनके जरिये ही हम अपने अतीत की झलक पाते हैं और धर्म, कला, संस्कृति, सभ्यता और साहित्य आदि से परिचित होते हैं। प्राचीन समय में पुस्तकें नहीं, बल्कि ताम्रपत्र होते थे, जिन पर लिखा जाता था और उन पर केवल वे ही लिख पाते थे, जिन्हें उच्च कोटि का अनुभव व ज्ञान होता था। इसलिए प्राचीन ग्रंथ प्रामाणिक माने जाते हैं, इनमें लिखी हुई बातों को बिना किसी विवाद के स्वीकार किया जाता है और यही कारण है कि व्यक्ति इन ग्रंथों में निहित ज्ञान को जीवन-सूत्र की तरह अपनाता है। आज स्थिति बदल गई है। आज पहले की तुलना में विभिन्न विषयों पर बहुत सारी पुस्तकें बाजार में उपलब्ध हैं। आज किसी को भी अपने विचारों को अभिव्यक्त करने और उन्हें प्रकाशित कराने की स्वतंत्रता है, ताकि ज्ञान व अनुभव किसी एक तक सीमित न रहें, बल्कि सभा तक पहुंच सकें। आज पुस्तकें तो बहुत हैं. लेकिन कोई उन्हें पढऩा नहीं चाहता। बहुत कम लोग ही होते हैं, जो पढऩे में रूचि रखते हैं और विभिन्न विषयों से संबंधित किताबों को पढ़ते रहते हैं। पुस्तकें हमारी सबसे अच्छी मित्र होती हैं। ये ज्ञान का एक प्रमुख स्रोत हैं और हमारा ज्ञान बढ़ाने के साथ-साथ जीवन जीने का तरीका भी सिखाती हैं। पुस्तकें न केवल हमें दुनिया से जोड़ती हैं, बल्कि हमारे व्यक्तित्व को भी निखारती हैं। विज्ञजनों का भी कहना है कि हमें प्रतिदिन कुछ न कुछ अच्छा पढ़ते रहना चाहिए, जिस तरह हम नित्यप्रति भोजन करते हैं उसी तरह स्वाध्याय भी आत्मा का भोजन है, जिसे नियमित रूप से करना चाहिए। इसलिए हमें पढऩे की आदत बनानी चाहिए, क्योंकि इस आदत से हम बहुत कुछ पाते हैं और यह हमें मानसिक रूप से पोषण भी देता है।