अमृतकाल : स्वर्णिम भारत का अवसर...
   Date15-Aug-2022

parmar shakti
संपादक की कलम से...
शक्तिसिंह परमार
भारत आज अपनी आजादी का 'अमृत महोत्सव' मना रहा है...किसी भी राष्ट्र की आयु के साढ़े सात दशक की यात्रा वैसे तो बहुत बड़ा पड़ाव नहीं है..,क्योंकि मनुष्य की औसत आयु भी आज इसी के आसपास ठहर गई है..,लेकिन एक राष्ट्र के रूप में वर्षों की जीवन यात्रा के विभिन्न पड़ाव समय के साथ अनेक तरह के संघर्ष, उपलब्धियों, सबक, सीख, पीड़ा साथ लेकर आगे बढ़ते हैं..,तभी तो हजारों वर्ष पूर्व अस्तित्व में आया यह जम्बूद्वीप कई भागों में अनेकानेक कारणों से बंटता चला गया...उसी जम्बूद्वीप के एक हिस्से के रूप में आजाद और विभाजित आज के भारत के कालखंड को देखा जाता...जिसकी यात्रा 1947 से प्रारंभ हुई थी...उसी खंडित स्वाधीनता की आज 75वीं वर्षगांठ अर्थात् इस 'अमृत महोत्सव' में वह पीढ़ी बड़ी संख्या में शामिल है जिसका स्वतंत्रता आंदोलन, यहां तक कि स्वतंत्र भारत के कालखंड में आए समसामयिक संकटों, राष्ट्रीय झंझावतों से पार पाने में कोई योगदान नहीं है...जिनका जन्म 80 के दशक के आसपास हुआ उस पीढ़ी ने बहुत सारे संघर्षों को देखा-सहा ही नहीं..,बस सुना और पढ़ा है...ऐसे में जब भारत की हजारों वर्षों की संघर्ष यात्रा की चर्चा होती है तो हमें इस बात का भी भान और ज्ञान प्राप्त होता है कि यह पुण्यधरा भारतभूमि सनातन जीवनपद्धति की प्रेरक, उपासक और प्रतिपादक है...यह भारतभूमि मनुष्य और मनुष्यता के स्थापित मानबिंदुओं की पालक, संरक्षक और संवर्धिनी है...पृथ्वी पर जिस भू-भाग अर्थात राष्ट्र के हम निवासी हैं उस क्षेत्रफल का वर्णन अग्नि, वायु एवं विष्णु पुराण में लगभग समानार्थी श्लोक के रूप में है...
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमादे्रश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्तति:।।
भारत की यह माटी बलिदानों की गौरवगाथा से अटी पड़ी है...तभी तो कहा जाता है कि भारतभूमि के कण-कण में पौरुष और पुरुषार्थ समाहित है..,क्योंकि यह भारत राष्ट्र एक जमीन का टुकड़ाभर नहीं..,बल्कि शाश्वत सनातनी मौलिक ज्ञान की उर्वरा भूमि है...यह साधना, संधान, सृजन, शौर्य, साहस, संघर्ष, त्याग, समर्पण, सेवा, शांति, दया, करुणा और प्रकृति अनुसार समसामयिक परिवर्तनों की शिरोधार्य धरा है...क्योंकि इस धरा की गर्भनाल धर्म-संस्कृति एवं शाश्वत मूल्यों, वैदिक ऋचाओं से सदैव अबाध्य रही है...असंख्य हमलों, झंझावतों और भयावह बर्बर संघर्षों के बाद भी आज राष्ट्र रूप में भारत की हस्ती मिटती नहीं..! क्योंकि इसके नागरिकों के डीएनए में वह राष्ट्रभाव है जो भूमि को भारत माता के रूप में पूजता है...इस राष्ट्र को 'देवता' रूपमें आराध्य मानकर कर्तव्यों की आहुति देता है..,क्योंकि इसका कण-कण जीवंत और जागृत है...राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में यह गीत हमेशा गुंजाएमान होता कि...
चंदन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है।
बाला है देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है।।
यही स्वर भारतभूमि का सनातनकाल से लेकर अब आधुनिक दौर में भी प्रकटभाव बना हुआ है.., किसी राष्ट्र की जीवंतता, निरंतरता और निर्बाध साधना का प्रकटीकरण भी यही है...सनातन धर्म की संवाहक यह भारतभूमि वैदिक कालखंड में जिस तरह से आविष्कार, अनुसंधान से विश्वगुरु की भूमिका का निर्वाह करने में सफल रही...आज आधुनिक कालखंड में विज्ञान-तकनीक-अंतरिक्ष की सफलता भारत की वैश्विक सर्वस्वीकार्यता का द्योतक है...क्योंकि भारत की इस धरा के पिंड अर्थात् डीएनए में 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का भाव समाहित है..,जो राष्ट्र इस भावना के साथ आगे बढ़ता है उसके सामने विकराल समस्याएं व झंझावत ज्यादा समय तक टिक नहीं पाते...यही तो भारत राष्ट्र की अजरता-अमरता का मूलमंत्र है और हमारी थाती है..!
आज विभाजित भारत (1947) का अमृत महोत्सव है...लेकिन हम पुन: अखंड होंगे..,वैश्विक मान्यता के सिरमौर बनकर, विश्व नेतृत्व के सर्वोच्चतम शिखर पर आरूढ़ होंगे...इस भाव और विश्वास के साथ 75वें वर्ष में हमें भारत के समक्ष 1947 से 2022 तक के पड़ावों, उपलब्धियों, रुकावटों, चुनौतियों और समस्याओं पर भी दृष्टिपात करना होगा...यही नहीं, हमें 'हीरक जयंती' अर्थात् आजादी के 75वें वर्ष में सुधार और प्रयास के कदम बढ़ाने होंगे..,तभी स्वाधीनता के 'शताब्दी वर्ष' अर्थात् 100वें वर्ष में भारत को 'विश्व मुकुट' बनाने में सफल होंगे...हमारे लिए आज से आगामी 25 वर्षों की समयावधि भारत का स्वर्णिम भविष्य गढऩे का 'अमृतकाल' है...
सहस्त्रों वर्ष के संघर्ष के बाद स्वाधीनता प्राप्ति के साथ भारतीयों को उस स्वतंत्र सुबह के दर्शन हुए थे..,जो 15 अगस्त को सूर्योदय के साथ स्वतंत्र रूप से प्रकाशमान हुई थी...उन सूर्य किरणों में भारत के शौर्य, साहस, बलिदान और प्राणोत्सर्ग कर देने वाली अनंत राष्ट्रभक्ति थी...भारत माता के प्रति अप्रतिम राष्ट्रप्रेम था..,लेकिन उन्हीं किरणों में संघर्षों के दौर में असंख्य अनाम हुतात्माओं के प्राणों की आहुतियों से उठी पीड़ा की नमी थी...भारतवर्ष के कुल 23 विभाजन के बाद लघु अखंड भारत का पुन: 14 अगस्त 1947 को जो विभाजन हुआ, उसको लेकर भारी आक्रोश और ग्लानि भी थी...क्योंकि ऐसी विभाजित स्वतंत्रता के लिए तो सैकड़ों वर्ष तक संघर्ष नहीं किया था..! फिर जैसी आजादी मिली, उसने हमारे तमाम नीति-निर्धारकों के सामने अनेक यक्ष प्रश्न खड़े कर दिए थे...आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और वैचारिक झंझावतों से निपटने के प्रश्न उमडऩे-घुमडऩे लगे थे और कुछ तो आज भी यथावत है..!
आजादी प्राप्ति के साथ भारत में लघु, मध्यम और कुटीर उद्योग वृहद स्तर पर थे..,लेकिन हमने औद्योगिकीकरण को बढ़ावा दिया...उसके नुकसान भी हुए...लेकिन आजादी के समय प्रति व्यक्ति सालाना कमाई 274 रुपए थी..,जो आज बढ़कर 1.26 लाख रुपए हो गई है...शिक्षा, बीपीओ, स्वास्थ्य, ट्रांसपोर्ट समेत 9 बड़े क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर निर्मित हुए हैं...आवासीय बस्ती में कुएं के बजाय अब नल से पानी पहुंच रहा है...गोवा, तेलंगाना, हरियाणा, अंडमान-निकोबार द्वीप, पुड्डुचेरी, दादर नगर हवेली में सौ फीसदी घरों तक नल-जल योजना का क्रियान्वयन है...अब कश्मीर से कन्याकुमारी तक 'एक राष्ट्र-एक निशान-एक प्रधान' का ध्येय वाक्य साकार हो चुका है...आतंकवाद से मुक्ति का असर देखें कि जिस कश्मीर में 70 साल में सिर्फ 14 हजार करोड़ का निवेश आया, वहीं 370 के खात्मे के बाद १ साल में 56 हजार करोड़ के औद्योगिक निवेश मूर्तरूप ले रहे हैं...पर्यावरण को बचाने के लिए सुंदरलाल बहुगुणा, चंडीप्रसाद भट्ट और जादव 'मोलाई' पायेंग के विचारों को आगे बढ़ाते हुए ग्रीन ऊर्जा की दिशा में केंद्र सरकार ने नवाचार को बढ़ाया है... शिक्षा ही किसी राष्ट्र का वास्तविक आईना है...1947 में जहां वार्षिक साक्षरता दर 12 फीसदी थी वह 2021-22 में 77.7 फीसदी पर पहुंच गई...नई शिक्षा नीति ने कौशल विकास के साथ नई संभावनाओं को जन्म दिया है...महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बढ़े हैं...1951 में साक्षरता दर 8.86 फीसदी थी 2022 में 70.3 फीसदी पर पहुंच गई है...डाकिये से आगे बढ़कर संचार और संवाद, तकनीक ने डिजिटल तक का सफर क्रांतिकारी रूप से बदल दिया...आज 5जी के साथ हम सूचना क्रांति में नई कदमताल कर रहे हैं...भारत आज डिजिटल सेक्टर में दुनिया के कई विकसित देशों को कड़ी टक्कर दे रहा है...स्टार्टअप, हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और आईटी क्षेत्र में भारत का महत्वपूर्ण योगदान है...1950 में बना आईआईटी खडग़पुर आज वैश्विक प्रतिमानों का आईना है...कोरोना महामारी में भारत ने विश्व के सामने अपनी स्वास्थ्य व शोध दक्षता का लोहा मनवाया... कोरोना रोधी टीका विश्व के लिए संजीवनी बना...1956 में पहला एम्स खुला...2003 तक देश में एक ही एम्स था और आज उनकी संख्या 22 हो चुकी है...सैन्य व सामरिक क्षमता के मान से भारत ने स्वदेश निर्मित मिसाइल व सुरक्षा हथियारों से आत्मनिर्भरता का इतिहास रचा है...1958 में गठित रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) आज विश्व के समक्ष नए कीर्तिमान गढ़ रहा है.., लेकिन स्वदेशी अर्थतंत्र से लगाकर उदारीकरण के बावजूद आर्थिक विषमता गहरी हुई है...फिर महंगाई, बेरोजगारी से मुक्ति पाए बिना हमारी यह स्वाधीनता अधूरी है..! अत: अंतिम व्यक्ति की समान भागीदारी तक स्वाधीनता से स्वतंत्रता की यह यात्रा जारी रहेगी...
15 अगस्त को प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने भले ही अपने भाषण में 'नियति से सामना' को उद्धत किया हो..,लेकिन वास्तविकता तो यही थी कि गोरी सत्ता ने भारत को ऐसी अवस्था में छोड़ा था, जहां पग-पग पर संघर्ष था, रुकावटें थीं और नित नई चुनौतियों का मंजर था...अब जब विश्व चौधरी अमेरिका बंटा हुआ है, पूरा यूरोप बुढ़ापे से घिरा है और चीनी मंसूबों से विश्व हकलान है..,रूस की साख लगातार गिर रही है, तब देश-दुनिया के तमाम युवाओं और उनसे जुड़ी आकांक्षाओं को भारत नवीन रूप देने को तैयार है...तो आइये आजादी के इस हीरक वर्ष में शताब्दी वर्ष का लक्ष्य लेकर अमृतकाल को भारत का स्वर्णिम भविष्य गढऩे की कुंजी के रूप में आत्मसात करें... इसी भाव के साथ प्रत्येक देशवासी को राष्ट्रपर्व ७५वें स्वाधीनता दिवस की हार्दिक बधाई, शुभकामनाएं..!