स्वतंत्रता और सभ्यता एक-दूसरे के पूरक
   Date15-Aug-2022

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अरविंद पंडित
स्व तंत्रता का विचार सभ्य समाज की बुनियाद है। भारत अपनी आजादी का 75वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। यह आजादी का अमृत महोत्सव भी है। 15 अगस्त 1947 को भारत ने ब्रिटिश शासन से आजादी पाई। स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए असंख्य वीर बलिदानियों ने अपना बलिदान देकर देश को दो सौ साल की अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराया। स्वतंत्रता का उत्सव मौजूदा पीढ़ी के लिए पूर्वजों द्वारा त्याग-तपस्या और संघर्ष का जीता जागता इतिहास है। स्वतंत्रता दिवस हमारी सांस्कृतिक विरासत और देश के विशिष्ट भाव को अक्षुण्ण बनाए रखने की साधना का मूल मंत्र भी है। 'पराधीन सपनेहु सुख नाहिÓ यह सभ्य समाज की बुनियाद है। इसीलिए सभ्यता प्रगतिशील है। सभ्यता विचारों, भावों, परंपराओं और संस्थाओं का सम्मिश्रण है और इन सबका संतुलन स्वतंत्रता की आधार भित्ति है। यदि इनमें असंतुलन हुआ तो समाज, संगठन का सारा क्रम बिगड़ जाता है।
संप्रदायों की अपनी वृत्ति, राजनीतिक हित पाने की मंशा में राष्ट्रीय हित दाव पर लगाने की वृत्ति में राजनीतिक संगठन सभ्यता की अवधारणा पर कुठाराघात करते हैं। कोई सरकार कानून द्वारा जनता को सहिष्णु और नेक नहीं बना सकती, किन्तु सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं आपसी सौहार्द और सहयोग से आमजन में अज्ञान, बीमारी, गरीबी और असुविधाओं की भावना, जिसके कारण दिमाग संकुचित, संकीर्ण और ईष्यालु व झगड़े बढ़ाने का कारण बनता है आदि को दूर कर सकती है। इस संस्थाओं का समन्वय ज्ञान का सार्वभौमिक प्रचार कर सकती है, आमजन की आर्थिक स्थिति बेहतर बना सकती है और सभी के लिए एक सी सुविधाएं भी जुटा सकती है। शायद इसी से मानसिक और आध्यात्मिक चेतनाओं के द्वार खुलते हैं और दृष्टिकोण विस्तृत होता है। सामाजिक एकता के लिए यही आवश्यक कुंजी है। सामाजिक उन्नति, सामाजिक कर्क को मिटाती है। समान वितरण की अनिवार्य शर्त, बुनियादी सामाजिक न्याय की आधारशिला है। इसके अभाव में सामाजिक जीवन ईष्या, मनमुटाव, दलित इच्छाओं और एक-दूसरे पर हावी होने की भावना से अव्यवस्थित हो जाता है। सुविधाएं मनुष्य को उन्नत बनाती हैं और विज्ञान ने इस बात को संभव बनाया है कि ज्ञान और आराम सभी के लिए सुलभ है। परिश्रम और कष्ट को आराम और सुख में बदला जा सकता है। यदि इस विचार को अंगीकार किया जा सके, तो लड़ाई और वैमनस्यता से हटकर, शांति और सहयोग की कोशिश बढ़ेगी। इस संबंध में जितना व्यापक प्रयत्न होगा, उतना ही सामाजिक न्याय के आदर्श के निकट पहुंचा जा सकता है। जब किसी भी ी-पुरुष या बालक को अपनी शक्ति और संभावना प्रकट करने का अवसर मिलता है, उसी अनुपात में सामाजिक जीवन भी ऊंचा उठता है। व्यक्तित्व का विकास समाज के भीतर होता है। वह समाज के सहयोग के बिना संभव नहीं है। समाज में पारस्परिक सहयोग व्यक्तित्व विकास के लिए जरूरी है। जब असंबद्धताएं मिटती हैं तो समाज का स्तर भी उठता है।
सामाजिक न्याय के लिए सार्वजनिक शिक्षा जरूरी है। शिक्षा थोड़े से व्यक्तियों के लिए विकास का साधना नहीं, बल्कि सभी के लिए जरूरी है। अज्ञान और अशिक्षा, दुराग्रहों का कारक है और यदि दुराग्रह सामाजिक सुधार के रास्तों में व्यवधान है। बिना शिक्षा के सभ्यता की कल्पना बेमानी है। शिक्षा का अर्थ, सदियों की संचित हमारी संस्कृति और समाज के व्यापक संगठन से ही कष्ट और मुसीबतें दूर हो सकती है। शिक्षा का अर्थ, गुलामीकी मानसिकता से मुक्ति दिलाना भी है। शिक्षा का अर्थ, व्यवस्था की भावना पैदा करना और एक नया दृष्टिकोण पैदा करना है। इतिहास को दुनिया की व्यापक घटनाओं के संबंध में पढ़ाया जाना चाहिए। इसीलिए 'मीराÓ को मदरसो तक और 'मीरÓ को चौपालों तक लाया जरूरी है।
सभ्यता एक मानसिक और सामाजिक प्रक्रिया भी है। यह विषम परिस्थितियों और भीषण प्रतिक्रियाओं पर एक नैतिक आवरण भी है। समाज विज्ञान का गहरा अध्ययन मनोवैज्ञानिक प्रचार और प्रवृत्तियों से दूर रख सकता है। इससे भारतीय परिस्थिति की एक मुसीबत से छुटकारा पाया जा सकता है। यथेष्ट ज्ञान और फैसले की क्षमता मनुष्य को सभ्य बनाती है। प्रोफेसर 'ग्राहम वालाजÓ ने कहा था - 'हिन्दुस्तान को अपने लिए स्वयं सोचना होगा।Ó इसका अर्थ यह है कि भारतीय अपनी समस्याओं को समीक्षात्मक ढंग से देखें और उसे हल करें। संस्कृतियों और समाज विज्ञानों का सम्मिलित अध्ययन शिक्षा संस्थानों को न केवल उदार शिक्षा का केन्द्र बना देगा, बल्कि उन्हें शक्तिपूर्ण सुधारात्मक विचार आंदोलन की शक्ल देगा। यही नागरिकता के गहरे भाव बोध के लिए जरूरी भी है। गरीबी और निरक्षरता आपस में गुथे हुए है। जिससे निजात पाना सभ्यता का जरूरी ऊपक्रम है। गरीबी दूर होने से और आर्थिक जीवन के चहुमुखी विकास से गलत फहमियों से निजात पाई जा सकती है, जो सांप्रदायिक भावनाओं को बढ़ाती है। नए-नए उद्योग-धंधे और वाणिज्य-व्यवसाय की उन्नति, वैज्ञानिक उपाय, पुराने उद्योग-धंधों का पुनर्गठन, वर्तमान सामाजिक संगठन में बड़ी तब्दीली ला सकते हैं। मध्य वर्ग के सामने यदि बेकारी और बेरोजगारी का प्रश्न न हो तो यह उन समस्त आपसी संघर्षों से मुक्त होगा, जिन्हें बेकारी पैदा करती है। इससे मध्यम वर्ग अपने अतीत के रूदन के बजाय भविष्य के प्रति आशान्वित होगा। मजदूर वर्ग में भी मजहबी भावनाओं के स्थान पर अपने वर्ग भी भावना प्रबल होगी और यही उन्हें जिन्दगी के आधुनिक रूप की ओर ले जाने में मददगार साबित होगी। नई परिस्थिति निराश के कोहरे पर प्रकाश की किरण साबित होगी।
स्वतंत्र भारत में परस्पर निर्भरता सामुदायिक विकास, सामाजिक विकास का तरीका है और इसे ही जीवनशैली बनाना जरूरी है। 'गतं न शोचामीÓ जो हो गया, उस पर दुख मनाने के बजाय नए सिरे से उठ खड़े होने की जरूरत है।
आजादी के 75 बरस में प्राप्त उपलिब्धयां यद्यपि हमारे सुकून और सांत्वना के विषय है तथापि इन उपलब्धियों ने यह सिद्ध किया है कि संगठित होने, सुस्थिर होने और गतिशिल परिवर्तनों के अनुकूल कार्य करने की हममें पूरी क्षमता है। फिर भी वह दिन अभी दूर है जब हम एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की संरचना कर पाएं, जहां अधिक से अधिक लोगों की भलाई सामने रखते हुए उपलब्ध काम में लाए जाए। इन साधनों के पूरे संरचना के लिए ही नहीं बल्कि उनके संवर्धन और उपयुक्त प्रयोग के लिए भी हमें निरंतर प्रयास करने होंगे। नैतिकता एक अच्छे समाज और राज्य की सबसे बडी़ निधि है। संपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था को अपने स्पंदन के लिए नैतिक परिवर्तन के महत्व को समझना और आत्मसात करना होगा। पारदर्शिता, उत्तर दायित्व और जनहित समर्पण की भावना राजनीतिक दलों के अनिवार्य गुण है। इसे समझा जाना जरूरी है। आमजन की यह सोच भारतीय राजनीति में इस बदलावके लिए उद्यत है। मानव की स्वतंत्रता और स्वाधीनता ऐसे मूल्य है, जिन्हें संजोकर रखना चाहिए। ये केवल राजनीतिक या दार्शनिक सिद्धांत नहीं है, बल्कि यह हमारे संविधान का मंतव्य है और यही स्वतंत्रता संग्राम का लक्ष्य भी रहा।
'है जगा इंसान तो मौसम बदलकर
ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढलकर
ही रहेगा।।Ó
(लेखक स्वतंत्र लेखन करते हैं)