कोरोना संक्रमण का खतरा...
   Date13-Aug-2022

vishesh lekh
कोरोना का आतंक अगर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है, तो इस समस्या पर अलग तरह से सोचने का समय आ गया है...प्रतिदिन 16 हजार से ज्यादा मामलों का दर्ज होना तो चिंताजनक है ही, उससे भी ज्यादा गंभीर है एक-एक दिन में 50 से ज्यादा लोगों की मौत...पिछले दिनों कोरोना का भय इसलिए कम हुआ, क्योंकि कोरोना से होने वाली मौतें न्यूनतम हो गईं। किसी भी बीमारी या महामारी का आतंक वहीं तक रहता है, जहां तक मौत की आशंका रहती है। अब अगर मौतों की संख्या बढऩे लगी, तो फिर कोरोना का आतंक भी लौट आएगा। मौसमी तौर पर भी लोगों में अस्वस्थता बढ़ी है। खांसी-जुकाम के इस समय में कोरोना भी अस्पतालों पर दबाव बढ़ाने लगा है। भारत में कुल सक्रिय मामले 1,28,261 हो गए हैं। सरकारी दिशा-निर्देश बिल्कुल स्पष्ट हैं। बुखार, सांस में तकलीफ, खांसी, सीने में जकडऩ, बहती नाक, सिरदर्द, बीमार महसूस करना, न्यूमोनिया, किडनी में शिकायत, गंध की कमी (एनोस्मिया) या स्वाद की कमी (एजुसिया) को गंभीरता से लेने की जरूरत है। इनमें से कोई भी शिकायत होने पर कोरोना जांच की सलाह दी गई है। कोई संदेह नहीं कि मृतकों की संख्या इसलिए भी बढ़ी होगी कि लोग जांच या इलाज में देरी कर रहे हैं। स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद कोरोना से किसी की जान चली जाए, तो यह बड़ी विफलता है। हम बेहतर सामुदायिकता का परिचय देते हुए स्वस्थ रह सकते हैं। सितंबर 2020 में पहली लहर के दौरान प्रतिदिन 98 हजार मामले आ रहे थे, मई 2021 में दूसरी लहर के दौरान प्रतिदिन के मामले 4 लाख 14 हजार से भी ऊपर पहुंच गए थे। फरवरी 2022 में तीसरी लहर के दौरान 3 लाख 47 हजार के पार पहुंच गए थे। अगर अभी चौथी लहर दिख रही है, तो प्रतिदिन मामले 20 हजार के आसपास चल रहे हैं और शायद थोड़ी-सी सावधानी से हम कोरोना को पूरी तरह काबू में कर सकते हैं। विशेष रूप से सात राज्यों में कोविड के मामलों में अचानक वृद्धि भारत सरकार के लिए चिंता का विषय है। स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने भी सात राज्यों को सतर्क किया है। दिल्ली, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, तमिलनाडु और तेलंगाना को लिखे पत्र में इशारा किया गया है कि भीड़भाड़ वाले आयोजनों से बचा जाए। इधर सामूहिक आयोजनों में वृद्धि देखी जा रही है, हर जगह भीड़ लौट आई है, पाबंदियां बीती बातें हो गई हैं। ऐसे में, स्थानीय स्तर पर मरीजों की संख्या देखते हुए पाबंदियों की वापसी में कोई हर्ज नहीं है। उन स्कूलों पर भी निगाह रखनी चाहिए, जहां मौसमी समस्याओं के अलावा कोरोना के मामले प्रकाश में आ रहे हैं। विशेषज्ञ लगातार चेतावनी देते रहे हैं और सभी को कोविड-अनुकूल व्यवहार बनाए रखना चाहिए, लेकिन कितने लोग सावधान हैं? शारीरिक दूरी की अनिवार्यता को खत्म समझ लिया गया है, हाथ की स्वच्छता में कमी आई है, सार्वजनिक स्थानों पर मास्क पहनना और भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में जाने से बचना कम हुआ है।
दरअसल, समस्या यही है, बीमारी के लक्षण लेकर भी लोग घूमने निकल जा रहे हैं। हाल ही में नेपाल ने संदिग्ध भारतीय पर्यटकों को लौटा दिया है और वह भारत में बढ़ते मामलों के मद्देनजर मेहमान भारतीयों पर निगाह रखता दिख रहा है। अभी कोई देश नहीं चाहेगा कि उसके यहां बाहर से कोरोना आए। अत: जहां लक्षण वाले लोगों को यात्रा व भीड़ में जाने से रोकने की जरूरत है, वहीं अस्वस्थ महसूस कर रहे लोगों को भी घर में ही रहना चाहिए।
दृष्टिकोण
जांच प्रक्रिया में अडंग़ा...
देश में जांच एजेंसियों को जिस तरह से काम करने से रोका जा रहा है.., उसकी जितनी निंदा की जाए, कम है... संघीय ढांचे के लिए भी यह एक बड़ा सवाल है कि एक प्रदेश की पुलिस या जांचकर्ताओं को दूसरे प्रदेश में जांच करने में आखिर क्यों परेशानी हो रही है..? ताजा शिकायत के अनुसार, पश्चिम बंगाल सीआईडी ने दावा किया है कि नई दिल्ली और गुवाहाटी में उसकी दो टीमों को स्थानीय पुलिस ने रोका है...क्या झारखंड के तीन विधायकों से नकद जब्ती के संबंध में पश्चिम बंगाल के जांचकर्ताओं को जांच से वाकई रोका जा रहा है? यह वाकई अफसोसजनक है, जांच एजेंसी के एक वरिष्ठ अधिकारी का दावा है कि उसके अधिकारियों को गत दिनों दिल्ली पुलिस ने हिरासत में ले लिया था...ये जांच अधिकारी राष्ट्रीय राजधानी में एक आरोपी, तीन गिरफ्तार विधायकों के करीबी सहयोगी की संपत्ति पर छापेमारी कर रहे थे...अगर पश्चिम बंगाल की पुलिस ने किसी प्रक्रिया का पालन नहीं किया है, तो यह गलत है..,लेकिन अगर प्रक्रिया का पालन हुआ है, तो उसे जांच से रोकना अनुचित है...किसी भी राज्य में किसी भी पुलिस दल को जांच से रोकने के पीछे के तर्क बहुत स्पष्ट होने चाहिए...झारखंड के तीन विधायकों को 31 जुलाई को पश्चिम बंगाल के हावड़ा में 49 लाख रुपए नकद के साथ गिरफ्तार किया गया था... इस मामले के तार पश्चिम बंगाल सीआईडी को असम और दिल्ली से जुड़े नजर आ रहे हैं.., तो उसे जांच करने की मंजूरी मिलनी चाहिए...लेकिन जब पश्चिम बंगाल की टीम गुवाहाटी में उतरी, तो उसे परेशानी हुई...दिल्ली में जो बंगाल की टीम पहुंची, उससे शायद एक चूक हुई है...बताया जाता है कि जिस अधिकारी के नाम से जांच की मंजूरी मिली थी.., वह अधिकारी जांच की जगह पर मौजूद नहीं था।