सदाशयता
   Date13-Aug-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
श्री सांगदेव संस्कृत महाविद्यालय, नरवर के कुलाधिपति तपोमूर्ति जीवनदत्त ब्रह्मचारी त्याग-तपस्या की साक्षात् मूर्ति थे। बड़े-बड़े संत, महात्मा तथा संस्कृत के विद्वान उनसे सत्संग के लिए उत्सुक रहा करते थे। उनकी दिनचर्या भी अत्यंत पवित्र व सात्विक थी। वे प्रतिदिन गंगा स्नान को जाते, गायत्री मंत्र का जाप करते, ध्यान लगाते और वृक्ष के नीचे बैठकर छात्रों को संस्कृत, व्याकरण और धर्मशाों का अध्ययन कराते। अपना भोजन भी वे स्वयं बनाया करते थे और उसे भगवान के प्रसाद के रूप में ग्रहण किया करते थे। एक दिन उनकी रसोई में नमक नहीं था तो उन्होंने बिना नमक के ही भोजन कर लिया। दूसरे दिन उन्होंने भोजन बनाते समय वहां नमक रखा देखा तो अपने सहयोगी से पूछा-'यह नमक क्या बाजार से मंगवाया है?Ó सहयोगी ने कहा-'आचार्य जी! आपने कल बिना नमक के ही भोजन कर लिया था तो आज आपके लिए नमक मैं छात्रावास की रसोई से उठा लाया था।Ó यह सुनते ही वे बोले-'यह तुमने अच्छा नहीं किया। मेरी दाल में विद्यार्थियों की रसोई का नमक नहीं डालना चाहिए था। मेरी तो उम्र हो चली है, पर उन विद्यार्थियों की अभी खाने-खेलने की उम्र है। उनका भोजन अच्छा होना चाहिए। और वैसे भी किसी दूसरे का अन्न लेना ब्राह्मण का धर्म नहीं है।Ó ऐसे सादगीपूर्ण व सदाशयता का रूप थे आचार्य ब्रह्मचारी जी।