मंत्र में असीम शक्ति व सामथ्र्य सन्निहित
   Date13-Aug-2022

dharmdhara
धर्मधारा
मं त्र जपकर्ता की प्राणरक्षा करता है। ईष्टदेव से तादात्म्य स्थापित करने, एकाकार होने का माध्यम भी वही है। गायत्री महामंत्र को ही लें तो दिखने में वह छोटा-सा शब्द-सम्मुच्य मात्र दिखाई पड़ता है, किंतु इसमें सृष्टि का समूचा ज्ञान एवं शक्तियां-सभी बीज रूप में सन्निहित हैं। भाव एवं श्रद्धा से भरे अंत:करण से बार-बार लयबद्ध तरीके से इसे दोहराते रहने पर वह बीज प्रस्फुटित होकर पल्लवित, पुष्पित होने लगता है और आत्मिक विभूतियों एवं भौतिक सिद्धियों से परिपूर्ण हो साधक का जीवन धन्य बन जाता है। नर से नारायण, मानव से महामानव बनते उसे देर नहीं लगती। कतिपय अनुसंधानकर्ताओं ने मंत्र शक्ति पर गहन अध्ययन, अनुसंधान किए हैं। उनके अनुसार, प्रणव संयुक्त गायत्री महामंत्र का नित्य-नियमित रूप से जप करते रहने पर शरीर और मन के बीच एक लयात्मकता उत्पन्न होती है और दोनों के अंदर विद्यमान विषाक्तता, कषाय-कल्मषता दूर होती है। जप से उत्पन्न प्रकंपन, शरीर के सूक्ष्मतंत्रों तथा हॉर्मोन प्रणाली पर अपना गहरा प्रभाव डालते हैं, जिससे उनकी सक्रियता बढ़ जाती है और समुचित मात्रा में हॉर्मोन का ाव होने लगता है। इसका असर शारीरिक क्रिया प्रणाली पर पड़ता है। यही स्थिति मन की होती है। निरंतर उछल-कूद करने वाला चंचल मन अपने ध्येय पर एकाग्र होने लगता है और यहीं से सफलता का सोपान आरंभ हो जाता है। योगशा, मन की शक्ति-सामथ्र्य को असीम बताते हैं। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक आंद्रे ने अपनी कृति योगा-सेल्फ टॉट में कहा है कि अकेले ú मंत्र का यदि नित्य नियमित रूप से जप किया जाए तो इसका मन और शरीर पर सुनिश्चित रूप से आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ता है। प्रयोग-परीक्षणों में पाया गया है कि पद्मासन या सुखासन में बैठकर गहरे श्वास लेते हुए जब ú का उच्चारण किया जाता है, तो प्राकृतिक रूप से ú की लंबी ध्वनि स्वरयंत्र को प्रकंपित करते हुए निकलती है। यह मधुर भी हो सकती है और भारी भी। इसका अनुभव इस प्रकार भी किया जा सकता है कि सही उच्चारण करते हुए सीने पर हाथ रखकर देखा जाए तो पता चलेगा की गर्दन की हड्डियों में कंपन हो रहा है।