भारत के विज्ञान से वैश्विक उम्मीदें...
   Date12-Aug-2022

vishesh lekh
कोरोनाकाल में हमने चिकित्सा शोध के क्षेत्र में नए आयाम गढऩे का प्रमाण प्रस्तुत किया है... रक्षा के क्षेत्र में भी अगर हम आज निश्चिंत बैठे हैं, तो इसमें भी भारतीय विज्ञान की बड़ी भूमिका है... भारत लगातार अपनी मिसाइल प्रणाली को दुरुस्त करता आ रहा है... अग्नि मिसाइलों का विकास भारत की शान है... दवा व वैक्सीन के मामले में दुनिया को भारतीय विज्ञान क्षेत्र से सबसे ज्यादा उम्मीदें हैं... हमने आजादी के 75वें वर्ष में जिस तरह टीकाकरण अभियान चलाया है, उसे तो शायद ही कोई भूल सकता है... यदि हमें महाशक्ति बनना है, तो आने वाले वर्षों में विज्ञान हमारा एक सबसे मुख्य लक्ष्य होना चाहिए...भारत विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया का एक जाना-पहचाना देश है... प्राचीन काल से आधुनिक काल तक भारत ने दुनिया को अपनी किसी न किसी वैज्ञानिक योग्यता से चौंकाया है... इसमें कोई शक नहीं कि किसी भी अन्य विषय से विज्ञान की भूमिका ज्यादा होती है... जिन देशों ने विज्ञान पर ज्यादा ध्यान दिया है, वे आज विकसित हैं और जिन देशों ने विज्ञान को ज्यादा महत्व नहीं दिया, वह न केवल पिछड़े हैं, बल्कि दूसरे देशों पर निर्भरता उनकी मजबूरी है... देश के आजाद होते ही वैज्ञानिक अनुसंधान को प्राथमिकता देने वाली पंचवर्षीय योजना को आगे बढ़ाया गया था... भारत में योजना आयोग की स्थापना 1950 में कृषि, विज्ञान, बुनियादी ढांचे और शिक्षा जैसे प्रमुख क्षेत्रों में की जाने वाली कार्रवाइयों की योजना बनाने और विचार करने के उद्देश्य से की गई थी... पहली योजना से ही देश में विज्ञान की नींव मजबूत होनी शुरू हुई थी... आजादी के बाद के दशक में ही देश में राष्ट्रीय स्तर पर ग्यारह शोध संस्थानों को मान्यता दी गई थी... हरित क्रांति विज्ञान के दम पर ही संभव हुई... देश को भरपेट भोजन देने के लिए फसल उपज क्षमता, सिंचाई प्रणाली, प्रभावी उर्वरक, कीटनाशक, बिजली स्रोत, कृषि उपकरण के बारे में अनुसंधान की कमी थी... सरकार ने कृषि को आगे बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान को प्राथमिकता दी, तो भारत अपनी जरूरतभर का अनाज पैदा करने लगा... विज्ञान न होता, तो हम शायद अनाज के मामले में आत्मनिर्भर नहीं हो पाते... खेतों से लेकर अंतरिक्ष तक भारत के प्रयास धीरे-धीरे दुनिया को दिखने लगे... भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना 1969 में भारत की राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी के रूप में की गई थी... पहला भारतीय उपग्रह आर्यभट्ट था, जिसे भारत में डिजाइन और निर्मित किया गया था और इसे 19 अप्रैल 1975 को लॉन्च किया गया था... यह एक ऐसी बड़ी कामयाबी थी, जिससे देश का माथा गर्व से ऊंचा हो गया था... परमाणु क्षेत्र में भी भारत दुनिया के विशेष देशों में शामिल हो गया था... यह ऐसा दौर था, जब दुनिया के ज्यादातर देश भारत की तरक्की के प्रशंसक नहीं थे, लेकिन भारतीय जमीन पर जो वैज्ञानिक पैदा हो रहे थे, उन्हें नए-नए आविष्कारों व अभियानों से भला कौन रोक सकता था...?
दृष्टिकोण
राजनीति का अपराधीकरण चिंताजनक...
राजनीति में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की बढ़ती पैठ को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है... हर पार्टी जब सत्ता से बाहर होती है, तो ऐसे तत्वों को सत्ता से बाहर करने का बढ़-चढ़कर दावा करती है... मगर हकीकत यह है कि हर चुनाव के बाद आपराधिक छवि के प्रतिनिधियों की संख्या कुछ बढ़ी हुई ही दर्ज होती है... अब तो इस बात का भी ख्याल नहीं रखा जाता कि जिन लोगों पर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं, उन्हें सरकार से दूर रखा जाए... उन्हें बेधड़क मंत्री तक बना दिया जाता है... इसका नतीजा यह हुआ है कि आपराधिक छवि के लोगों की राजनीति में पैठ लगातार बढ़ती गई है... बल्कि अब तो यह भी प्रवृत्ति देखी जा रही है कि अपराध की दुनिया से राजनीति में प्रवेश करने की कोशिशें खूब फलीभूत हो रही हैं... इसलिए कि हर राजनीतिक दल ऐसे लोगों को संरक्षण देता है... इसी का नतीजा है कि नोएडा में एक बदमाश किस्म का भाजपा कार्यकर्ता उत्तरप्रदेश के कुछ बड़े नेताओं के करीब पहुंचा और उसने अच्छी-खासी हैसियत हासिल कर ली... उसे सरकार और प्रशासन के लोगों का लगातार संरक्षण मिलता रहा और उसका मनोबल इस कदर बढ़ता गया कि धौंस के बल पर उसे कुछ भी करने से गुरेज नहीं रहा... सरकार और प्रशासन की नींद तब उड़ी जब उस बदमाश किस्म के नेता ने अपनी ही रिहाइशी कॉलोनी की एक महिला से बदसलूकी की... उस महिला ने उसकी करतूतों का वीडियो सार्वजनिक कर दिया और फिर बहुत सारे लोग उसके समर्थन में उतर आए... इसके बाद वह छुटभैया नेता फरार हो गया और उसे पकडऩे के लिए पुलिस की करीब एक दर्जन टुकडिय़ां गठित कर दी गर्इं...
भाजपा के ही कुछ वरिष्ठ नेताओं ने उसकी गिरफ्तारी न होने को लेकर पुलिस की तीखी आलोचना शुरू कर दी।
दरअसल, उस नेता ने अपने मकान के आसपास की जमीन पर अवैध कब्जा करना शुरू कर दिया था। इस पर उस हाउसिंग सोसाइटी के लोगों ने शिकायत भी दर्ज कराई थी, पर नेता के रसूख और धौंस के चलते प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की। जब सोसाइटी की ही एक महिला ने उसे अवैध कब्जा करने से रोकने का प्रयास किया तो उस नेता ने उसे गालियां दीं और अभद्र व्यवहार किया। स्वाभाविक ही उस नेता के आचरण को लेकर लोगों ने प्रदेश के मुख्यमंत्री की आपराधिक तत्त्वों के खिलाफ सख्त नीति पर अंगुलियां उठानी शुरू कर दीं।
हालांकि किसी एक कार्यकर्ता या नेता के आचरण के चलते किसी पूरी सरकार या पार्टी को कठघरे में नहीं खड़ा किया जा सकता, पर जिस तरह नोएडा के मामले में कुछ नेताओं, मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों का रवैया सामने आया, उससे सरकार के कामकाज पर तो सवाल उठेंगे ही। जो सरकार और पार्टी यह दावा करते नहीं थकती कि उसने प्रदेश से गुंडों का सफाया कर दिया है, उसी की छत्रछाया में अगर ऐसे लोग पलते हों, जो न सिर्फ महिलाओं के प्रति अभद्र व्यवहार करते, बल्कि कई तरह के आपराधिक कृत्य करते हों। उनके आचरण के बारे में जानते हुए भी कुछ बड़े नेता और अधिकारी उन्हें संरक्षण देते हों, तो फिर गुंडागर्दी से समाज को निजात दिलाने का संकल्प भला कहां पूरा हुआ। अगर कोई पार्टी या सरकार अपने गुंडों को संरक्षण दे और दूसरे दलों के लोगों को जानबूझ कर निशाने पर रखे, तो उस पर सवाल तो उठेंगे ही।