भावी वृक्ष का मूल
   Date12-Aug-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
ए क छोटा-सा गांव। केवल सौ घरों की आबादी। उसमें रहने वाले एक संन्यासी सुबह से शाम तक गांव के रास्ते साफ करने, अशिक्षितों को पढ़ाने, बीमारों की दवा करने, वृद्धों और अपंगों की सहायता करने, कथा-कहानी सुनाने आदि कामों में लगे रहते थे। गांव के अज्ञानी लोग बेचारे साधु की कदर करना क्या जानें। एक बार गांव में एक सुशिक्षित नौजवान कार्यकर्ता आया। साधु से चर्चा कर वह जान गया कि वे काशी नगर के संस्कृत के महान् विद्वान् हैं। ऐसी महान् विभूति ऐसे छोटे गांव में सड़ती रहे... इसका ही उसे आश्चर्य लग रहा था। युवक बोला- 'महाराज आप जैसी प्रतिभा को तो देश-विदेश में जाकर संस्कृति का प्रसार करना चाहिए। यहां कहां गांव में पड़े हैं ?Ó साधु बोले- 'बेटा, देश में ऐसे मनुष्यों की कमी नहीं है। कमी तो है धूल में डट जाने की इच्छा रखने वालों की। चतुर्दिक कीर्ति फैलाने वाले विद्वान् तो बहुत हैं, मगर धूल में दबकर भावी विकास के वृक्ष का मूल बनने, अपेक्षा-रहित बनकर जमीन में ही दबे रहकर वृक्ष को पोषण पहुंचाने वाले विरले ही मिलते हैं। वृक्ष को फैलाने के लिए मूल भी तो चाहिए। मैं ऐसा ही मूल बनना चाहता हूं। कभी उसी में से वटवृक्ष बनेगा।