शांति के लिए मन का विसर्जन जरूरी
   Date12-Aug-2022

dharmdhara
धर्मधारा
म न जब स्वयं के प्रति पर्युत्सक होता है तो सचेत होने लगता है। वह एकांत में प्रश्न पूछता है- 'हमारे भीतर इतना विक्षोभ, इतना विरोध, इतनी कलह क्यों है, क्यों है वर्गभेद, इतना वैमनस्य, इतना गिरोहवाद हममें क्यों है?Ó इस तरह के प्रश्नों के साथ दो वातायन खुलते हैं। ज्ञात से छुटकारे के लिए मन कलपता है। धीरे-धीरे ज्ञात से मन विमुख होने लगता है। यह बदलाव व्याकुलता लाता है, मगर यही व्याकुलता शांति का उपोद्घात है। धीरे-धीरे अतीत का कूड़ा जल उठता है और भविष्य के नाम पर सिर्फ वर्तमान रह जाता है। एक गहन शांति का अनुभव होता है, मगर तब मन कहीं शेष नहीं रह जाता। इसे अनुभव करने के लिए बोधिधर्म एवं चीन के सम्राट के अनुभव को अपना अनुभव बनाना पड़ेगा। संत बोधिधर्म जब चीन गए तो चीन के सम्राट उनसे मिलने आए। बातचीत के क्रम में सम्राट ने उनसे कहा - 'मेरा मन बहुत व्याकुल है और अशांत है। आप भगवान बुद्ध के ज्ञान को अनुभव करने वाले महान संत है, मुझे कोई ऐसी विधि बताएं कि मेरा मन शांत हो जाए।Ó बोधिधर्म ने उनको बड़े रहस्यपूर्ण ढंग से देखा और बोले - 'कुछ भी मत करो। पहले अपना मन मेरे पास ले आओ।Ó सम्राट कुछ समझ नहीं सके। उन्होंने कहा 'आप कहना क्या चाहते हैं?Ó बोधिधर्म ने कहा 'सुबह चार बजे आना, जब कोई नहीं होता। अकेले आना और ध्यान रखना, अपने मन को साथ लेते आना।Ó इस बात को सुनकर सम्राट सारी रात सो नहीं सके। बहुत बार तो उन्होंने वहां जाने का विचार ही रद्द कर दिया। कई बार सोचा, वह आदमी कहीं पागल तो नहीं है। आखिर क्या मतलब था उनका, मन को साथ लेकर आना। लेकिन बोधिधर्म में अद्भुत सम्मोहन, अपूर्व चुंबकत्व था। सम्राट उस नियोजित भेंट को निरस्त न कर सके। जैसे कोई चुंबक उन्हें अपनी तरफ खींच रहा था। चार बजे वे बिस्तर से उठे और उन्होंने अपने आप से कहा - 'मैं जाऊंगा तो जरूर। उनके पास कुछ विशेष तो अवश्य है।Ó इस तरह सोचते हुए वे वहां जा पहुंचे, जहां बोधिधर्म बैठे हुए थे। पहुंचते ही उन्होंने कहा 'आ गए, कहां है आपका मन? अपने साथ लाए हैं या नहीं?Ó सम्राट ने कहा 'यह क्या बात हुई? अब मैं यहां हूं तो मेरा मन भी यहीं है। यह कोई ऐसी चीज तो नहीं, जिसे घर में रखा जा सके। वह मुझमें ही है।Ó बोधिधर्म ने कहा 'तो पहली बात तो यह पक्की हुई कि आप का मन आप में ही है।Ó सम्राट ने कहा 'हां, ऐसा ही है।Ó तब बोधिधर्म ने कहा 'फिर ठीक है, बंद करो आंखे और खोजो उसे।Ó सम्राट ने आंखे बंद कर लीं और लगे खोजने मन को। जितना अनुभव किया- 'अरे मन तो कुछ है ही नहीं, बस विचारों की हलचल मात्र है।Ó यह कोई ऐसी चीज नहीं, जिसे ठीक-ठीक इंगित किया जा सके, लेकिन जिस क्षण उन्होंने इस सच को जाना, उसी क्षण उन्हें अपनी खोज का बेतुकापन भी खुलकर प्रकट हो गया।
यदि मन कुछ है ही नहीं, तो इसके बारे में कुछ किया भी नहीं जा सकता। यदि यह सिर्फ विचारों की क्रिया है तो उसे क्रियान्वित मत करो। उन्होंने अपनी आंखें खोलीं और बोधिधर्म से बोले - 'ढूंढ निकालने को मन जैसा कुछ भी नहीं है। बस, कुछ विचार है, जिनके शांत होते ही सब शांत हो जाता है।Ó