राजनीतिक स्वार्थ ही प्राथमिकता...
   Date11-Aug-2022

vishesh lekh
आखिरकार बिहार में भाजपा और जनता दल (एकी) का गठबंधन टूट गया... नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और पुन: आठवीं बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ भी ग्रहण कर ली... मुख्यमंत्री वहीं है, बस समर्थनकर्ता दल और सहयोगी चेहरेभर बदले हैं... अगर इसे मजाकिया लहजे में कहे तो यह मुख्यमंत्री का मुख्यमंत्री के लिए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा ही था, वह भी पुन: मुख्यमंत्री बनने के लिए... कुलमिलाकर स्वयं की महत्वाकांक्षा के लिए नेता व दल किस तरह से जनादेश को अपने स्वार्थ के मान से राजनीतिक रंग देने को आतुर रहते हैं... तभी तो पुन: महागठबंधन की सरकार बनी है... ऐसा दावा किया जा रहा है कि भाजपा-जदयू के बीच दोनों दलों के बीच मनमुटाव लंबे समय से चल रहा था... मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विधानसभा अध्यक्ष से खिचे-खिचे रहते थे... फिर केंद्र के कई फैसले भी उन्हें अपने सिद्धांतों के खिलाफ लगते थे... जातिवार जनगणना को लेकर तो उन्होंने केंद्र को खुली चुनौती दे डाली थी... ऐसे अनेक मौके पिछले कई महीनों में आए, जब नीतीश कुमार और केंद्र सरकार के बीच सैद्धांतिक मतभेद जाहिर होने लगे थे... ऐसे में लंबे समय से कयास लगाए जा रहे थे कि नीतीश कुमार कभी भी भाजपा का साथ छोड़ सकते हैं... उनका झुकाव भी राष्ट्रीय जनता दल की तरफ अधिक देखने को मिल रहा था... तेजस्वी यादव के प्रति उनका नरम रुख प्रकट होने लगा था... मगर जब जनता दल (एकी) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह ने इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थाम लिया तो परदे के पीछे चल रहा खेल सामने उभर कर आ गया... नीतीश कुमार ने केंद्र में होने वाले मंत्रिमंडल विस्तार में अपने सासंदों के हिस्सा न लेने की घोषणा कर दी... फिर बिहार में विधायकों की बैठक बुलाई गई और उसमें अलग होने का मन बना लिया गया... अब राजद, कांग्रेस और महागठबंधन के दूसरे कुछ दलों ने नीतीश कुमार को समर्थन दिया है... नीतीश कुमार नए गठबंधन के नेता बनकर मुख्यमंत्री की शपथ ले चुके हैं... और उन्होंने तेजस्वी यादव से कहा कि वे पांच साल पहले की बातें भूल जाएं और अब नए सिरे से शासन चलाने पर ध्यान दें... इस तरह नीतीश कुमार को पहले से अधिक बहुमत मिल गया है और उम्मीद जताई जा रही है कि नए गठबंधन की सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी... तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री बनाकर लालू को साधने का प्रयास ही है... पर नीतीश कुमार से यह सवाल तो पूछा ही जाता रहेगा कि पिछले चुनाव में जब उन्होंने राजद के साथ मिल कर चुनाव लड़ा था तब खुल कर भाजपा को सांप्रदायिक पार्टी कहा था और फिर सरकार बनाई तो वे भाजपा को खरी-खोटी सुनाते नहीं थकते थे... मगर फिर क्या हुआ कि उसी भाजपा से गलबहियां कर बैठे और बाकी का कार्यकाल पूरा किया... राजनीतिक मौसम वैज्ञानिक की भांति नीतीश की छवि भी अब सत्ता की अवसरवादिता के स्वार्थ में डूब जाने वाली नजर आती है... 2024 की महत्वाकांक्षा ने नीतीश को कभी इधर, तो कभी उधर का बनाकर छोड़ा है...
दृष्टिकोण
विद्युत संशोधन विधेयक...
लोकसभा में गत दिनों विद्युत संशोधन विधेयक 2022 पेश किया गया है... इस विधेयक को लेकर विपक्षी सांसद सरकार पर हमलावर है... लेकिन वास्तविकता से मुंह मोड़कर किसी भी विषय या निर्णय का विरोध करना मानो विपक्ष की नीति का एक अनिवार्य अंग बन गया है, तभी तो कुछ ऐसे मुद्दे भी है, जो विकास व निर्माण को गति देने के लिए अतिआवश्यक है, उन पर भी क्षणिक राजनीतिक स्वार्थ को महत्व देकर पूरे विषय से दिशाभ्रमित करना उचित नहीं माना जा सकता... तभी तो केन्द्रीय ऊर्जा मंत्री आर.के. सिंह ने विधेयक पेश करते हुए कहा कि यह विधेयक अर्थव्यवस्था के विकास के लिए जरूरी है... क्योंकि इसमें सब्सिडी प्रावधान में कोई बदलाव नहीं किया गया है... यही नहीं सरकार ने विधेयक को संसद की स्थायी समिति को भेजने का अनुरोध किया, ताकि इस पर विस्तार से चर्चा कराई जा सके... फिर विपक्ष सिर्फ यह आरोप लगाकर पल्ला नहीं झाड़ सकता कि इस विधेयक के संबंध में राज्यों से चर्चा नहीं की गई... इस विधेयक के अंतर्गत उपभोक्ताओं को मोबाइल फोन कंपनी की तरह बिजली वितरण कंपनी चुनने की आजादी होगी... निजी बिजली कंपनियों को बिजली वितरण का लायसेंस लेने की अनुमति मिल जाएगी... केन्द्र के पास बिजली नियामक आयोग के गठन के लिए चयन समिति का अधिकार होगा... बिजली वितरण क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी... सेवाओं में सुधार भी होगा... वितरण कंपनी तय समय पर भुगतान नहीं करती है तो वितरण कंपनी को बिजली आपूर्ति बंद कर दी जाएगी... अब अगर बाजार में प्रतिस्पर्धा के मान से कार्य करना है और सुविधाएं सहज रूप से उपलब्ध करवाना है तो कुछ कड़े फैसले लेना ही पड़ेंगे...