राष्ट्र की समुन्नति का प्रमुख कारक दायित्व बोध
   Date11-Aug-2022

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डॉ. मनमोहन वैद्य
भा रत की सभी भाषाओं की जननी संस्कृत है यह निर्विवाद तथ्य है और संस्कृत ही है जो सभी भारतीय भाषा-भाषियों को सरलता से समझ में आती है। जैसे, मलेशिया में तमिल भाषी भारतीय बड़ी संख्या में हैं। वहां के हिंदू स्वयंसेवक संघ के प्रचारक श्री रामचन्द्रन तमिल भाषी है। संघ शिक्षा वर्ग के दोनों वर्षों का उनका प्रशिक्षण तमिलनाडु प्रांत में हुआ। तृतीय वर्ष के लिए(25 दिन) वे नागपुर गए। वहां सभी बौद्धिक हिंदी में ही होते थे जो उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आते थे। बाद में जब तमिल भाषी शिक्षार्थियों के लिए तमिल में उनका अनुवाद होता था तभी वे उसे समझते थे। उन्होंने मुझे बताया कि 25 में से केवल एक ही बौद्धिक उद्बोधन वे सीधा (बिना अनुवाद के) समझ सके क्यों कि वह संस्कृत में हुआ था। संस्कृत भाषा सभी भाषाओं से नज़दीक है इसका यह ज्वलंत प्रमाण है। भारतरत्न डॉक्टर बाबासाहेब आम्बेडकर समेत तत्कालीन अनेक नेताओं का यह स्पष्ट मत था कि भारत में सभी को संस्कृत की शिक्षा दी जाए। भारत के ज्ञान का सारा खजाना संस्कृत में है और सभी भारतीय भाषाएं संस्कृत से नजदीक है, संस्कृत से ही निकली है। भारतीय एकात्मकता के बोध के लिए भी यह उपयुक्त है। परंतु किस मानसिकता के कारण इस महती सुझाव को नहीं स्वीकारा गया?
दुनिया के सभी शिक्षाविद मानते हैं कि बालक की प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। नए विषय समझने के लिए और बालक के मानसिक, बौद्धिक विकास के लिए शिक्षा मातृभाषा में होना आवश्यक है। अच्छी अंग्रेजी भाषा सीखने के लिए सभी विषय अंग्रेजी में सीखना आवश्यक नहीं है। दुनिया के केवल 9 प्र. लोग ही अपनी मातृभाषा से अलग अन्य भाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं। भारत ऐसे कुछ देशों में आता हैं। सभी विषयों की शिक्षा अंग्रेजी में देने के नाम पर अपने यहां अंग्रेजी का वर्चस्व इतना बढ़ा दिया गया कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने वालों के मन में एक हीनता का भाव निर्माण होता दिखता है। यह भारत के 'स्वÓ भाव के विपरीत है। महात्मा गांधी जी समेत अनेक चिंतकों द्वारा मातृभाषा में ही प्राथमिक शिक्षा पर बल देने के बावजूद ऐसा क्या हुआ कि इस बात की अनदेखी की गई?
बहुत दीर्घकाल तक भारत सम्पन्न था, विश्व व्यापार में भारत का सहभाग सर्वाधिक था। हम अनाज नहीं बेचते थे। चमड़ा, धातु, लकड़ी, पत्थर की बनी वस्तुएं, कपड़ा, मसाले, हीरे आदि के व्यापार के लिए भारतीय दुनियाभर में जाते रहे हैं। इसलिए भारत कृषि प्रधान देश था ऐसा कहने के स्थान पर भारत उद्योग प्रधान देश था यह कहना अधिक उचित होगा। ये सारे उद्योग घर-परिवार में होते थे और ये परिवार ग्रामीण भारत में रहते थे। भारत के ग्राम समृद्ध होते थे। लेकिन यूरोप के प्रभाव के कारण भारत ने स्वाधीनता के पश्चात् शहर केंद्रित विकास की दिशा पकड़ ली। शहरों में भीड़, स्पर्धा, अपराध और आपसी संबंधों का बिखराव बढ़ता गया और ग्राम उपेक्षित, पिछड़े, सुविधा विहीन होने लगे। शहर में बसना प्रतिष्ठा का और ग्रामीण भाग में बसना पिछड़ेपन का लक्षण माना गया। यांत्रिक युग के कारण अधिकाधिक लाभ कमाने के मोह के मकडज़ाल में मनुष्य फंसता चला गया। भारतीय जीवन की विशेषता यह रही है कि भारत ने भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिक विकास दोनों को समान महत्व दिया है, किसी एक को नहीं। ईशावास्य उपनिषद में एक श्लोक में स्पष्ट कहा है कि जो केवल भौतिक समृद्धि के पीछे दौड़ता है वह गहरे अंधकार में प्रवेश करता है। उसी श्लोक में आगे कहा है कि जो केवल आध्यात्मिक साधना में रत रहता है वह और गहरे अंधकार में प्रवेश करता है। उपनिषद आगे कहता है कि भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति दोनों को साथ-साथ साधना ही जीवन है। इन दोनों को एक साथ साधने का योग्य परिवेश ग्रामीण जीवन में है। ग्राम में आय कम है पर व्यय भी कम है। इसलिए अच्छा जीवन जीने तथा कमाने के लिए बहुत दौड़ भाग नहीं करनी पड़ती है। कमाने के साथ साथ आध्यात्मिक साधना के लिए पर्याप्त समय और योग्य परिवेश, वातावरण ग्रामीण जीवन में हैं। इसलिए स्वाधीन भारत की विकास यात्रा की दिशा ग्रामीण विकास की हो यह महात्मा गांधी भी चाहते थे। उनका 'हिंद स्वराजÓ मुख्यत: इसी पर केंद्रित है। संविधान को स्वीकार करते समय भी - 19 से 22 नवंबर 1948 की चर्चा में संविधान सभा ने यही अपेक्षा व्यक्त की थी कि जल्द ही हम ग्राम स्वराज के पथ पर अग्रसर होंगे। परंतु पश्चिम के समाजवाद और पूंजीवाद के द्वंद्व में फंसकर हम अपना समावेशी और पर्यावरण पूरक विकास का रास्ता भूल गए। ग्रामीण भारत में शहरों की सभी सुविधाएं दिए जाने का आग्रह पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम का भी था। समृद्ध, सुखी, निरामय और आध्यात्मिक साधना में रत ऐसा जीवन जीना यही जीवन है यह भारत का विशिष्ट विचार रहा है और भारत की पहचान भी। यही भारत के 'स्वÓ की अभिव्यक्ति है। यह दिशा हम ने क्यों नहीं ली?
स्वदेशी समाज में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर कहते हैं कि '2द्गद्यद्घड्डह्म्द्ग ह्यह्लड्डह्लद्ग यह पश्चिम की कल्पना है, भारतीय नहीं। परम्परा से भारतीय समाज राज्य शक्ति पर कभी अवलम्बित नहीं था। वह समाज जो अपनी आवश्यकताओं के लिए राज्य पर कम से कम अवलम्बित है वह स्वदेशी समाज है।Ó परम्परा से केवल न्याय, विदेश संबंध और सुरक्षा ये विषय ही राज्य के अधीन होते थे। बाकी सभी विषय शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, अर्थोत्पादन, संगीत, कला, मंदिर, कथा, मेले आदि सभी समाज के अधीन रहते थेÓ। विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता ने कहा कि 'जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का पारिश्रमिक अपने ही पास न रखकर समाज को देते हैं, उस समाज में, ऐसे एकत्रित पारिश्रमिक की पूंजी के आधार पर समाज सम्पन्न- समृद्ध बनता है और समाज सम्पन्न-समृद्ध बना तो समाज का हर एक व्यक्ति सम्पन्न-समृद्ध बनता है। परंतु जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का पारिश्रमिक समाज को न दे कर अपने ही पास रखते हैं, उस समाज में कुछ व्यक्ति तो सम्पन्न- समृद्ध बनते हैं पर समाज दरिद्र रहता हैÓ। समाज को अपनेपन के भाव से देना, यह समाज का ही है, उसे लौटाना माने जीवन सार्थक होना ऐसा माना गया है। इसीलिए विवेकानंद केंद्र की प्रार्थना में कहा गया है -
जीवने यावदादानं स्यात् प्रदानं ततोस्धिकम्।
इत्येषा प्रार्थनास्माकं भगवन् परिपूर्यताम्।।
(अर्थ-जीवन में हम जितना स्वीकार करते हैं उससे अधिक लौटा सकें यह हमारी प्रार्थना हे भगवन! आप पूर्ण करो।) समाज से हमें बहुत मिलता है उसे वापस लौटाना इसे ही धर्म कहा है। ह्म्द्गद्यद्बद्दद्बशठ्ठ या उपासना इससे अलग है। उपासना धर्म के लिए होती है। धर्म का अर्थ है, प्रत्यक्ष आचरण करना, समाज को लौटाना। समाज को देना यह ष्द्धड्डह्म्द्बह्ल4 है और समाज को लौटाना यह धर्म है। भगिनी निवेदिता के अनुसार सामाजिक पूंजी को समृद्ध करना यही धर्म है। और धर्म भेदभाव नहीं करता है, वह सभी को जोड़े रखता है, सहायता करता है, साथ बांधे रखता है। यही स्वदेशी समाज का आधार है। स्वाधीनता के समय भारत के निर्माताओं के मन में यह 'धर्मÓ भाव स्पष्ट रहा होगा। इसीलिए भारत की लोकसभा में 'धर्मचक्र प्रवर्तनायÓ लिखा है। राज्यसभा में 'सत्यं वद धर्मं चरÓ, उच्चतम न्यायालय का बोधवाक्य 'यतो धर्मस्ततो जय:Ó और भारत के राष्ट्रध्वज पर जो चक्र अंकित है वह 'धर्मचक्रÓ है। चक्र घूमने के लिए ही होता है। समाज को लौटाने का प्रत्येक छोटा सा प्रयास धर्म कार्य है और ऐसे छोटे-छोटे प्रयासों से धर्मचक्र चलता है, गतिमान होता है, प्रवर्तमान रहता है। लोकसभा, राज्यसत्ता, उच्चतम न्यायालय, राष्ट्रध्वज जैसे प्रमुख स्थानों पर जिस 'धर्मÓ का स्पष्ट महत्वपूर्ण उल्लेख है उस 'धर्मÓ की कहीं कोई चर्चा नहीं है। बल्कि धर्म की बात करना साम्प्रदायिक (कम्यूनल) माना जाने लगा है। और जिस ह्यद्गष्ह्वद्यड्डह्म्द्बह्यद्व को चर्चा करने के पश्चात भारतीय संविधान में स्थान नहीं देने का सर्वानुमति से निर्णय लिया गया फिर भी उसे चुपके से किसी भी प्रकार की चर्चा-बहस किए बिना संविधान के श्चह्म्द्गड्डद्वड्ढद्यद्ग में (जो कि अपरिवर्तनीय है ऐसा संविधान ही कहता है) जबर्दस्ती से समाविष्ट किया गया। उस ह्यद्गष्ह्वद्यड्डह्म्द्बह्यद्व जैसे अभारतीय शब्द के अर्थ को परिभाषित किए बिना ही उसका धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है। ये सब किस मानसिकता की उपज है? इसका विचार करना होगा। उस अभारतीय मानसिकता से उबरकर शुद्ध भारतीय विचार को प्रतिष्ठित करने से ही अब तक नकारा गया भारत का 'स्वÓ पूर्णार्थ से, अपने पुरुषार्थ से पूर्ण प्रकाशमान होगा तभी भारत अपने स्व-गौरव के साथ मजबूती से अपना वैश्विक कर्तव्य पूर्ण करने के लिए तत्पर होगा। (समाप्त)
(लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहसरकार्यवाह हैं)