राष्ट्रमंडल ने जगाई उम्मीद...
   Date10-Aug-2022

vishesh lekh
भारत की वैदिक व नैसर्गिक खेल गतिविधियां हमेशा से महत्वपूर्ण रही है... वे सभी खेल परंपराएं आज आधुनिक दौर में खेल को नया आयाम देने में एक ऐसी कड़ी है, जिसको जितना माझा जाएगा, उतनी ही वे निखरेगी... राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का प्रदर्शन उम्मीद जगाता है, लेकिन साथ में सवाल भी खड़े करता है... क्या हमारे देश में खेल सुविधाओं का स्तर ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, कनाडा या यहां तक कि न्यूजीलैंड के स्तर का भी नहीं है..? भारतीय खेलों में अब पैसे की कोई कमी नहीं है, अत: भारत में खेल सुविधाओं में भी किसी तरह की कमी नहीं होनी चाहिए... बर्मिंघम के खेलों में हुई पदकों की बरसात और भी अच्छी हो सकती थी, लेकिन जो कमियां रह गई हैं, उन्हें जल्द से जल्द दूर करने पर सरकार का ध्यान जाना चाहिए... फिर भी राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का प्रदर्शन जितना सुखद, उतना ही उत्साहजनक भी रहा है... विशेष रूप से बैडमिंटन, कुश्ती, भारोत्तोलन में भारत की उपलब्धियां काफी मायने रखती हैं... बैडमिंटन में रविवार को ही तीन पदक पक्के हो गए थे, लेकिन तीनों ही मुकाबलों में भारतीय खिलाडिय़ों को जब स्वर्ण पदक हासिल हुए, तो यह अवसर बहुत विशेष बन गया है... पीवी सिंधु, लक्ष्य सेन के स्वर्ण के अलावा सात्विक व चिराग शेट्टी की जोड़ी ने भी स्वर्ण पर कब्जा करके फिर एक बार साबित किया है कि भारत बैडमिंटन में एक सशक्त राष्ट्र है... पीवी सिंधु की जितनी तारीफ की जाए कम होगी, वह अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में भारत का सबसे सम्मानित चेहरा बन गई हैं... लगभग यही सम्मानजनक स्थिति मीराबाई चानू की भारोत्तोलन में और साक्षी मलिक की कुश्ती में बन गई है... इसी कड़ी में मुक्केबाजी में निकहत जरीन और कुश्ती में विनेश फोगाट का नाम जोड़ लीजिए, तो भारतीय लड़कियों ने फिर एक बार कमाल कर दिखाया है... खास यह कि इसमें इस बार एक नया नाम जुड़ा है, मुक्केबाज नीतू गंघास का... इन सभी महिला खिलाडिय़ों ने स्वर्ण जीतकर भारतीय खेलों के लिए आगे की राह को प्रशस्त किया है... यह लड़कियों का ही दमखम है कि भारत राष्ट्रमंडल खेलों में सम्मान का परचम लहराने में कामयाब हुआ है... हालांकि, इस बार प्रदर्शन पिछले राष्ट्रमंडल खेलों जितना अच्छा नहीं हुआ है... गोल्ड कोस्ट में आयोजित खेलों के पिछले संस्करण में भारत 26 स्वर्ण सहित 66 पदकों के साथ तीसरे स्थान पर रहा था... यहां यह भी याद कर लेना चाहिए कि भारत ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नई दिल्ली में आयोजित 2010 राष्ट्रमंडल खेलों में किया था... भारत 2010 की पदक तालिका में दूसरे स्थान पर पहुंच गया था... तब भारत को रिकॉर्ड 38 स्वर्ण सहित कुल 101 पदक हासिल हुए थे... मैनचेस्टर 2002 में भी भारत का प्रदर्शन शानदार रहा था... तब कुल 69 पदकों में 30 स्वर्ण शामिल थे... मतलब इस बार के खेलों में अपने प्रदर्शन से भारतीय राष्ट्रमंडल दल को प्रसन्न तो होना चाहिए, लेकिन ज्यादा अभिभूत होने की जरूरत नहीं है... इसलिए उम्मीद के साथ प्रयास भी जारी रखने होंगे...
दृष्टिकोण
अल्पसंख्यक दर्जे की राह...
अंतत: जिस बात को लगातार बयां किया जा रहा था, उस पर देश के सर्वोच्च न्याय मंदिर ने भी अपनी चिंताजनक बात रखते हुए आदेश भी सुना दिए हैं... क्योंकि समय-समय पर इस बात को गंभीरता के साथ अनेक मंचों से उठाया गया कि ऐसे अनेक राज्य है, जहां पर धर्मांतरण, मतांतरण और आबादी असंतुलन के चलते हिन्दू अल्पसंख्यकों की श्रेणी में तेजी से बढ़ रहे हैं... तो दूसरी तरफ जो अल्पसंख्यक थे, वे बहुसंख्यक की हैसियत प्राप्त कर चुके हैं... यह एक तरह का असंतुलन है, जिसका कहीं न कहीं भविष्य में आने वाली पीढिय़ों को नुकसान भी उठाना पड़ेगा और पड़ रहा है... क्योंकि फिर इस मामले में सुविधा और संसाधनों का आवंटन भी गड़बड़ा जाता है... तभी तो 9 राज्यों में हिन्दुओं को अल्पसंख्यकों का दर्जा दिलाने के लिए कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर महाराज ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका लगाई थी और उन्होंने मांग की थी कि जिन राज्यों में हिन्दू अन्य धर्मों से संख्या में कम हो चुके हैं, उन्हें अल्पसंख्यकों की भांति हर तरह की सरकारी सुविधा व अधिकार मिलना चाहिए... न्यायालय ने भी 11 जजों की बेंच के द्वारा एक ऐसी बेहतर व्यवस्था बनाने की पहल की है, जिस पर राज्य अपने स्तर पर अमल करके समस्या का समाधान कर सकते हैं... राज्यों को यह अधिकार देना कि वे अपने स्तर पर इस समस्या का समाधान करे और इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए एक निर्णायक स्थिति की तरफ कदम बढ़ाए तो यह आने वाले समय में अल्पसंख्यक हो चुके हिन्दुओं के लिए एक बेहतर पहल मानी जा सकती है...