आध्यात्मिक विकास और भौतिक समृद्धि भारत की पहचान
   Date10-Aug-2022

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डॉ. मनमोहन वैद्य
भा रत के सिवा दुनिया में शायद ही ऐसा कोई देश होगा जहां के समाज के मन में 'हम कौन हैं? हमारे पुरख़े कौन थे? हमारा इतिहास क्या रहा है?' इस के बारे में कोई सम्भ्रम या भिन्न-भिन्न मत होंगे। पर भारत में, जो दुनिया का सबसे प्राचीन राष्ट्र है और जहां सब से समृद्ध समाज रहने के बावजूद हमारी इस विषय पर सहमति नहीं है। इसका एकमात्र कारण यही दिखता है कि हम एक समाज और एक राष्ट्र के नाते अपने 'स्व' को पहचानना और उसे आत्मसात् करना नहीं चाहते। कुछ उदाहरण देखें। द्वितीय विश्वयुद्ध के विनाश के उपरांत (1945) ब्रिटेन, जर्मनी और जापान ने नई शुरुआत की थी। सैकड़ों वर्षों के संघर्ष के बाद - 1948 में इजराएल ने भी अपने राष्ट्र को पुन: प्राप्त किया था। भारत ने भी शतकों की गुलामी और शोषण के उपरांत और देश विभाजन के बाद 1947 में स्वाधीनता प्राप्त की थी। लगभग एकसाथ नए सिरे से शुरुआत करने वाले इन देशों को आज हम देखते हैं तो भारत की तुलना में इन चारों देशों की स्थिति बहुत अच्छी दिखती है। क्या कारण रहा होगा?
एक सामाजिक चिंतक के अनुसार 'जब तक एक समाज के नाते हम कौन है यह हम तय नहीं करते, हम अपनी दिशा और प्राथमिकताएं तय नहीं कर सकते।' यही अंतर हैं भारत और इन देशों की विकास यात्रा में, जो कि करीब एक साथ ही शुरू हुई थी। अपने 'स्वदेशी समाज' इस ऐतिहासिक निबंध में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर लिखते हैं कि 'हमें सब से पहले हम जो है वह बनना पड़ेगा।' यह अद्भुत संयोग ही है कि आज जब हमारा देश स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाने जा रहा है तब एक ऐसा कालखंड आया है जब एक राष्ट्र के नाते भारत अपने 'स्व' के आधार पर अपनी एक नई पहचान बनाने के लिए प्रयासरत है- परंतु इसका भी विरोध क्यों होता है इस पर विचार होना चाहिए। भारत के आधुनिक इतिहास में हमें दिखता हैं कि भारत की यह पहचान, भारत का यह 'स्व' जो सदियों पुराना है, सर्वविदित है, सुस्पष्ट है उसे ही नकारा गया। इसे नकारने को लिबरल, intellectual और progressive कहलाने का फै शन चल पड़ा। स्पष्ट दिखता है कि भारत ने चूंकि अपनी विकास यात्रा की दिशा अपने 'स्व' के आलोक में तय नहीं की इसलिए भारत का उसकी क्षमता (potential) के आधार पर जितना विकास अब तक होना चाहिए था वह हम नहीं कर सके। भारत के इस 'स्व' के प्रकट होने के कई अवसर आए परंतु दुर्भाग्य से उन्हें लगातार नकारा गया। हम जानते हैं कि 1905 में बंगाल के विभाजन के विरुद्ध हुए जन आंदोलन का उद्घोष 'वन्दे मातरम्' गीत बना था। 'वन्दे मातरम्' ने हजारों युवकों को, क्रांतिकारियों को स्वाधीनता के आंदोलन में कूदने की, देश पर मर मिटने की प्रेरणा दी। 'वन्दे मातरम्' भारत के 'स्व' का सहज प्रस्फुटन था। कांग्रेस के अखिल भारतीय अधिवेशनों में इस का गौरवपूर्ण गान होता था। पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, पंडित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जैसे दिग्गज गायक इसे स्वरबद्ध कर कांग्रेस के अधिवेशनों में गाते थे। हिंदू- मुसलमान सभी इससे समान रूप से प्रेरणा पाते थे। फिर अचानक 1921 से यह केवल हिंदुओं का गीत और साम्प्रदायिक(communal) कैसे हो गया? इसके पीछे की मानसिकता को समझना आवश्यक है। 1905 से 15 वर्षों तक जो देशभक्ति का स्वाभाविक प्रस्फुटन था वह अचानक साम्प्रदायिक कहकर कैसे और क्यों नकारा गया, यह समझना आवश्यक है।
एक और उदाहरण देखें। स्वतंत्र भारत के ध्वज का सर्वप्रथम नमूना विवेकानंद शिष्या भगिनी निवेदिता ने 1905 में बनाया। दधीचि ऋ षि के तपस्वी देहत्याग से बना वज्र चिह्न अंकित ध्वज उन्होंने बनाया। पर आगे वे लिखती हैं, "unfortunately we had a Chinese war flag as model in front of us, so we made it black on red. But it doesnÓt appeal to Indians. So, ne&t one will be yellow on saffron."1906 के कांग्रेस अधिवेशन में भगवे कपड़े पर पीला वज्रचिह्न ऐसा ध्वज प्रदर्शित हुआ था।
इसके पश्चात विविध ध्वजों के विभिन्न नमूने प्रस्तावित हुए। 1921 में भारत के सभी समुदायों का प्रातिनिधिक चरखांकित - तिरंगा ध्वज बनाया गया। 1929 में मास्टर तारासिंह के नेतृत्व में एक सिख प्रतिनिधि मण्डल महात्मा गांधीजी से मिला और उन्होंने अलग-अलग समुदायों के प्रातिनिधिक ध्वज की कल्पना का विरोध किया और सभी के बीच रही एकता को दर्शाने वाला राष्ट्रीय (National) ध्वज बनाने पर जोर दिया और कहा यदि अलग-अलग समुदाय के प्रतिनिधित्व का ही विचार करना है तो सिख समुदाय का पीला रंग ध्वज में जोड़ा जाए। इस पर समग्र विचार कर सुझाव देने के लिए कांग्रेस कार्यकारी समिति ने एक ध्वज समिति का गठन किया। इस में पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, मास्टर तारासिंह, पट्टाभि सीतारामैय्या (संयोजक), काका कालेलकर और डॉक्टर हार्डीकर थे। ध्वज समिति ने राज्य कांग्रेस समिति और सामान्य व्यक्तियों से प्रचलित राष्ट्रीय ध्वज के लिए आपत्ति और सुझाव मांगे।
सब की बातें सुनकर ध्वज समिति का सर्वसम्मत निर्णय रहा कि 'भारत का ध्वज विशिष्ट(distinct), कलात्मक (artistic) और non-communal हो। यह सर्वानुमति से तय किया गया कि वह एक ही रंग का हो और यदि कोई एक रंग जो सबसे विशिष्ट है, जो सभी भारतवासियों को समान रूप से स्वीकार्य है और जो भारत जैसे प्राचीन राष्ट्र के साथ दीर्घकाल से जुड़ा है वह भगवा या केसरी रंग है। इसलिए आयताकृति भगवे कपड़े पर नीले रंग में चरखा यह भारत का ध्वज होगा यह निर्णय ध्वज समिति ने सर्वानुमति से लिया। यह निर्णय क्यों नहीं स्वीकार हुआ? वह कौन सी मानसिकता थी जिसने भारत का यह स्वाभाविक और सुविचारित 'स्व' नकारा? यह तथ्य भी विचार करने योग्य है।
1947 में स्वाधीनता के पश्चात संविधान द्वारा समृद्धि, शांति और पराक्रम को दर्शाता धर्मचक्रांकित तिरंगा हमारा राष्ट्रध्वज स्वीकारा गया। यह हमारा राष्ट्रध्वज है। उसका सम्मान तथा संरक्षण करना और अपने कर्तत्व से उसका गौरव बढ़ाना हम सभी भारतीयों का कर्तव्य है। यह निर्विवाद सत्य है। इसी तरह स्वाधीनता के पश्चात भारत की शिक्षा में जो मूलभूत सुधार अपेक्षित था वह भी नहीं किया गया। 1948 में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में बने शिक्षा आयोग की रिपोर्ट में 'शिक्षा के अभारतीय चरित्रÓ (The Un-Indian Character of Education) के बारे में वे स्पष्ट कहते है कि-
"One of the serious complaints against the system of education which has prevailed in this country for over a century is that it neglected India's past, that it did not provide the Indian students with a knowledge of their own culture. It has produced in some cases the feeling that we are without roots, in others, what is worse, that our roots bind us to a world very different from that which surrounds us."
"The chief source of spiritual nourishment for any people must be its own past perpetually rediscovered and renewed. A society without a knowledge of the past which has made it would be lacking in depth and dignity."
इससे सिद्ध होता है कि आध्यात्मिकता यही भारतीय चिंतन का आधार है। उसी के प्रकाश में शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। परंतु कांग्रेस के शासन काल में, उन्हीं के द्वारा नियुक्त शिक्षा आयोगों की अनुशंसाओं (recommendations) को लागू नहीं किया गया। शिक्षा आयोग का गठन करने वाले कांग्रेस के ही नेता थे। फिर भी उस आयोग की अनुशंसा को लागू करने से रोकने वाले कौन लोग थे, कौनसी मानसिकता थी? आज भी उस दिशा में जब प्रयास होते हैं तो उसे शिक्षा का भगवाकरण के नाम पर विरोध किया जाता है। इसके पीछे की मानसिकता क्या है - इसका विश्लेषण होना आवश्यक है। (क्रमश:)
(लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहसरकार्यवाह है)