वैदिक परंपरा और महिलाओं की समान सहभागिता
   Date10-Aug-2022

dharmdhara
धर्मधारा
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता के शक्ति आराधन स्वर इन दिनों नवरात्र में भारत के घर-घर में गूंज रहे हैं। इसी के साथ इन्हीं घरों में भारत की नारी अपनी शक्ति और अपने सम्मान की खोज कर रही है। महिला सशक्तिकरण की चर्चा के साथ महिलाओं के साथ हो रही घरेलू हिंसा, शोषण, बलात्कार की घटनाएं भी चर्चा में है। नवरात्र में शक्ति-पूजन के साथ भारत की नारी शक्ति की स्थिति पर चिंतन भी होना चाहिए। इन दिनों देवी के नौ रूपों में हम सब उस शक्ति की पूजा करते हैं, जो रचती है, जो सहेजती है और समय आने पर अन्याय का विनाश करती है। हमारे देश की नारियां अंधकार के विरुद्ध सतत् युद्ध का प्रतीक रही हैं। शक्ति-साधना के रूप में भारतीय मनीषियों ने इसी को समझने की चेष्टा की है।
वेदों को देखें तो उस काल में नारी सही अर्थों में पुरुष की शक्ति थी, सहभागिनी, सहचारिणी थी। वह उनके साथ युद्ध में जाती, कृषि कार्यों में हाथ बंटाती और साहित्य-संस्कृति की रचना में भी अपनी जिम्मेदारी निभाती। ऋग्वेज को रचने में जितनी भूमिका गृत्समद्, विश्वामित्र, वसिष्ठ, वामदेव, अत्रि व भारद्वाज जैसे महान ऋषियों की रही, उतना ही महत्वपूर्ण योगदान घोषा, अपाला, लोपामुद्रा, इंद्राणी समेत विदुषियों ने भी दिया। विद्वानों का एक बड़ा वर्ग सप्रमाण कहता है कि विवाह के समय आज तक जिन सात मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, वे किसी पुरुष ऋषि ने नहीं कहे। सूर्या सावित्री नाम की महिला ऋषि ने विवाह से पूर्व अपनी भावनाओं को इन शब्दों में व्यक्त किया है। विवाह के ये मंत्र पति-पत्नी के जटिल रिश्तों की भावपूर्ण व्याख्या प्रदान करते हैं।
सवाल यह उठता है कि उनकी यह दुर्दशा कैसे हुई? इतनी सक्षम थीं, तो फिर उनकी यह दुर्दशा कैसे हुई? प्राचीन भारतीय इतिहास के ग्रंथों में इस पहली का उत्तर छिपा है। वैदिक युग में महिलाएं पुरुषों के बराबर थीं। यह वह समय था, जब आर्यसभ्यता आकार ले रही थी। गांव बस चुके थे। हमारे पूर्वज कृषि से आगे बढ़कर कारोबार की ओर आकर्षित हो रहे थे। व्यापार के लिए जरूरी था कि उसके केन्द्र बनें और इसके लिए आवश्यक थे नगर। इस नगरीकरण के साथ कुछ कुप्रथाएं जन्मीं। वैदिक काल के बाद आया महाकाव्य युग, नारी के लिए कुछ अपशकुन लाया। यह वह समय था, जब रामायण व महाभारत को रचा गया। इन दोनों अमर रचनाओं में तब के भारत का विस्तार से वर्णन मिलता है। ये काव्य बताते हैं, नगरों ने साम्राज्य बनाए और साम्राज्यों ने इंसान के भीतर इंसान को गुलाम बनाने की अभिलाषा को बदल दिया। रावण द्वारा किया गया जाने वाला जन-उत्पीडऩ व सीताहरण इसी मानसिकता के परिणाम थे। इसी क्रम में दुर्योधन द्वारा जुए के खेल में छल से पांडवों को दास बनाना और द्रोपदी के वहरण के लिए प्रयास करना, इसी मानसिकता कलुष की अभिव्यक्ति थी।