आपद धर्म
   Date01-Aug-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
ए क बार कुरु प्रदेश में ओलावृष्टि से कृषि धान्य नष्ट हो जाने पर भयंकर अकाल पड़ गया। वहीं एक गांव में सपत्नीक निवास करने वाले उषस्ति नामक विद्वान अन्नाभाव से पीडि़त हो भोजन खोजने घर से निकले। एक स्थान पर एक महावत उबले हुए उड़द खा रहा था। भूखे उषस्ति ने जब उससे उड़द मांगे, तो वह संकोच करते हुए बोला - 'ये तो जूठे हो गए हैं।Ó उषस्ति ने कहा - 'तुम दे दो, मैं खा लूंगा।Ó महावत उड़द देकर अपने ही जलपात्र में पानी भी देने लगा, तो उषस्ति ने कहा- 'नहीं, वह पानी झूठा हो गया है।Ó तब आश्चर्यचकित हो महावत ने पूछा- 'तो क्या उड़द झूठे नहीं थे?Ó उषस्ति ने उत्तर दिया- 'इन उड़दों के खाये बगैर तो मैं जीवित नहीं रहूंगा। पर पानी तो पर्याप्त मात्रा में सुलभ है। विपत्ति में नित्य नैमित्तिक आचार धर्म का उल्लंघन करके प्राण-रक्षा करना आपद धर्म है, पर संकट न होने पर मर्यादा से फिसलने की छूट लेना अनुचित है।Ó