महंगाई : भ्रांति और पीड़ा के भंवर में जीएसटी...
   Date31-Jul-2022

parmar shakti
ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
को रोना दुष्काल की आपदा वास्तव में अनेक लोगों के लिए अवसर ही बन गई... तभी तो कोरोना के पहले जिन वस्तुओं के दाम एक रुपए थे, वे आज सवा या डेढ़ गुना तक नहीं बढ़े हैं, बल्कि दो से ढाई गुना महंगे हुए हैं... ऐसे में महंगाई डायन का रौद्र रूप आज चौतरफा रूप से हर किसी को हैरान-परेशान कर रहा है... क्या गरीब-मजदूर एवं वंचित बल्कि व्यापारी, कारोबारी, नौकरीपेशा सबको महंगाई ने स्तब्ध कर रखा है... कोरोनाकाल के पूर्व रसोई गैस के दाम 600 थे... आज 1100 रु. हैं... पेट्रोल-डीजल 80-70 थे, आज 108-94 रु. हैं... माचिस 50 पैसे की थी और आज 1 रु. की है..? फिर निर्माण क्षेत्र की बात करें या औद्योगिक उत्पादन की अथवा रेहड़ी-फेरी, खोमचे वालों की... सबको महंगाई डायन का संत्रास दहाड़ मारकर रोने के लिए विवश कर रहा है... ऐसी संकटपूर्ण स्थिति में जब कोई विषय रोजमर्रा की वस्तुओं जिसका संबंध प्रत्येक जीवन से जुड़ा है, फिर चाहे वह गरीब हो या अमीर सभी के लिए मायने रखता है... सरकार के किसी निर्णय के संबंध में महंगाई की मार हमें सिर्फ एक उत्पाद पर नजर आती है... लेकिन उसका असर सामान्य वर्ग के चौके-चूल्हे से लेकर रेस्टोरेंट, होटल, सामान्य भोजनालय, टिफिन सेंटर या नि:शुल्क भोजनशाला से लेकर फाइव स्टार होटल तक में महसूस किया जाता है...
18 जुलाई 2022 से दैनिक जीवन की अति आवश्यक खाद्य वस्तुओं एवं अन्य अति उपयोगी सामग्री पर जीएसटी की दरें स्वाभाविक रूप से हर किसी को बेचैन कर रही हैं... क्योंकि पीड़ादायक इस महंगाई के दौर में जब भ्रांतियों के साथ जीएसटी का जुलाब दिया जा चुका है, तो उसके कहीं न कहीं दुष्प्रभाव भी सामने आने लगे हैं और भविष्य में यह किस तरह से बद से बदतर हो सकते हैं..? इसका संकेत भी इन्हीं में छुपा है... क्योंकि सरकार का लक्ष्य समग्र रूप से राष्ट्र की आर्थिक सेहत को मजबूत रखना है... लेकिन उसकी आड़ में जो खेल सरकार से इतर मुनाफाखोर खिलाडिय़ों द्वारा खेला जाता है, लूटमार करने की अराजकता फैलाई जाती है, लोगों से भांति-भांति की भ्रांतियों द्वारा बेतहाशा मूल्य वसूला जाता है, यह कहकर कि कौन से युग में जी रहे हो..? जीएसटी लागू हो गया है... अब वह बेचारा सामान्य वर्ग कहां-कहां जीएसटी की सूची लिए घूमेगा..? ऐसी ही भ्रांतियां उपभोक्ताओं को लूटने का जरिया बन जाती है...
भारतीय अर्थव्यवस्था और उसके नीति-नियंताओं की आज सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा यही है कि वे किस तरह से राजस्व के द्वारा देश के खजाने को भरकर रखें... तो दूसरी तरफ उस गरीब की थाली की भी चिंता करना है, जो जरूरी वस्तुओं की महंगाई के कारण उससे दूर हो रही है..? मुद्रा के मूल्य में गिरावट का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर होता है, जनता असहनीय महंगाई से जूझ रही है, क्योंकि 2014 से अब तक रुपया करीब 25 फीसदी गिरा है... इससे आयात ही महंगा नहीं हुआ, बल्कि विदेशी मुद्रा कोष भी प्रभावित हुआ है... ऐसे में रिजर्व बैंक आखिर कब तक ब्याज दरें नीचे रखकर महंगाई से राहत देने की जुगत भिड़ाएगा... क्योंकि महंगाई तो लगातार फुफकार रही है...
महंगाई से कौन पीडि़त नहीं है..? ऐसा एक भी सख्श ढूंढ़े नहीं मिलेगा, तो दूसरी तरफ भ्रांतियों का भंवर ऐसा ही है, जिसमें किसी के पुण्य भी पनौती नजर आने लगते हैं... मोदी सरकार इसकी भुक्तभोगी है... केन्द्र सरकार ने 'एक देश-एक करÓ व्यवस्था के अंतर्गत जीएसटी लागू किया था... इसके जरिये पारदर्शी तरीके से और समय पर 'कर संग्रहणÓ के ऐतिहासिक रिकॉर्ड भी बने हैं... तभी तो शुरुआत में जीएसटी को लेकर जिस तरह की भ्रांतियां निर्मित की गईं, उन्हीं का नतीजा था कि सरकार के सामने जो कमियां-खामियां जीएसटी में समय-समय पर सामने आईं उन्हें दुरुस्त करते हुए कर की दरों में लगातार बदलाव किया गया... अब पेट्रोल-डीजल-रसोई गैस ही जीएसटी से मुक्त हैं..! बाकी तो जन्म से लेकर शवदाहगृह से जुड़ी व्यवस्था भी जीएसटी का हिस्सा है... जीएसटी के कारण महंगाई बढ़ेगी, ऐसा ताजा भ्रम और भ्रांतियां अनेक लोगों को जबरिया लूटने-लुटाने का कारण भी बन गई हैं... क्योंकि सरकार ने डिब्बा या पैकेट बंद और लेबल युक्त दूध उत्पाद जैसे दही, पनीर, लस्सी, मक्खन, छाछ और शहद, सूखा मखाना-सोयाबीन, मटर, दाल-चावल, गेहूं-आटा, अन्य अनाज से लेकर मुरमुरे तक पर 5 प्रतिशत तक जीएसटी लगाया है... आटा-दूध से बने उत्पादों पर यह 5 प्रतिशत जीएसटी महंगाई को 10 प्रतिशत तड़का लगाएगा... ऐसा ग्राहक-उपभोक्ता दोनों का मानस निर्धारित कर चुका है... यही तो भ्रम है... ऐसे भ्रम-भ्रांतिया भी इस महंगाई की कोढ़ में पीड़ादायक खाज का ही काम करने वाली है... यह भी ध्यान रखना होगा कि तमाम राज्य जीएसटी के पहले की व्यवस्था के अंतर्गत खाद्यान्नों से राजस्व एकत्रित करते रहे हैं... जिसको वैट के द्वारा वसूला जाता था, अब गैर ब्रांडेड लेकिन पैकेज्ड सामग्री पर जीएसटी लगाना तय हुआ है... लेकिन जितना ज्यादा (मात्रात्मक रूप से) बड़ा उत्पाद होगा, उतनी ज्यादा छूट, ऐसे में जो गरीब वर्ग छोटे पैकेट उत्पाद ही खरीदते हैं, उन्हें खुल्ला नहीं मिलता और वे इस व्यवस्था के दुष्चक्र में फंसते चले जाते हैं... फिर उन व्यवसायियों, कारोबारियों का क्या बिगड़ेगा, जो खुले उत्पाद के बजाय ज्यादा माल ऐंठने के लिए पैकेट को ही प्राथमिकता दें..? सामान्य चर्चा में कुछ लोग राष्ट्रीय सरोकार से जोड़कर भी देख रहे हैं... जीएसटी का विरोध न करके राष्ट्रहित में खड़े होने की भी समझाइश दे रहे हैं... वे अपनी जगह सही हैं, क्योंकि प्रत्येक नागरिक का राष्ट्रीय कर्तव्यधर्म भी है, लेकिन एक परिवार जीएसटी के कारण प्रति माह रोजमर्रा की वस्तुओं पर 250 से 300 रुपए अतिरिक्त देगा... इतना बोझ सहनीय है, लेकिन सवाल यह भी है कि भ्रांतियों के जरिये उसी परिवार को छोटी-छोटी खरीदी पर 250-300 ही नहीं प्रति माह हजार रुपए का फटका भी लगेगा, क्योंकि निगरानी तंत्र जो नहीं है... कोरोना के बाद जिस तरह से मूल्यवृद्धि बढ़ी, उस अनुपात में व्यक्ति की आय या आजीविका का आर्थिक संबल मजबूत नहीं हुआ है... फिर पेंसिल, चाकू, शार्पनर, इंक, प्रिंटिंग, एलईडी, लैंप, ड्राइंग, मानचित्र व अन्य स्टेशनरी उत्पाद पर भी 18 फीसदी जीएसटी जीवन को प्रभावित तो करेगा ही... टेट्रापैक और बैंक की तरफ से चेक जारी करने पर 18 प्रतिशत जीएसटी देना होगा... सौर वॉटर हीटर पर अब 5 के बजाय 12 फीसदी जीएसटी... सड़क, पुल, रेलवे, मेट्रो, रिहायशी मकान कारोबारी इकाइयों को किराये पर देना भी जीएसटी के दायरे में है... इसकी भरपाई कहां से होगी..? क्योंकि महंगाई ने 76 फीसदी शहरवासियों के आर्थिक हालात तंग कर दिए हैं... शहरी उपभोक्ता भविष्य की योजनाओं को टालने का मानस बना रहा है... फिर इसका समग्र रूप से आकलन करें तो महंगाई के कारण भ्रांति और पीड़ा के भंवर में जीएसटी उलझता नजर आता है..!
सवाल, क्या जीएसटी का लाभ उद्योगों को ही मिला है, उपभोक्ताओं को नहीं..? क्योंकि पहले उद्योग एक्साइज ड्यूटी, वैट, लक्जरी टैक्स, सेल टैक्स जैसे तमाम तरह के कर चुकाते थे, लेकिन अब एकमुश्त में उन्हें कुछ तो राहत है... लेकिन किसानों को उस तुलना में कोई राहत नहीं है... 6 फीसदी किसान ही न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ ले पाते हैं... 94 फीसदी आज भी बाजार के हवाले हैं... 23 फसलों के समर्थन मूल्य सरकार ने घोषित कर रखे हैं, लेकिन वह कागजों पर ही दिखते हैं... अब कृषि उपकरण निश्चित रूप से और महंगे होंगे, क्योंकि फलों के पैकिंग उपयोगी प्लास्टिक डिब्बे जीएसटी के कारण महंगे हुए हैं... दूध के उत्पादों पर जीएसटी का असर डेयरी उद्योग को संकट में डालने का कारण बन सकता है... पहले ये मानसिकता थी कि एक वेतनभोगी तबका ही कर देता है, लेकिन आज एक मजदूर चड्डी से लेकर चप्पल तक पर 5 से 12 प्रतिशत चुकाता है, यानी वह भी कहीं न कहीं राष्ट्रीय राजस्व में करदाता की भूमिका में है... इन सबकी महंगाई से जुड़ी पीड़ाओं पर भी मरहम जरूरी है सरकार...