ईडी के अधिकारों पर मुहर...
   Date30-Jul-2022

vishesh lekh
एक तरफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) सोनिया गांधी से नेशनल हेराल्ड मामले में कथित अनियमितता एवं मनी लॉड्रिंग को लेकर लंबी पूछताछ कर चुकी है... इस दौरान ईडी की कार्रवाई पर तमाम तरह के सवाल उठाकर कांग्रेसियों ने पूरे मामले को सरकार प्रायोजित एजेंडा बताकर ईडी को ही सवालों के घेरे में खड़ा करके उसे सरकार द्वारा हथियार के रूप में उपयोग करने पर आरोप लगा दिया... तो दूसरी तरफ ईडी पश्चिम बंगाल में करोड़ों रुपए के घोटाले में आधे अरब से अधिक की नकदी संपत्ति तृणमूल के मंत्री रहे पार्थ चटर्जी एवं उनकी सहयोगी अर्पिता मुखर्जी के आवासों से जब्त कर चुकी है... ऐसे में सवाल यह है कि अगर ईडी की कार्रवाई सही है और नकदी निकल रही है या कहें कि मकान 2000 और 500 के नोट उगल रहा है, तो क्या यहां पर भी ईडी को दोषी माना जाएगा..? ये सारे सवाल इसलिए मौजू हो गए हैं कि जब कांग्रेस ईडी का सामना कर रही थी तो दूसरी तरफ ईडी के अधिकारों अर्थात् धन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत ईडी को मिले अधिकारों पर सवाल खड़े करके उन्हें न्यायालय में चुनौती दे रही थी, लेकिन यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का संयोग ही है अथवा कांग्रेस-कांग्रेसियों के लिए दुर्योग की जब ईडी कार्यालय में सोनिया गांधी सवालों के जाल में उलझी थी, उसी समय देश की सर्वोच्च न्याय व्यवस्था अर्थात् सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पीएमएलए कानून के तहत ईडी को मिले प्रावधानों और अधिकारों को बरकरार रखते हुए उन्हें सही ठहराया था... यानी एक तरह से कांग्रेस पहली लड़ाई तो कोर्ट में ही हार गई, जब वह ईडी की कार्रवाई को सरकार प्रायोजित बताकर नेशनल हेराल्ड मामले का राजनीतिकरण करने में विफल रही, तो दूसरी तरफ सोनिया का ईडी को टालमटोल जवाब भी उनके गले की हड्डी बन गया, क्योंकि उन्हें ईडी कार्यालय आना ही पड़ा... ईडी के अधिकारों का संरक्षण इसलिए जरूरी है कि किसी भी राज्य में भारी अनियमितता, भ्रष्टाचार व अन्य पेशेवर गड़बडिय़ों की छानबीन के लिए ईडी ही समर्थ है... फिलहाल 5422 मामले पीएमएलए के तहत दर्ज हुए हैं... 25 से अधिक लोगों को दोषी ठहराया जा चुका है... 992 मामलों में चार्जशीट दायर हो चुकी है... जिसमें करीब 869.31 करोड़ रुपए जब्त हुए हैं... अगर इसे यूं देखें कि ईडी ने अब तक 1,04,702 करोड़ रुपए की संपत्ति अटैच की है तो यह इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि गड़बड़ मामलों और आर्थिक अनियमितता को नियंत्रित करने के लिए ईडी का कार्रवाई दायरा बढऩा चाहिए और रफ्तार सुरक्षित रहना चाहिए... क्योंकि 2004 से 2014 के बीच ईडी ने 112 छापेमारी की... जबकि 2014 से 2022 के बीच यह 3010 छापेमारी की जा चुकी है... इसलिए सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी बहुत मायने रखती है कि गंभीर अपराध से निपटने के लिए बड़े कदम जरूरी है... धनशोधन से आतंकवाद को बढ़ावा मिलता है, यह आतंक से कम जघन्य अपराध नहीं... ऐसे मामलों में सख्ती अपनाना बहुत जरूरी है...
दृष्टिकोण
पंचयतों के नतीजे और दावे...
मध्यप्रदेश में पंचायत, नगरीय निकाय, जनपद अध्यक्ष के परिणामों के बाद अब शुक्रवार को जिला जनपद पंचायत अध्यक्ष के परिणाम भी घोषित हो चुके हैं... 52 में से करीब 30 से अधिक जिलों में भाजपा ने अपने अध्यक्ष बनवाने में सफलता प्राप्त की है... जबकि कांग्रेस को 14 और निर्दलीय और अन्य को शेष सीटों पर बढ़त मिली है... नगर सरकार के इन नतीजों को लेकर दलों, नेताओं के अपने-अपने दावे है, क्योंकि बुधवार, गुरुवार को 312 जनपद पंचायत अध्यक्ष के नतीजों में भाजपा ने 226 पर विजयश्री का दावा किया था, लेकिन कांग्रेस भी 100 से अधिक समर्थकों के जीतने का दंभ भर रही है... कुछ इसी तरह की स्थिति जनपद सदस्यों व जिला जनपद पंचायत सदस्यों को लेकर भी रही है... फिर पंचायत में किस दल के कितने समर्थक जीते, इसको लेकर भी असमंजस की स्थिति रही है... क्योंकि शुक्रवार को जो नतीजे जिला जनपद पंचायत अध्यक्ष के आए है, उसमें ऐसे दर्जनभर मामले हैं, जिनमें दोनों ही दल के आया राम, गया राम ने परिणामों को बदला है... अब ये कितने दिनों तक स्थिर रहते हैं, इसी पर निर्भर करेगा कि 2023 के विधानसभा चुनाव के मान से दलों की स्थिति क्या है..? क्योंकि सदस्यों को साधकर निर्दलीय का समर्थन करवाना या निर्दलीय को अपनी पार्टी में शामिल करके उसे अध्यक्ष बनवाकर उसे अपनी पार्टी की जीत बताना फिलहाल तात्कालिक रूप से सुखद स्थिति जरूर बन सकती है, लेकिन इसका कार्यकर्ताओं में क्या संदेश जाएगा और वे इसे किस तरह से देखेंगे, इस पर फिलहाल कुछ कहना जल जल्दबाजी होगी...