मौत का कुआं बनी शराब...
   Date28-Jul-2022

vishesh lekh
किसी भी राज्य सरकार के लिए राजस्व का सबसे बड़ा जरिया है देशी-विदेशी शराब की वह अंधाधुंध खपत है..,जो गांव से शहर तक और गली-मोहल्लों में किराने की दुकान की भांति खुली दुकानों, अहातों और उन बियरबारों पर जहां सुबह से ही भीड़ उमड़ पड़ती है और सुबह होने तक इन स्थानों पर जिंदगियां बर्बाद करने वाला शराब का खेल खुलमखुल्ला चलता रहता है...प्रत्येक सरकार व शासनकर्ता हर बार यह दोहराते है कि अब कोई नई दुकानें, अहातें या ठेके शराब के नहीं खुलेंगे या उनकी संख्या नहीं बढ़ेगी..,लेकिन उस वादे को भुलाकर जिंदगियां बर्बाद करने की यह दुकानदारी और नए नियमों-कानूनों वा साजोसामान के साथ जनता के सामने बढ़ा दी जाती है...आखिर लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ करने वाले इस मदिरापान से कोई राजस्व प्राप्त करने वाला राज्य या शासनकर्ता आखिर बेहतर भविष्य की उम्मीद कैसे रख सकता है..? यह तो बात हुई उन सरकार निर्धारित अधिकृत ठेकों-अहातों की..,लेकिन नकली शराब, जहरीली शराब का यह अंधा कुआं किस तरह से जिंदगियां लील रहा है...इसका ताजा उदाहरण है गुजरात के अहमदाबाद में 5 दर्जन से अधिक लोगों की जिंदगियां उस 40 रुपए की उस पोटली ने लील ली..,जो एक फैक्ट्री से लिए गए केमिकल द्वारा बनाई गई थी...इस मामले में पुलिस ने अपने स्तर पर दर्जनभर लोग गिरफ्तार किए है...इसके पहले बिहार में भी नकली व जहरीली शराब के कारण सैकड़ों मौतें हो चुकी है...इसी पोटली वाले जहर ने म.प्र. के उज्जैन में भी कोहराम मचाया था...लेकिन हर बार इस तरह के घटनाक्रमों को हादसा करार देते हुए जांच में लीपापोती करके मामला आया-गया कर दिया जाता है...सवाल व्यवस्था का है आखिर 1960 में गुजरात में शराब बंदी लागू की गई थी...उस शराबबंदी का क्या यह दुष्परिणाम है कि गुजरात में शराब का गोरखधंधा पूरे देश में सबसे ऊपर होता है..,फिर नकली व जहरीली शराब का भी यहां से सबसे बड़ा राष्ट्रीय रैकेट चलता है...अवैध और नकली शराब का कारोबार गुजरात में कुछ विशेष वर्ग के लोगों की छत्रछाया में चलता है..,लेकिन आज तक इस मामले में कोई भी सरकार या समाज के प्रमुख लोग जिम्मेदारी लेकर इसके खिलाफ सड़कों पर नहीं उतरे..? आखिर गुजरात में शराब बंदी के बावजूद इस तरह का मौतों का तांडव कब तक चलता रहेगा..? क्योंकि अभी भी इस जहर के अंधे कुएं में गिरे 150 से अधिक लोग जिंदगी की जंग लड़ रहे है...बोपद के तो 9 से अधिक गांव में मातम पसरा है...आखिर अहमदाबाद में पान की दुकान, किराने की दुकान और नाई की दुकान पर भी इसी तरह से शराब परोसी जाती है...फिर शराब बंदी का यह पूछल्ला किसके लिए और क्यों है..? बिहार में शराब बंदी करके आखिर क्या हासिल किया..? मध्यप्रदेश में भी शराब बंदी की बात चलती है..,लेकिन नकली शराब से यहां पर जिंदगियां दांव पर लगी है...आखिर अधिकृत-अनाधिकृत शराब के इस गोरखधंधे से राजस्व का मोह कब भंग होगा..?
दृष्टिकोण
मुफ्तखोरी पर सख्ती सही...
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को सबसे बड़ा अधिकार या हथियार दिया गया है कि वह मतदान के जरिये अपने जनप्रतिनिधि के रूप में एक ऐसे जनसेवक का चयन करेगा जो समाज के सरोकार एवं राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखकर अपने दायित्व का निर्वाह कर सके...लेकिन हमारा लोकतंत्र जितना उम्रदराज हुआ उतने ही उसमें राजनीतिक चयन की खामियां घर करती चली गई...अगर आज देश का सर्वोच्च न्याय मंदिर चुनाव के दौरान मुफ्त की योजनाओं पर नाराजगी जताते हुए सख्ती दिखाते हुए यह निर्देश देता है कि केंद्र सरकार इसके लिए जल्द से जल्द रास्ता निकालकर समस्या का समाधान करे तो विचार इस बात पर होना चाहिए कि यह स्थिति लगातार विकट होती नजर आ रही है..,क्योंकि अब मतदाताओं का मानस भी इस दिशा में तेजी से आकर्षित हो रहा है...कैसे भी कोई दल या नेता अगर हमारे मतों का मूल्यांकन करके हमें कुछ राहतें, रियायतें या फिर मुफ्तखोरी के कुछ विकल्प देने की पहल करता है तो इसका हमें पूरे 5 साल लाभ मिलेगा...यही मानसिकता जनप्रधिनियों को चुनाव जीतने के बाद अकर्मण्य बनाती है..,बल्कि सरकार को भी लापरवाहीपूर्ण होकर मुफ्तखोरी की योजनाएं चलाने के लिए प्रेरित करते हुए भ्रष्टाचार व अनियमितता को भी बढ़ावा देने का कारण बन जाती है...क्योंकि मुफ्तखोरी के क्या दुष्परिणाम हो सकते है यह हमने पड़ोसी देशों में देखा है...नेपाल से लेकर श्रीलंका तक आर्थिक हालात गर्त में है...इसके सबक लेकर हमें तुरंत मुफ्तखोरी पर रोक की पहल करना चाहिए...