वैज्ञानिक कार्य संस्कृति को बढ़ावा देने की जरूरत
   Date28-Jul-2022

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प्रमोद भार्गव
हा ल ही में नीति आयोग की अनुसंधान और विकास (आरएंडडी) से जुड़ी ताजा रिपोर्ट आई है। इस रिपोर्ट में 2008-09 से 2017-18 तक के वित्तीय वर्षों में अनुसंधान और विकास पर भारत सरकार द्वारा किए खर्च का लेखा-जोखा है। 2008-09 में भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का जहां 0.8 प्रतिशत खर्च करता था, वहीं यह खर्च 2017-18 में घटकर 0.7 प्रतिशत रह गया। इस रिपोर्ट में 2018-19, 2019-2020, 2020-2021 एवं 2021-2022 के वित्तीय वर्षों की जानकारी नहीं है। तय है, इन सालों में भी खर्च बढ़ाया नहीं गया होगा? इस नाते भारत अनुसंधान के पैमाने पर चीन और अमेरिका से तो पीछे है ही, दक्षिण अफ्रीका से भी पिछड़ा है, दक्षिण अफ्रीका में जीडीपी दर 0.8 प्रतिशत हैं, जो भारत से अधिक है। आरएंडडी पर विश्व का औसत खर्च 1.8 प्रतिशत है, अतएव हम औसत खर्च का आधा भी खर्च नहीं करते हैं। नतीजतन हम नए अनुसंधान, आविष्कार और स्वदेशी उत्पाद में पिछड़े हैं। इसीलिए पेटेंट के क्षेत्र में भारत विकसित देशों की बराबरी करने में पिछड़ गया है। यदि यही सिलसिला जारी रहा तो वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत कैसे टिक पाएगा, यह विचारणीय बिंदु है।
हालांकि नवाचारी वैज्ञानिकों को लुभाने की सरकार ने अनेक कोशिशें की हैं। बावजूद देश के लगभग सभी शीर्ष संस्थानों में वैज्ञानिकों की कमी है। वर्तमान में देश के 70 प्रमुख शोध-संस्थानों में 3200 वैज्ञानिकों के पद खाली हैं। बैंगलुरु के वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (सीएसआईआर) से जुड़े संस्थानों में सबसे ज्यादा 177 पद रिक्त हैं। पुणे की राष्ट्रीय रसायन प्रयोगशाला में 123 वैज्ञानिकों के पद खाली हैं। देश के इन संस्थानों में यह स्थिति तब है, जब सरकार ने पदों को भरने के लिए कई आकर्षक योजनाएं शुरू की हुई हैं। इनमें रामानुजम शोधवृत्ति, सेतु-योजना, प्रेरणा-योजना और विद्यार्थी-वैज्ञानिक संपर्क योजना शामिल हैं। महिलाओं के लिए भी अलग से योजनाएं लाई गई हैं। इनमें शोध के लिए सुविधाओं का भी प्रावधान है। इसके साथ ही परदेश में कार्यरत वैज्ञानिकों को स्वदेश लौटने पर आकर्षक पैकेज देने के प्रस्ताव दिए जा रहे हैं। बावजूद न तो छात्रों में वैज्ञानिक बनने की रूचि पैदा हो रही है और न ही परदेश से वैज्ञानिक लौट रहे हैं। इसकी पृष्ठभूमि में एक तो वैज्ञानिकों को यह भरोसा पैदा नहीं हो रहा है कि जो प्रस्ताव दिए जा रहे हैं वे निरंतर बने रहेंगे? दूसरे नौकरशाही द्वारा कार्यप्रणाली में अड़ंगों की प्रवृत्ति भी भरोसा पैदा करने में बाधा बन रही है।
मौजूदा परिदृश्य में कोई भी देशज सक्षमता हासिल वैज्ञानिक उपलब्धियों से ही कर सकता है। मानव जीवन को यही उपलब्धियां सुखद और समृद्ध बनाए रखने का काम करती हैं। भारत में युवा उत्साहियों या शिक्षित बेरोजगारों की भरमार हैं, बावजूद वैज्ञानिक बनने या मौलिक शोध में रूचि लेने वाले युवाओं की संख्या कम है। इसकी प्रमुख वजहों में एक तो वैज्ञानिकों को हम खिलाड़ी, अभिनेता, नौकरशाह और राजनेताओं की तरह रोल मॉडल नहीं बना पा रहे हैं। सरकार विज्ञान से ज्यादा महत्व खेल को देती है। दूसरे उस सूचना तकनीक को विज्ञान मान लिया गया है, जो वास्तव में विज्ञान नहीं है, बावजूद इसके विस्तार में प्रतिभाओं को खपाया जा रहा है। वैज्ञानिक प्रतिभाओं को तवज्जो नहीं मिलना भी प्रतिभाओं के पलायन का एक बड़ा कारण है। जाहिर है, हमें ऐसा माहौल रचने की जरूरत है, जो मौलिक अनुसंधान व शोध-संस्कृति का पर्याय बने। इसके लिए हमें उन लोगों को भी महत्व देना होगा, जो अपने देशज ज्ञान के बूते आविष्कार में तो लगे हैं, लेकिन अकादमिक ज्ञान नहीं होने के कारण, उनके आविष्कारों को वैज्ञानिक मान्यता नहीं मिल पाती है। इस नाते कर्नाटक के किसान गणपति भट्ट ने पेड़ पर चढऩे वाली मोटरसायकल बनाकर एक अद्वितीय उदाहरण पेश किया है। लेकिन इस आविष्कार को न तो विज्ञान सम्मत माना गया और न ही गणपति भट्ट को अशिक्षित होने के कारण केंद्र या राज्य सरकार से सम्मानित किया। यह व्यवहार प्रतिभा का अनादर है।
हमारे नेता संसद में विज्ञान पर चर्चा तो कम करते हैं, लेकिन विज्ञान की उपलब्धियों के उद्घाटन और विज्ञान समारोहों में मुख्य अतिथि की भागीदारी करने से नहीं चूकते? हर वर्ष जनवरी के पहले सप्ताह में भारतीय वैज्ञानिकों और विज्ञान को प्रोत्साहित करने व उनकी वार्षिक उपलब्धियां सामने लाने की दृष्टि से बड़ा जलसा दिल्ली के विज्ञान भवन में होता है। इस गरिमापूर्ण कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हमेशा प्रधानमंत्री रहते हैं। दुनिया में भारत के अलावा कोई भी देश ऐसा नहीं है, जहां विज्ञान संबंधी कार्यक्रमों का उद्घाटन राजनेता करते हों ? ऐसे समारोहों में वैज्ञानिक से ज्यादा राजनीतिज्ञों को महत्व देने से श्रेष्ठ वैज्ञानिकों का आत्म-सम्मान आहत होता है। ऐसा वैज्ञानिक कार्य-संस्कृति पर नौकरशाही का दबदबा होने के कारण संभव हो रहा है। दरअसल हमारे यहां विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सरकार का प्रभुत्व है, लिहाजा उसमें जोखिम उठाने की इच्छाशक्ति का अभाव है। जबकि वैज्ञानिक अनुसंधानों की बुनियाद कल्पनाशीलता और दूरदर्शिता पर टिकी होती है, जिसे बिना जोखिम उठाए अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सकता। हालांकि चंद्रयान की असफलता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसरो के वैज्ञानिकों का जिस अनौपचारिक ढंग से ढांढस बंधाया था, वह एक अपवाद है।
आज वैश्वीकरण के दौर में विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास बहुत महत्वपूर्ण हैं। लेकिन उदारवादी अर्थव्यवस्था का दूसरा दुखद पहलू है कि हमारे उच्च दर्जे के विज्ञान शिक्षा संस्थान प्रतिभाओं को आकर्षित ही नहीं कर पा रहे हैं। हमारी ज्यादातर प्रतिभाएं या तो विदेश पलायन कर जाती हैं अथवा इंजीनियरिंग के साथ एमबीए करके निजी बैंकों, बीमा कंपनियों अथवा अन्य प्रबंधन संस्थानों से जुड़ जाती हैं। यहां ये प्रतिभाएं जो बुनियादी शिक्षा हासिल की होती है, उसके विपरीत कार्य-संस्कृति में काम करने को विवश होते हैं। देशी-विदेशी तमाम सलाहकार सेवा संस्थान इंजीनियरों से बैंकिंग बही-खातों के संधारण काम करा रहे हैं। यही काम हमारे राष्ट्रीयकृत बैंकों में इंटर पास लिपिक करते हैं। क्या यह विरोधाभासी कार्य संस्कृति प्रतिभा के साथ छल नहीं है? क्या इंजीनियर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सोड़ा, साबुन, कोला, सिगरेट, टीवी, कंप्यूटर या दो पहिया अथवा चार पहिया वाहनों के लिए ग्राहक तलाशने के लिए हैं ? विज्ञान संस्थानों में जब प्रतिभाओं को अनुकूल काम करने का माहौल नहीं मिलता है, तो वे इतर उपभोक्ता संस्थानों में काम करने को मजबूर हो जाते हैं।
युवा विज्ञान से किनारा कर रहे हैं, तो वैज्ञानिक कार्य-संस्कृति में ही खोट होना तय है ? यही वजह है कि जो शोध हो रहे हैं, उनमें पूर्व में ही हो चुके कार्यों को अदल-बदलकर दोहराया जा रहा है। विश्व विद्यालय स्तर पर विज्ञान व कला विषयों पर कराए जा रहे शोधों में तो दोहराव की प्रवृत्ति ने स्थायी भाव ही धारण कर लिया है। यह प्रवृत्ति चिंताजनक है। यह प्रवृत्ति तब से और ज्यादा पनपी है, जब राजनेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ ने कालाबाजारी करने वाली चिटफंड कंपनियों और भू व शराब माफियाओं तक को डीम्ड विश्वविद्यालय और महाविद्यालय खोलने की सौगातें दे दीं। उच्च शिक्षा को चौपट करने का यह बड़ा कारण बना। इसीलिए दुनिया के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों की रैकिंग में भारत अक्सर पिछड़ता रहा है।
यहां गौरतलब है कि 1930 में जब देश में फिरंगी हुकूमत थी, तब देश में वैज्ञानिक शोध का बुनियादी ढांचा न के बराबर था। विचारों को रचनात्मकता देने वाला साहित्य भी अपर्याप्त था। अंगे्रजी शिक्षा शुरुआती में दौर में थी। बावजूद जगदीशचंद्र बसु ने भौतिकी और जीव-विज्ञान में वैश्विक मान्यता दिलाने वाले आविष्कार किए। सीवी रमन ने साधारण देशी उपकरणों के सहारे देशज ज्ञान और भाषा को आधार बनाकर काम किया और भौतिक विज्ञान में नोबेल दिलाया। सत्येंद्रनाथ बसु ने आइंस्टीन के साथ काम किया। मेघनाथ साहा, रामानुजम, पीसी रे और होमी जहांगीर भाभा ने अनेक उपलब्धियां पाईं। रामानुजम के एक-एक सवाल पर पी-एचडी की उपाधि मिल रही हैं। एपीजे कलाम और के. शिवम जैसे वैज्ञानिक भी मातृभाषा में आरंभिक शिक्षा लेकर महान वैज्ञानिक बने हैं। लेकिन अब उच्च शिक्षा में तमाम गुणवत्तापूर्ण सुधार होने और अनेक प्रयोगशालाओं के खुल जाने के बावजूद गंभीर अनुशीलन का काम थमा है। उपलब्धियों को दोहराना मुमकिन नहीं हो रहा। (लेखक वरिष्ठ साहित्यकार
और पत्रकार हैं।)
दरअसल बीते 75 सालों में हमारी षिक्षा प्रणाली ऐसी अवधारणाओं का षिकार हो गई है, जिसमें समझने-बुझने के तर्क को नकारा जाकर रटने की पद्धति विकसित हुई है। दूसरे संपूर्ण षिक्षा को विचार व ज्ञानोन्मुखी बनाने की बजाय, नौकरी अथवा कैरियर उन्मुखी बना दयिा गया है। मसलन सरकार जो भी धन खर्च रही है, वह वैज्ञानिक बनाने पर खर्च ही नहीं हो रहा ? षैक्षिक उपलब्धियों को व्यक्ति केंद्रित बना दिया गया, जो संकीर्ण सोच और निजी विषेशज्ञता को बढ़ावा देती हैं। नए आविश्कार या अनुसंधानों की षुरुआत अकसर समस्या के समाधान से होती है, जिसमें उपलब्ध संसाधनों को परिकल्पना के अनुरुप ढालकर क्रियात्मक अथवा रचनात्मक रुप दिया जाता है। यही वैचारिक स्त्रोत आविश्कार के आधार बनते हैं। किंतु हमारी षिक्षा पद्धति से इन कल्पनाषील वैचारिक स्त्रोतों को तराषने का अध्यापकीय कौषल कमोबेष नदारद है, लिहाजा कल्पनाषीलता कुंठित हो रही है। अंग्रेजी का दबाव भी नैसर्गिक प्रतिभाओं को कुंठित कर रहा है। हमारे राजनेताओं में इस जड़ता को तोडऩे की इच्छाषक्ति का अभाव है। जिन रूस, चीन और जापान से हम वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में पिछड़ रहे हैं, उनसे हमें सबक लेने की जरुरत है कि उनकी विज्ञान व तकनीकी षिक्षाओं के माध्यम अपनी मातृभाशाएं हैं। अतएव देष में जब तक वैज्ञानिक कार्य संस्कृति के अनुरुप माहौल नहीं बनेगा, तब तक दूसरे देषों से प्रतिस्पर्धा में अकेले धन के बूते आगे निकलना मुष्किल होगा ?
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।