महादेव की उपासना का विशेष काल श्रावण मास
   Date28-Jul-2022

dharmdhara
धर्मधारा
भ गवान भोलेनाथ को देवाधिदेव कहा गया है। उनकी शरण में जाने वालों की सभी प्रकार की कामनाएं सहज और स्वत: पूर्ण होती चली जाती हैं। एक बार शिव की कृपा प्राप्त कर लेने के बाद भक्त की सारी शंकाएं और आशंकाएं अपने आप दूर हो जाती हैं और जीवन में विलक्षण आनंद की अनुभूतियों के द्वार खुल जाते हैं।
शिव की उपासना से लौकिक एवं पारलौकिक सिद्धियां सहज ही प्राप्त की जा सकती हैं। शिव की उपासना के लिए असंख्य मंत्र, स्तोत्र, पाठ इत्यादि हैं लेकिन इन सभी में रूद्रपाठ को ऋ षि-मुनियों ने विशेष महत्व प्रदान किया है। शास्त्रों में रूद्रपाठ को कल्पवृक्ष कहा गया है। इसका अवलम्बन करने से अमृत तत्व की प्राप्ति होती है। जबकि दुर्गा पाठ को कामदुधा कहा गया है जिसे शांतिपूर्वक अर्थानुसंधान पूर्ण श्रद्धा से पाठ किया जाए तो मनुष्य की तमाम कामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।
रूद्राष्टाध्यायी में आठ रूद्रों का समावेश माना गया है। रूद्राष्टाध्यायी में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश तथा मन, बुद्धि एवं अहंकार के रूप में व्याप्त रूद्र के रूप में प्रार्थना की गई है। शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ में कांड 6 तथा शिव महिम्नस्तोत्र में आठ रूद्रों का वर्णन है-भव, शर्व, रूद्र, पशुपति, उग्र, महादेव, भीम एवं ईशान। ये पांच तत्व तथा मन, बुद्धि एवं अहंकार के प्रतीक रूप में माने जाते हैं।
रूद्राष्टाध्यायी के सभी अध्यायों में समाहित वैज्ञानिक रहस्यों को देखें तो इसके प्रथम अध्याय में मन को स्थिर करने, शिव संकल्पमय बनाने का सूत्र छिपा है। दूसरे अध्याय में सहस्रशीर्षा से हजार शिर, हजार आंखें, हजार पांव आदि कहकर विराट रूप में बसने वाले भगवान रूद्र की सर्वव्यापकता बताई गई है। तीसरे अध्याय में वायु तथा ओज की प्रार्थना की गई है।
रूद्राष्टाध्यायी के पंचम अध्याय में संसार के तमाम पदार्थों में रूद्र की भावना की गई है। छठे अध्याय में समस्त प्रकार की कामनाओं व आयुष्य की वृद्धि करने वाले तथा सप्तम अध्याय में सभी प्रकार की सुख प्राप्ति के लिए प्रार्थना की गई है। अष्टम अध्याय में शान्ति प्राप्ति एवं पृथिवी तत्व, जलतत्व द्वारा हमें सुख एवं सौ वर्ष बोलने की वाणी, सौ वर्ष देखने की शक्ति तथा सौ वर्ष दीनता रहित होने के साथ ही सौ वर्ष आयुष्यकामना की प्रार्थना भगवान रूद्र से की गई है।
शिव महिम्न स्तोत्र के श्लोक श्मशानेश्वाक्रीड़ा... से स्पष्ट है कि शिव को श्मशान प्रिय है। इसका आशय यह है कि हमारे हृदय व मन को हम निष्काम भाव और शुचिता से इतना परिपूर्ण कर लें और मन को शिव में स्थिर कर दें कि यह श्मशान की तरह खाली हो जाए, तभी भगवान शिव अपने हृदय में विराजित हो सकते हैं। मन में शिव का वास हो जाने पर अनेक मंगलकामनाएं अपने आप पूर्ण होने लगती हैं और शिवत्व का सहज तथा स्वत: आभास होने लगता है।