मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु आलस्य
   Date27-Jul-2022

dharmdhara
धर्मधारा
म नुष्य जीवन अनेक महती संभावनाओं से भरा हुआ है, लेकिन बहुत ही कम लोग इसको समुचित दृष्टि से साकार कर पाते हैं। अधिकांशत: प्रतिभा एवं योग्यता होने के बावजूद आधा-अधूरा जीवन जीने के लिए अभिशप्त होते हैं व जीवन, बिना किसी सार्थक आंतरिक-बाह्य उपलब्धि एवं निष्कर्ष के ऐसे ही बीत जाता है। इस त्रासदी का मुख्य कारण रहता है-आलस्य, जिसे मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु की संज्ञा दी गई है।
आलस्य जड़ता एवं बेहोशी का प्रतीक है, जो व्यक्ति को वर्तमान में नहीं जीने देता। इसके आगोश में व्यक्ति या तो बीती यादों की खुमारी में डूबा रहता है या भविष्य के कोरे स्वप्नों में खोया रहता है। वह कछ करना नहीं चाहता। बाहर से देखने पर वह निश्चित, निद्वंद्व दिख सकता है, लेकिन अंदर से वह इस अवस्था की स्थिरता, शांति एवं चेतनता से वंचित होता है। आलस्य में विघ्न एक आलसी को खलल जैसा प्रतीत होता है। अपनी इच्छा से वह आलस्य से बाहर नहीं निकलना चाहता। ऐसे में आलसी उस पुरुषार्थ से वंचित रह जाता है, जो जाग्रत संकल्प से उद्भुत होता है, जो चुनौतियों को अवसर में बदलने का साहस रखता है। जो विषम परिस्थितियों के बीच भी अपना लक्ष्य सिद्ध करना जानता है। आलसी में उस जागरूकता का अभाव रहता है, जो सामने आ रहे अवसरों को समझ सके। आगे बढऩे के मौके सामने आते रहते हैं, लेकिन आलसी मूकदर्शक बनकर इनका लाभ उठाने से चूक जाता है। - इस तरह आलस्य की जड़ता में व्यक्ति आंतरिक और बाहरी संभावनाओं को साकार नहीं कर पाता। आलस्य के कई कारण हो सकते हैं- (1) बहुत ज्यादा शारीरिक श्रम (2) मानसिक श्रम से उपजी हुई थकान (3) इंद्रिय असंयम (4) स्वभावगत आलस्य आदि। इनमें से पहले दो कारण तो परिस्थितिजन्य हैं, जिनसे हुए ऊर्जा-क्षय की उचित विश्राम, निंद्रा एवं आहार-विहार के साथ भरपाई हो जाती है, जिसके बाद फिर व्यक्ति आलस्य से उबर जाता है और अपने कार्य में सक्रिय हो जाता है। तीसरा कारण व्यक्ति की बिगड़ी आदतों से जुड़ा है, जिन्हें सुधारकर ही ठीक किया जा सकता है। सबसे अधिक घातक होता है स्वभावगत आलस्य, जिससे उबरना अत्यंत कठिन होता, लेकिन असंभव नहीं।