पाकिस्तान की बेबसी और असफलता का आर्ईना कारगिल
   Date26-Jul-2022

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स्वदेश संकलन
26 जुलाई, 1999 यानि कारगिल विजय दिवस भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए भारतीय सेना के उस अद्वितीय शौर्य , बलिदान और विजयगाथा के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन, सम्मान और एक समर्थ राष्ट्र का नागरिक होने का अप्रतिम गौरव बोध स्मरणकरने का दिन है, जब भारतीय सेना के वीर जवानों ने पाकिस्तान की कुटिल महत्वाकांक्षा , खोखले दुस्साहस और भारत को खंडित करने के एक दिवास्वप्न को अपने पैरों तले रौंद कर कारगिल की चोटियों पर भारत की विजय पताका फहरा दी थी। इसी दिन भारत पाकिस्तान नियंत्रण रेखा से लगी कारगिल की पहाडिय़ों पर कब्ज़ा जमाए आतंकियों और उनके वेश में घुस आए पाकिस्तानी सैनिकों को भारतीय सैनिकों ने मार भगाया था।यह वह दिन भी है जब पूरे विश्व समुदाय यह अनुभव करने पर विवश हुआ कि भारत को परमाणु आक्रमण जैसे गंभीर संकट की संभावनाओं के डर से भी डराया नहीं जा सकता। वह अपनी एकता और अखंडता की रक्षा के लिए विश्व की किसी भी महाशक्ति के दबाव अथवा प्रभाव के आगे नहीं झुकेगा।
जम्मू कश्मीर भारत के संविधान के प्रथम अनुच्छेद में 15 वें स्थान पर अंकित है। सांस्कृतिक रूप से जम्मू कश्मीर सदियों से भारत का अंग रहा है। स्वतंत्रता से पूर्व भारत लम्बे समय तक अंग्रेजो का गुलाम रहा। 15 अगस्त 1947 को हम स्वतंत्र हुए अंग्रेजो ने आर्थिक और सांस्कृतिक दोनों स्तर पर भारत का शोषण किया। इस दोहन और शोषण का दौर लगभग डेढ़ सौ साल चला। अंतत: वर्ष 1947 में अँगरेज़ भारत से गए पर जाते -2 उन्होंने ब्रिटिश भारत का विभाजन किया और इस प्रकार नया डोमिनियन -पाकिस्तानअस्तित्व में आया। विभाजन ब्रिटिश भारत का हुआ था लेकिन देसी रियासतों को यह अधिकार दिया गया था कि वे भारत या पाकिस्तान में से किसी भी एक देश में जा सकते थे। देसी रियासतें किस डोमिनियन का हिस्सा बनेंगीं यह अधिकार केवल और केवल उस रियासत के राजा या नवाब को दिया गया था। अपने इसी अधिकार का प्रयोग करते हुए जम्मू कश्मीर के महाराजा हरी सिंह ने 26 अक्तूबर 1947 को जम्मू कश्मीर का अधिमिलन भारत में कर दिया था, जिसे माउन्टबेटन ने 27 अक्तूबर 1947 को स्वीकार कर लिया था। पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के बाद इस उम्मीद में था कि जम्मू कश्मीर पाकिस्तान में आ जाएगा। लेकिन पाकिस्तान का यह सपना केवल सपना ही रह गया। जब पाकिस्तान को लगा कि महाराजा हरी सिंह जम्मू कश्मीर का अधिमिलन भारत में करेंगे तो उसने 22 अक्तूबर 1947 को जम्मू कश्मीर पर पहला आक्रमण किया। जम्मू कश्मीर के भारत में अधिमिलन के पश्चात जब भारतीय सेना जम्मू कश्मीर पहुँची तब तक राज्य का बहुत बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया था। भारतीय सेना ने राज्य के बहुत से हिस्सों से पाकिस्तानी सेना को खदेड़ा। तब ब्रिटिश षड्यंत्र के चलते 31 दिसंबर 1948 को भारत के ततकालीन प्रधानमंत्री पाकिस्तान के हमले के विरोध में युनाइटेड नेशंस में ले गए। नेहरु वहाँ पर अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों के भ्रमजाल में फँस गए। परिणामस्वरूप जम्मू कश्मीर का एक बहुत बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में चला गया, जिसे हम पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर के नाम से जानते है। मीरपुर, भिम्बर, कोटली, बाघ, मुज्जफराबाद, गिलगित और बल्तिस्तान आदि क्षेत्र पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर में आते है। 1965 और 1971 में पाकिस्तानी घमंड चूर -2 हुआ लेकिन पाकिस्तानी सेना की कुपित मानसिकता में परिवर्तन नहीं आया था।1999 में कारगिल से पहले भी दो बार भारत पर कारगिल से हमला करने का प्रपोजल बनाया गया था और पाकिस्तान में राजनीतिक आकाओ को पूरा प्लान भी प्रस्तुत किया गया था लेकिन दोनों बार यह प्लान रिजेक्ट हो गया था। एक बार जिय़ा उल हक के समय और दूसरी बार बेनज़ीर भुट्टो के समय। भुट्टो के सामने जब यह प्लान रखा गया तब पाकिस्तानी सेना का डीजीएमो था परवेज़ मुशर्रफ, यह वही व्यक्ति था जो कारगिल के समय पाकिस्तानी सेना का प्रमुख था।
दो बार कारगिल का प्लान रोका जा चुका था लेकिन 1999 में जब कारगिल पर दोबारा हमले का प्लान बनाया गया तो परवेज़ मुशर्रफ़ पाकिस्तानी सेना के प्रमुख थे। इसके मुख्य कर्ताधर्ता थे - मुशर्रफ़ के अलावा लेफ्टिनेंटजनरल मोहम्मद अज़ीज़ खान ,लेफ्टिनेंट जनरल महमूद खान और मेजर जनरल जावेद हसन। इन चारों के अलावा लेफ्टिनेंट कर्नल जावेद अब्बास भी कारगिल युद्ध के लिए जिम्मेदार है, जिसकी स्टडी 'इन्डिया - अ स्टडी इन प्रोफाइलÓ से परवेज़ मुशर्रफ़ बहुत प्रभावित थे। उसे लगता था कि वो भारत पर हमला करेगा और भारत बिखर जाएगा। पाकिस्तानी सेना इस वहम में भी थी कि वो भी अब भारत की तरह परमाणु शक्ति है और इस दबाव में भारत जवाबी हमला नहीं करेगा। लेकिन 1965 और 1971 की तरह पाकिस्तानी आंकलन 1999 में भी पूरी तरह से गलत साबित हुआ। कारगिल पर पाकिस्तानी हमले के मुख्य उद्देश्यथे- नेशनल हाईवे एक की सप्लाई बंद करवाना। यह हाईवे श्रीनगर को लेह से जोड़ता है। पाकिस्तानियों को लगता था कि सप्लाई बंद होने से भारतीय सेना बहुत जल्दी किसी भी तरह का जवाबी हमला नहीं कर पायेगी। पाकिस्तान को भारत की जवाबी कार्यवाही का अंदाजा बिलकुल भी नहीं था। परवेज़ मुशर्रफ़ ने अपनी हार स्वीकार करते हुए यह कहा था कि 'भारत ने न केवल सैन्य बल्कि अंतर्राष्ट्रीय डिप्लोमेसी से भी पाकिस्तान को करारा जवाब दिया। कारगिल हमले के बाद थोड़े समय के लिए भारतीय राजनितिक नेतृत्व और सेना दोनों थोड़ा असमंजस में रहे लेकिन फिर डट कर पाकिस्तानी हमले का जवाब दिया। एक-2 कर कारगिल की चोटियों को खाली कराया जाने लगा। 13 जून, 1999 को तोलोलिंग चोटी को भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तान के कब्जे से छुड़ा लिया, जिससे आगे के युद्ध में उन्हें बेहद मदद मिली। जल्दी ही 20 जून, 1999 को प्वांइट 5140 भी उनके कब्जे में आने से तोलोलिंग पर उनका विजय अभियान पूरा हो गया। चार जुलाई को एक और शानदार विजय दर्ज की गई, जब टाइगर हिल को घुसपैठियों से मुक्त कर दिया गया। पाकिस्तान घुसपैठियों को खदेडऩा जारी रखते हुए भारतीय सैनिक आगे बढ़ते रहे। बटालिक की प्रमुख चोटियों से पाकिस्तानी सेना को भगा कर उन्हें दोबारा भारत के कब्जे में ले लिया गया। भारत की 14 रेजिमेंट्स ने शक्तिशाली बोफोर्स से कारगिल में घुसपैठ कर बैठे पाकिस्तानी सेना को निशाना बनाना शुरू कर दिया था। भारत ने एलओ सी के भीतर वायुसेना के विमानों से भी हमले शुरू कर दिए। पाकिस्तान अपनी वायुसेना का प्रयोग नहीं कर पाया क्योंकि पाकिस्तान ने दुनिया के सामने झूठ बोला था कि कारगिल में कश्मीरी मुजाहिद्दीन अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं। यदि पाकिस्तान अपनी वायुसेना का उपयोग करता तो पूरी दुनिया के सामने उसका झूठ पकड़ा जाता। पाकिस्तान ने बहुत बड़ी संख्या में अपने सैनिक खोये। पाकिस्तान की नॉर्दर्न लाइट इन्फेंट्री पूरी तरह से खतम हो गयी थी। कारगिल युद्ध ने पाकिस्तान को एक राष्ट्र के रूप में पूरी तरह से बेनकाब करदिया था। तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख दोनों एक दूसरे पर आरोप लगाते रहे। नवाज़ शरीफ का स्टैंड है कि उन्हें कारगिल हमले के बारे में कुछ नहीं पता था, दूसरी तरफ मुशर्रफ़ का कहना है की नवाज़ शरीफ को सब पता था। कुल मिलकर कहा जा सकता है कि पाकिस्तान 'फैनेटिकफोरÓ (चारसेना के अधिकारी जिन्होंने कारगिल प्लान बनाया था) की फैंटसी का शिकारहुआऔर इस तरह एक असफल देश का शातिर प्रयास भी अफसल रहा।