सफलता की कुंजी है इच्छाशक्ति
   Date26-Jul-2022

dharmdhara
धर्मधारा
इ च्छाशक्ति जितनी प्रचंड होती है, यह प्रक्रिया उतनी ही तीव्र गति से घटित होती है और समय के साथ संकल्प सृष्टि जैसे-शून्य से निकलकर पूर्ण रूप लेते हुए सामने प्रकट हो जाती है। इस तरह जीवन व इसका सृजन और कुछ नहीं, बल्कि संकल्पशक्ति के ही चमत्कार हैं। परम तत्व ब्रह्म का 'एकोऽहम् बहुस्याम्Ó का संकल्प इस सृष्टि की रचना, विस्तार एवं गति का आधार बनता है। इसी तरह सृष्टि का हर घटक उसी ईश्वरीय संकल्प के अनुरूप गतिशील है। यह मनुष्य की ही विशेषता है कि वह सचेतन रूप में इच्छाशक्ति का प्रयोग करते हुए जीवन के बाह्य क्षेत्र में मनोवांछित उपलब्धियों को अर्जित कर सकता है तथा आंतरिक रूप में सद्गुण संपन्न बन सकता है।
जीवन में उत्कर्ष की इच्छाशक्ति के अभाव में व्यक्ति की संभावनाएँ अपनी संपूर्ण क्षमताओं के साथ प्रकट नहीं हो पातीं। दुर्बल इच्छाशक्ति के रहते जीवन एक अंतहीन संघर्ष बन जाता है, जिसका कोई सार्थक निष्कर्ष नहीं निकल पाता। दुर्बल इच्छाशक्ति के कारण जीवन पलायन का पर्याय बन जाता है, व्यक्ति राह की चुनौतियों का सामना भी नहीं कर पाता। आत्मविश्वास की कमी, भय, संशय, हीनता जैसे भावों से चित्त क्लांत रहता है तथा जीवन के प्रति एक नकारात्मक दृष्टिकोण हावी रहता है।
इस स्थिति से उबरने के लिए इच्छाशक्ति को क्रमिक रूप में विकसित किया जा सकता है तथा अवांछनीय स्थिति को बदला जा सकता है। इच्छाशक्ति शरीर की मांसपेशियों की तरह से होती है, जिसे उचित व्यायाम के साथ सशक्त बनाया जा सकता है। प्रस्तुत हैं कुछ उपाय, जिनके साथ इच्छाशक्ति को प्रबल बनाया जा सकता है। रात्रि को समय पर शयन एवं प्रात: समय पर जागरण के साथ इच्छाशक्ति का अभ्यास किया जा सकता है। यह प्रक्रिया बिगड़ी दिनचर्या में सुधार के संकल्प का हिस्सा हो सकती है। अलार्म लगाकर प्रात: निश्चित समय पर जागरण को सुनिश्चित किया जा सकता है। फिर समय पर उठना, सरदी में रजाई से समय पर बाहर निकलना व दिनचर्या के निर्धारित कार्यक्रमों में शामिल होना-ये सब प्रबल इच्छाशक्ति के विकास के साधन माने जा सकते हैं।