'यज्ञÓ वैदिक संस्कृति का मुख्य प्रतीक
   Date25-Jul-2022

dharmdhara
धर्मधारा
अ ग्नि की लौ पर कितना ही दबाव पड़े, लेकिन वह दबती नहीं, बल्कि ऊपर को ही उठी रहती है। इसी तरह हमारे सामने कितने ही भय, प्रलोभन एवं विषम परिस्थितियां क्यों न आएं, हमें अपने मनोबल, संकल्प एवं जिजीविषा को दबने नहीं देना चाहिए, बल्कि अग्निशिखा की भांति ऊंचा उठाए रखना चाहिए। अग्नि जीवनपर्यंत अपनी उष्णता एवं प्रकाश की विशेषताओं को नहीं छोड़ती। उसी प्रकार हमें सदैव पुरुषार्थपरायण एवं कर्तव्यनिष्ठ जीवन जीना चाहिए और अपनी सक्रियता की गरमी तथा धर्मपरायणता की रोशनी घटने नहीं देनी चाहिए। यज्ञाग्नि में आहूत सामग्री अंतत: यज्ञ भस्म के रूप में शेष बचती है। इसको मस्तक पर लगाते हुए हमें भाव करना चाहिए कि इस मानव तन का अंत मु_ीभर भस्म के रूप में होना तय है। ऐसे में जीवन के इस नश्वर सत्य को ध्यान में रखते हुए, अपने शेष जीवन के श्रेष्ठतम उपयोग का प्रयत्न करना चाहिए। यज्ञाग्नि अपने में आहूत सामग्री को वायुरूप बनाकर समस्त जड़-चेतन प्राणियों को बिना किसी अपने-पराये, मित्र-शत्रु का भेद किए गुप्तदान के रूप में बिखेर देती है, जो स्वयं में एक विलक्षण शिक्षण है। इसी तरह हमारा जीवन भी समस्त प्राणियों के लिए एक वरदानस्वरूप होना चाहिए। अपने संसाधन, उपलब्धियों व ज्ञान को हमें मुक्तहस्त से लोक-कल्याण में लगाने की प्रेरणा यज्ञाग्नि से लेनी चाहिए। इस तरह यज्ञ स्वयं में प्रचंड प्रेरणाओं से भरा एक आध्यात्मिक प्रयोग है, जिसे यदि उचित विधि से संपन्न किया जाए तो इसके कर्मकांड द्वारा देव आवाहन, मंत्र प्रयोग, संकल्प एवं सद्भावनाओं की सामूहिक शक्ति से एक ऐसी सशक्त ऊर्जा पैदा की जाती है, जिसके द्वारा मनुष्य की अंत:वृत्तियों को गलाकर इच्छित स्वरूप में ढाला जा सकता है। भाग लेने वालों में वांछित, हितकारी परिवर्तन बड़ी मात्रा में लाए जा सकते हैं।