मिशन-2023 की नींव है नगर सरकार के नतीजे...
   Date24-Jul-2022

parmar shakti
ब्रेक के बाद
शक्तिसिंह परमार
म ध्यप्रदेश में त्रि-स्तरीय पंचायत राज व्यवस्था जिसमें पंचायत, जनपद पंचायत और जिला पंचायत के साथ ही नगर सरकार अर्थात् नगरीय निकाय (नगर निगम, नगर पालिका, नगर परिषद् और नगर पंचायत) के चुनावी के नतीजे भाजपा-कांग्रेस ही नहीं, जनता-जनार्दन के लिए भी एक बड़ा सबक व संदेश है.., क्योंकि अगले साल मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारियां जोर-शोर से शुरू हो जाएगी...उस मिशन-2023 को लेकर इन नतीजों की महती भूमिका बन बैठी है..,क्योंकि जहां पंचायत व निकाय सरकार के इन परिणामों ने संगठन स्तर पर अपनी पूरी जमीन गंवाकर मरणासन्न स्थिति में पहुंच चुकी कांग्रेस को नई ऊर्जा के साथ संजीवनी की भांति नया आधार दिया है... ठीक इसके विपरीत सत्तासीन भाजपा के लिए संगठन के स्तर पर ही नहीं, बल्कि कार्यकर्ता के मानस पर भी इन नतीजों का गहरा असर होना तय है...इसमें कोई दो राय नहीं है कि भले ही भाजपा ने पंचायत से लेकर निगम तक नगर सरकार बनाने के लिए बेहतर प्रदर्शन का 'त्रिदेव मंत्रÓ यानी बूथ अध्यक्ष, प्रभारी व पालक और पन्ना प्रभारी ने दंभ भरा हो और उस मान से जीत भी हासिल की हो, लेकिन जो ताकत कांग्रेस को इन चुनावों ने दी है, वह शहर बनाम गांव के साथ ही एक निर्णायक संदेश भी है कि शहर में भले ही भाजपा जैसे-तैसे ज्यादा पार्षद के साथ 9 निगम बचाने में सफल रही हो..,लेकिन त्रि-स्तरीय पंचायत राज के निर्वाचन में कांग्रेस को भी बेहतर जनसमर्थन प्राप्त हुआ है... इसलिए मिशन-2023 के फाइनल के पूर्व इन चुनावी नतीजों को सेमीफाइनल ही कहा जा सकता है या फिर मिशन-2023 की नींव भी इन्हीं नतीजों की जड़ में देखी जा रही है...
भाजपा-कांग्रेस के इन नतीजों को लेकर अपने-अपने दावे हैं और उसी को आधार बनाकर दोनों दल अपने कार्यकर्ताओं को संगठित होकर 2023 का लक्ष्य भी बता रहे हैं...इसलिए भाजपा-कांग्रेस नतीजों को सेमीफाइनल करार दे रही हैं...लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जब भाजपा की हार और कांग्रेस की कुछ बढ़त पर भगवा संगठन के ही लोग यह कहने लगे कि हर चुनाव की पृष्ठभूमि अलग होती है, तो इन तर्कों से इस बात को स्पष्ट किया जा सकता है कि फिलहाल मतदाताओं ने बहुत संभलकर अपना जनादेश दिया है...एक साल बाद दोनों ही दल जनता का मानस बदलकर अपनी-अपनी स्थिति मजबूत करने का दावा कर रहे हैं...लेकिन विचारणीय बिंदु यह भी है कि जब भाजपा-कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व फिर चाहे नरेन्द्र सिंह तोमर, ज्योतिरादित्य सिंधिया, विष्णु दत्त शर्मा, नरोत्तम मिश्रा के क्षेत्र में भाजपा की पराजय हो या फिर दिग्विजय से लेकर कमलनाथ, सज्जन वर्मा, बाला बच्चन, जीतू पटवारी जैसे दिग्गजों के क्षेत्र में पार्टी का सफाया...यह बताता है कि जनता अब अपने मताधिकार का बहुत सोच-विचार के साथ उपयोग करने लगी है...
अगर त्रि-स्तरीय पंचायत राज के निर्वाचन परिणामों पर नजर डाले तो भले ही भाजपा -कांग्रेस द्वारा समर्थित पंच-सरपंच के जीतने का दावा किया जा रहा हो..,लेकिन इन क्षेत्रों से आए नतीजे दोनों ही दलों के लिए एक कड़ी चेतावनी है...क्योंकि निर्दलीयों के साथ ही भाजपा-कांग्रेस से बागी हुए अथवा आआपा जैसे दल की तरफ रूझान रखने वालों को जनता पसंद कर रही है..,तभी तो मप्र में 30 जिलों में पंच-सरपंच भाजपा समर्थित, जबकि करीब 12 जिलों में कांग्रेस समर्थित जीते हैं...बाकी पर आआपा का रंग चढ़ा...नगरीय निकाय के दोनों चरणों में महती भूमिका का निर्वाह करने वाली परिषद अर्थात पार्षद की स्थिति देखें तो कांग्रेस-भाजपा दोनों के लिए स्थिति किनारे वाली ही रही है... मप्र में नगर निगम के 884 में से 874 परिणाम घोषित हुए, कुल 16 निगमों में पार्षद भाजपा के 491, कांग्रेस के 274, जबकि अन्य 109 जीते हैं... 76 नपा के 1,795 पार्षदों में से भाजपा के 975, कांग्रेस के 571 और अन्य 249 विजयी रहे...ठीक इसी तरह से 255 नगर परिषद् के 3,828 में से भाजपा के 2002, कांग्रेस के 1087 और अन्य भी 739 जीते हैं...यानी पूरे प्रदेश में 1097 से अधिक पार्षदों ने भाजपा-कांग्रेस से बागी होकर या असंतुष्ट होकर अथवा आआपा जैसे दलों का झंडा उठाकर अपनी मजबूत स्थिति का संकेत कर दिया है...यह स्थिति भाजपा-कांग्रेस दोनों के लिए ही विधानसभा चुनाव के मान से भी बहुत घातक होने वाली है...अगर दोनों ही दलों ने डेमेज कंट्रोल के साथ ही असंतुष्ट कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों को नहीं साधा और इससे भी बढ़कर अगर अपनी सरकार-संगठन के शीर्ष लोगों को जनता के साथ कार्यकर्ताओं के बीच जाने के लिए प्रेरित नहीं किया तो स्थिति बदलने वाली नहीं है..,क्योंकि दोनों ही दलों में सारी भ्रमकारी स्थिति के लिए शीर्ष नेता ही जिम्मेदार माने जा रहे हैं...इंदौर नगर निगम की जीत भले ही भाजपा के लिए सवा लाख से अधिक की रही हो, लेकिन भोपाल, बुरहानपुर, रतलाम, सतना, सागर, देवास, उज्जैन, खंडवा में भाजपा को जो बढ़त 15 सालों के कार्यों पर मिलना थी, वह नजर नहीं आती..! फिर सिंगरौली में आआपा की विजयी हो या फिर कटनी में निर्दलीय का भाजपा को चित करना भी एक बड़ा संदेश है कि अगर पार्टी ने मिशन-2023 के मान से अभी से तैयारियां, कसावट और हर तरह की संगठनात्मक जमावट नहीं की तो स्थिति इससे बदतर ही होना है...
आधी-अधूरी जीत के बाद भी बम-बम कर रही कांग्रेस के लिए भी स्थिति भले ही आत्ममुग्धता वाली निर्मित हो रही हो..,लेकिन वास्तविकता तो यही है कि कांग्रेस को भी जनता भाजपा के मजबूत विकल्प के रूप में स्वीकार नहीं कर रही है, तभी तो रीवा में कांग्रेस की जीत का अंतर 10331 और मुरैना में 14631 है...यही नहीं जिन नगर निगमों में कांग्रेस को महापौर प्रत्याशी के रूप में जीत मिली है, वहां पर भी परिषद् के मान से कांग्रेस के पार्षद भाजपा की तुलना में दूसरे स्थान पर रहे हैं और कुछ सीटों पर तो कांग्रेस तीसरे या चौथे स्थान पर रही है...ऐसे में यह स्पष्ट रूप से नहीं माना जा सकता है कि किसी निकाय में महापौर का जीतना उसकी (कांग्रेस) सर्वस्वीकार्यता का प्रमाण है...इसमें कोई दो राय नहीं है कि आआपा ने दिल्ली के बाद पंजाब में जिस तरह से विस्तार किया और कांग्रेस इस भ्रम में रही कि उसकी लड़ाई शिअद या भाजपा गठबंधन से है..,इस बीच उसकी जमीन आआपा ने जिस ऐतिहासिक बहुमत के साथ पंजाब में खिसकाई, उसका असर आने वाले समय में गुजरात विधानसभा चुनाव पर दिखेगा..,क्योंकि भाजपा के मजबूत विकल्प के रूप में कांग्रेस के बजाय आआपा की तरफ मतदाताओं का देखने का यह रूख बताता है कि पूरे मध्यप्रदेश में पार्टी ने अच्छे वोट प्राप्त किए हैं...अकेले इंदौर में 20 वार्डों में आआपा को 11 हजार से अधिक मत मिले हैं..,जबकि महापौर पद का प्रत्याशी भी 12 हजार से अधिक वोट ले गया है...प्रदेशभर में आआपा के 41 पार्षदों ने भी जीत दर्ज कराई है...ये बातें कांग्रेस की नींद उड़ाने के लिए पर्याप्त होना चाहिए... दूसरी तरफ कांग्रेस के लिए ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) को मिला मुस्लिम समर्थन भी कांग्रेस के भविष्य के तुष्टीकरण समीकरण को बिगाडऩे के संकेत दे रहा है... क्योंकि बुरहानपुर में ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवार को 10,332 वोट मिले...जबकि खरगोन में ओवैसी की पार्टी के तीन पार्षद भी जीते...यह कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी नहीं है..?
इसमें कोई दो राय नहीं कि पंचायत व निकाय चुनाव में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं था, उसने पाया ही है...क्योंकि 16 में से 5 निगम जीतना और नपा, नप में भी उसका जनाधार बढऩा उसे 2023 के लिए मजबूत स्थिति की ऊर्जा दे रहा है...लेकिन भाजपा के लिए बड़ी जीत के बावजूद भी बहुत कुछ खोने जैसी स्थिति है.., क्योंकि उसके हाथों से सीधे-सीधे 16 में से 7 नगर सरकारों का निकल जाना कोई अच्छा संकेत तो नहीं है, फिर निर्दलीयों ने जो हुंकार पंचायत व निकाय चुनाव में भरी है और जिस तरह से उसका खामियाजा भाजपा संगठन को भी भुगतना पड़ा है, क्या उसी पटकथा को मिशन-2023 के दौरान नहीं दोहराया जाएगा..? क्या इसके लिए भाजपा रणनीति बनाने के लिए तैयार है..?