पराधीन कौन?
   Date23-Jul-2022

prernadeep
प्रेरणादीप
मगध राजकन्या सुहासिनी के लिए राजा उपयुक्त वर की तलाश कर रहे थे। सुहासिनी ने पिता से अपने लिए स्वयं ही उचित वर चुनने की आज्ञा मांगी। राजा ने स्वीकृति दे दी। राजकुमारी का मानना था कि पराधीन व्यक्ति कष्ट भोगते हैं, उनके साथ रहने में कोई सुख नहीं है। राजा ने स्वयंवर की व्यवस्था कर दी। वह उचित वर को चुनने के लिए राजकुमारों, व्यापारियों, विद्वानों सभी तरह के युवकों से मिली, परंतु उसे वे सभी किसी-न-किसी तरह की आसक्ति के आधीन लगे और उसने किसी को भी अपने योग्य नहीं पाया। कुछ दिनों बाद ऋषि कौडन्य का राजमहल आगमन हुआ। राजा ने पुत्री की इच्छा उन्हें बताई। महर्षि ने राजकन्या से पूछा-'राजकुमारी! स्वयंवर का अर्थ भी तो यही हुआ कि आप दूसरों के सहारे सुखी होने की इच्छा रखती हैं। क्या यह भी एक तरह की पराधीनता नहीं है? राजकुमारी को उनका प्रश्न तर्कसम्मत लगा। उसने गहन चिंतन किया तो महसूस हुआ कि जब तक शरीर वासनाओं के अधीन है, तब तक सभी पराधीन हैं।