तार्किक बहस से बकवास तक...
   Date02-Jul-2022

vishesh lekh
देश के सर्वोच्च न्याय मंदिर में एकल से लेकर संयुक्त बेंच या कहे कि वृहद स्तर तक की संवैधानिक पीठ अलग-अलग मुद्दों, विषयों और विवादों पर तार्किक बहस के द्वारा समाधान का मार्ग प्रशस्त कर चुकी है...ऐसे जटिल मुद्दे भी रहे है जिनका दशकों तक समाज व राष्ट्र पर विपरीत असर पड़ता रहा..,लेकिन सरकार व समाज उस दिशा में कदम उठाने में विफल रहे...लेकिन उसी मुद्दों पर न्यायालयीन दायरे में जो फैसले आए उन्होंने समस्याओं के समाधान की मिसाल प्रस्तुत की...लेकिन आज देश के सर्वोच्च न्याय मंदिर में किसी भी विषय या मसले से जुड़ी तार्किक बहस क्या बकवास के स्तर पर नहीं पहुंच गई है..? यह ज्वलंत सवाल आज पूरे देश के नागरिकों के दिलोदिमाग में उमडऩा-घूमडऩा स्वाभाविक है..,क्योंकि शुक्रवार को न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की बेंच ने पैगम्बर मोहम्मद के खिलाफ टिप्पणी के लिए विभिन्न राज्यों में दर्ज प्राथमिकताओं को एक साथ जोडऩे की नुपूर शर्मा की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया...यहां तक कि याचिका वापस लेने की भी अनुमति दी गई...लेकिन इसी के साथ न्यायालय ने जिस तरह की टिप्पणियां की और तर्क दिए है वह हमारे लोकतांत्रिक भारत की न्याय व्यवस्था की उस विश्वसनीयता पर किसी कालिख से कम नहीं है जो उसकी बेदाग छवि को दागदार बनाने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है...क्योंकि किसी भी तरह की हिंसा के लिए किसी की प्रतिक्रिया को जिम्मेदार ठहरा देना क्या न्यायालय का एक पक्षीय मानस नहीं दर्शाता है..? क्योंकि जब क्रिया हुई तो उसकी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है..,लेकिन क्रिया को ही हमेशा दोषी मान लेना और प्रतिक्रिया को उसी क्रिया की आड़ में बचने का अवसर देना न्याय नहीं..,बल्कि राष्ट्रघाती अन्याय है...नुपूर शर्मा ने जो कुछ बोला अगर वह सबकुछ अक्षरश: देश की शांति भंग करने का दोषी है तो जो लोग सिर कलम कर रहे है उस प्रतिक्रिया को न्यायालय किस रूप में देखता है...या उस पर कुछ कहने के बजाए तार्किक बहस के स्तर को छोड़कर बकवास पर उतर आए तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का भगवान ही रखवाला है...
दृष्टिकोण
निकायों में भी घोषणाओं की होड़...
चुनावों में मतदाताओं को लुभाने के लिए राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से लोकलुभावन घोषणाओं का पिटारा खोलते रहते है...करीब दो दशक पूर्व तक चुनाव में किए जाने वाले वादों के लिए घोषणा पत्र शब्द का ही उपयोग किया जाता था..,लेकिन अब राजनीतिक बदलाव के दौर में चुनावी घोषणा-पत्र को जनता भी एक जुमला मानती है...यह बात नेताओं को भी पता है...इसलिए वे चुनावी घोषणा-पत्र के बजाए अपने वादों-इरादों और भविष्य की योजनाओं के संयुक्त दस्तावेज को अलग-अलग नाम देते है...कोई संकल्प-पत्र, कोई वचन-पत्र, कोई दृष्टि-पत्र आदि...ताकि मतदाताओं में यह संदेश जाए कि राजनीतिक दल केवल घोषणाओं का पुलिंदा प्रस्तुत नहीं कर रहे है..,लोकसभा-विधानसभा चुनाव में घोषणा-पत्र बनाने के लिए एक बड़ी समिति बनाई जाती है और उसी के सलाह, समीक्षा व चिंतन के बाद घोषणा पत्र का प्रारूप पार्टी के समक्ष रखा जाता है और अंतिम रूप दिया जाता है...लेकिन अब घोषणा-पत्र के बिंदुओं पर आम जनता और विषय-विशेषज्ञों से राय भी आमंत्रित की जाती है...यहां तक कि आम जनता से ही आने वाले समय का रोडमैप तैयार करने हेतु सुझाव आमंत्रित किए जाते हैं...चुनाव में जीतकर नेता व दल क्या करेंगे..? इसके लिए अब पंचायत से लेकर निकाय स्तर तक पर भी घोषणा-पत्र जारी करने और उसे अलग-अलग नाम देकर मतदाताओं को लुभाने की होड़ लगी हुई है...नगरीय निकाय चुनाव के लिए इंदौर में कांग्रेस के महापौर प्रत्याशी संजय शुक्ला ने कांग्रेस का वचन व दृष्टि-पत्र जारी कर अनेक तरह की मुफ्तखोरी योजनाओं का पिटारा खोला है ...आखिर पांच फ्लायओवर अपने निजी पैसों से बनाना कोई आसान बात है..,लेकिन यह कांग्रेस के घोषणा-पत्र में शामिल है...तो विचार कीजिए आने वाले समय में लोकसभा-विधानसभा चुनाव में पार्टी व नेताओं को क्या-क्या वादे करना पड़ेंगे..,जबकि भाजपा ने प्रदेश स्तर पर अपना संकल्प पत्र शुक्रवार को जारी किया...जिसमें 25 से अधिक बिंदुओं के द्वारा मतदाताओं से विकास व निर्माण का वादा किया है...इसमें वायु प्रदूषण सुधारने, मजदूरों के लिए बीमा योजना, हर वार्ड में वेंडर जोन, घरों में सीवर कनेक्शन, रोजगार के नए क्षेत्र और एक जिला एक उत्पाद जैसी प्रमुख बात भी शामिल है...कुलमिलाकर कोई भी दल या नेता घोषणाओं के आधार पर ही चुनावी मैदान में है..,ताकि मतदाता उनसे प्रभावित होकर उनके पक्ष में मतदान कर सके...सवाल यह है कि आखिर नेता व दल चुनाव जीतने के लिए क्या-क्या करेंगे..,का वादा करने के बजाए यह क्यों नहीं बताते अब तक क्या-क्या किया..? ऐसा होगा...तभी तो घोषणा पत्र की होड़ लगाने कोई मतलब है...